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Pakistan-बांग्लादेश से भारत आए शरणार्थियों पर मेहरबान सरकार, बिना पासपोर्ट रहने की इजाजत, मुस्लिम क्यों बाहर?

India Allows Stay Without Passport: महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण की जीत के बीच एक और बड़ी खबर ने सुर्खियां बटोरी हैं। 2 सितंबर 2025 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया, जिसके तहत अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के लोग, जो धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए 31 दिसंबर 2024 तक भारत पहुंचे, अब बिना पासपोर्ट या वैध यात्रा दस्तावेजों के देश में रह सकेंगे।

लेकिन इस आदेश में मुस्लिम समुदाय को शामिल नहीं किया गया, जिसने एक बार फिर विवाद को जन्म दिया है। आइए, जानते हैं कि ये फैसला क्या है, इसका क्या असर होगा, और क्यों हो रहा है विवाद?

India foreign minorities stay without passport

क्या है नया आदेश?

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में लागू हुए इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स (सिटिजनशिप) एक्ट 2025 के तहत एक बड़ा फैसला लिया। इस आदेश के मुताबिक, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न या इसके डर के कारण भारत आए अल्पसंख्यक समुदायों-हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई-को बिना पासपोर्ट या वैध दस्तावेजों के भारत में रहने की अनुमति होगी, बशर्ते वे 31 दिसंबर 2024 तक भारत पहुंचे हों। ये आदेश उन हजारों शरणार्थियों के लिए राहत की सांस लाया है, खासकर पाकिस्तान से आए हिंदुओं के लिए, जो 2014 के बाद भारत आए और अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता में थे।

हालांकि, ये आदेश नागरिकता की गारंटी नहीं देता। ये सिर्फ बिना दस्तावेजों के रहने की अनुमति देता है। 2019 में लागू नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत केवल 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए इन समुदायों के लोगों को नागरिकता दी जा सकती है। 2014 के बाद आए लोगों के लिए नागरिकता का रास्ता अभी अस्पष्ट है, लेकिन सरकार भविष्य में इस पर नीतियां बना सकती है।

क्यों खास है ये फैसला?

  • पाकिस्तान हिंदुओं की राहत: पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी, खासकर राजस्थान, गुजरात, पंजाब और दिल्ली में बसे लोग, लंबे समय से अपनी स्थिति को लेकर चिंतित थे। 2010 में भारत में करीब 7,600 पाकिस्तानी हिंदू और सिख शरणार्थी थे, जो नागरिकता की आस में थे। ये आदेश उन्हें कानूनी संरक्षण देता है।
  • अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक: 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान से हिंदू, सिख और ईसाई समुदाय के लोग भारत आए। 2023 तक अफगानिस्तान में 100 से भी कम हिंदू और सिख बचे थे। ये आदेश उन्हें भी राहत देगा।
  • बांग्लादेश के शरणार्थी: बांग्लादेश से आए हिंदुओं, खासकर असम और पश्चिम बंगाल में बसे लोगों के लिए ये फैसला नई उम्मीद लेकर आया है।
  • नेपाल और भूटान को छूट: इस आदेश में नेपाल और भूटान के नागरिकों को भी बिना पासपोर्ट सड़क या हवाई मार्ग से भारत आने की छूट दी गई है। तिब्बती शरणार्थियों को भी उनके पंजीकरण प्रमाणपत्र के आधार पर संरक्षण मिलेगा।

CAA और नया आदेश: क्या है अंतर?

2019 में पारित नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) ने हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के उन लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान किया, जो 31 दिसंबर 2014 तक अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान से भारत आए और धार्मिक उत्पीड़न का सामना कर रहे थे। इस कानून को लागू करने में देरी हुई, क्योंकि 2019 में इसके खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए, जिसमें 100 से ज्यादा लोग मारे गए।

नया आदेश CAA से एक कदम आगे है। ये 2014 के बाद और 2024 तक भारत आए अल्पसंख्यकों को बिना पासपोर्ट रहने की अनुमति देता है, लेकिन नागरिकता का वादा नहीं करता। CAA में मुस्लिम समुदाय को शामिल न करने की वजह से इसे 'भेदभावपूर्ण' बताया गया था, और नया आदेश भी उसी नीति को आगे बढ़ाता है।

मुस्लिम क्यों बाहर? विवाद की जड़

नए आदेश और CAA दोनों में मुस्लिम समुदाय को शामिल न करना विवाद का सबसे बड़ा कारण है। आलोचकों का कहना है:-

  • भेदभाव का आरोप: CAA और नया आदेश मुस्लिम समुदाय को बाहर रखता है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करता है, जो समानता और गैर-भेदभाव की गारंटी देता है।
  • अहमदी और रोहिंग्या का मुद्दा: पाकिस्तान में अहमदी मुस्लिम और म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिम भी धार्मिक उत्पीड़न का शिकार हैं, लेकिन उन्हें इस कानून में जगह नहीं मिली। भारत सरकार रोहिंग्या शरणार्थियों को निर्वासित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुकी है।
  • राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का डर: आलोचक कहते हैं कि CAA और NRC को साथ लागू करने से मुस्लिम समुदाय को 'घुसपैठिया' करार देकर उनके नागरिक अधिकार छीने जा सकते हैं। असम में NRC ने 20 लाख लोगों को नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर किया, जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों शामिल थे।

गृह मंत्री अमित शाह ने इसका बचाव करते हुए कहा, "पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में इस्लाम राजधर्म है। वहां अल्पसंख्यक (हिंदू, सिख आदि) उत्पीड़न झेलते हैं। अखंड भारत का हिस्सा रहे इन लोगों को शरण देना हमारा नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य है।" लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये नीति भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को कमजोर करती है।

क्या असर होगा?

  • राहत: पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, और अन्य अल्पसंख्यकों को अब निर्वासन का डर नहीं रहेगा। राजस्थान, गुजरात, और दिल्ली में बसे शरणार्थी अब स्कूल, नौकरी और बुनियादी सुविधाओं का लाभ ले सकेंगे।

  • विवाद: मुस्लिम समुदाय को बाहर रखने से ये नीति भारत के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर सवाल उठा रही है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे 'भेदभावपूर्ण' करार दिया।

  • सियासी कोण: 2024 के विधानसभा चुनावों से पहले CAA और इस नए आदेश को लागू करना BJP की हिंदू समर्थक छवि को मजबूत कर सकता है, लेकिन मुस्लिम समुदाय में असंतोष बढ़ा सकता है।
  • केंद्र सरकार का ये फैसला हजारों शरणार्थियों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है, लेकिन मुस्लिम समुदाय को बाहर रखने से ये एक बार फिर विवादों में घिर गया है। क्या ये नीति भारत को एकजुट करेगी, या सियासी जंग का नया मैदान बनेगी? कमेंट बॉक्स में बातएं आप क्या सोचते हैं?

    ये भी पढ़ें- CAA: गोवा में दूसरे देश के शरणार्थियों के लिए नागरिकता देने की समय सीमा तय, केंद्र ने जारी किया आदेश

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