राजस्थान में बीजेपी को मिल गए 'हनुमान', किन-किन राज्यों में दिलाएंगे फायदा?

नई दिल्ली- राजस्थान में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने बीजेपी के साथ हाथ मिला लिया है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले यह गठबंधन बीजेपी के लिए बहुत ही फायदे का सौदा साबित हो सकता है। समझौते के मुताबिक राज्य की 25 लोकसभा सीटों में से 24 सीटों पर बीजेपी लड़ेगी और नागौर सीट पर लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल एनडीए के उम्मीदवार होंगे। 2014 के चुनाव में बीजेपी यहां सभी 25 सीटें जीत गई थी। लेकिन, 2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को कांग्रेस के हाथों सत्ता गंवानी पड़ गई। हालांकि उस चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के वोट शेयर में सिर्फ 0.5% का अंतर रहा था। अब सवाल उठता है कि प्रदेश में प्रभावी जाट नेता बेनीवाल के साथ आने से बीजेपी को राज्य में कितना फायदा मिलेगा? या क्या वे दूसरे राज्यों में भी ज्यादा से ज्यादा कमल खिलाने के बीजेपी के मंसूबे को पूरा करने में मदद कर पाएंगे?

राजस्थान में बीजेपी के संकट मोचक बनेंगे!

राजस्थान में बीजेपी के संकट मोचक बनेंगे!

पिछले साल दिसंबर में विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले ही धाखड़ जाट नेता हनुमान बेनीवाल ने बीजेपी की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से नाराजगी की वजह से पार्टी का साथ छोड़ दिया था और अपनी नई राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी बनाई थी। उन्होंने बार-बार वसुंधरा के नेतृत्व पर सवाल उठाया, लेकिन तब राजे के दबदबे के कारण पार्टी उनका कुछ नही कर पाई। मौजूदा समय में बीजेपी के अंदरूनी हालात बदल चुके हैं और इसी वजह से उसे बेनीवाल का साथ मिल पाया है। दिलचस्प बात ये है कि इस गठबंधन के चलते अब नागौर लोकसभा सीट का समीकरण भी बदल गया है और अब यहां बेनीवाल का सीधा मुकाबला राजस्थान में कांग्रेस के प्रभावी मिर्धा परिवार के ज्योति मिर्धा से हो गया है।

बेनीवाल के बीजेपी के साथ आने से राज्य का सियासी समीकरण किस कदर बदला है उसका अंदाजा कुछ तथ्यों पर नजर डालकर लगाया जा सकता है। मसलन पिछले विधानसभा में उनकी पार्टी ने राज्य की 57 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारा था, जिनमें से तीन सीटों पर उसे जीत मिली थी और दो सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी। पार्टी कई सीटों पर तीसरे नंबर पर भी रही और करीब दो दर्जन विधानसभा क्षेत्रों में उसके प्रत्याशियों को ठीक-ठाक वोट मिले थे। पार्टी जिन सीटों पर जीती थी वे हैं- खींवसर (45% वोट शेयर), मेड़ता (32% वोट शेयर),भोपालगढ़(36% वोट शेयर)। जबकि पार्टी जिन दो सीटों पर दूसरे स्थान पर रही उसमें जायल (31% वोट शेयर) एवं बायतु (24% वोट शेयर) शामिल है। इनमें नागौर के खींवसर विधानसभा क्षेत्र से खुद हनुमान बेनीवाल चुने गए थे। अब अगर विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बीजेपी के लगभग बराबर यानी महज 0.5% ज्यादा मिले वोट शेयर से करीब 30 विधानसभा क्षेत्रों में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को मिले वोट शेयर को भी जोड़ दें, तो राजस्थान में ही कम से कम 4 से 5 लोकसभा क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी के आगे निकलने की संभावना बन सकती है और कुछ न कुछ प्रभाव लगभग हर सीटों पर पड़ सकता है।

किन-किन राज्यों में फायदा मिलने की उम्मीद?

किन-किन राज्यों में फायदा मिलने की उम्मीद?

जाट समुदाय में हनुमान बेनीवाल की पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 29 अक्टूबर, 2018 को पार्टी के गठन के बाद राजस्थान के नागौर, बाड़मेर, सीकर और जयपुर में उन्होंने जो 5 बड़ी रैलियां की थीं, उनमें 5 से 6 लाख लोगों की भीड़ उमड़ने की बातें कहीं गई। उन्होंने बीजेपी के साथ गठबंधन के बाद जो कुछ कहा है, उससे भाजपा का उत्साहित होना स्वाभाविक है। बेनीवाल के शब्दों पर गौर कीजिए- "मेरी जड़ें बीजेपी में हैं, इसलिए मैं बीजेपी के साथ ज्यादा सहज हूं। मैंने ये फैसला इसी चलते किया है, क्योंकि मेरे कार्यकर्ता इस गठबंधन के पक्ष में थे।" बीजेपी को भरोसा है कि बेनीवाल सिर्फ राजस्थान में ही पार्टी को फायदा नहीं पहुंचाएंगे, बल्कि जाट समाज में अच्छी पकड़ होने के चलते वे दूसरे जाटलैंड में भी उसकी ताकत बढ़ाने का काम करेंगे। खुद बेनीवाल ने भी कहा है कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता राजस्थान के अलावा हरियाणा और उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी के उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करेंगे और नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाएंगे। वैसे प्रदेश में चौथे और पांचवे चरण में वोटिंग होनी है, लेकिन बीजेपी को भरोसा है कि यह समझौता पहले चरण में यूपी के चुनाव में भी मदद करेगा। गौरतलब है कि 11 अप्रैल को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिन क्षेत्रों में चुनाव होने हैं, उसमें से बड़ा इलाका जाटलैंड के नाम से ही मशहूर है।

कितना बदला समीकरण?

कितना बदला समीकरण?

पिछले साल दिसंबर में जिन तीन राज्यों में चुनाव हुए उसमें कांग्रेस से राजस्थान में सबसे बढ़िया प्रदर्शन की उम्मीद थी। इसका कारण राजस्थान का वह इतिहास रहा है, जहां 1993 से हर बार सरकारें बदलने की लगभग परंपरा सी बन गई है। लेकिन, परिणाम कांग्रेस के हक में उस तरह से नहीं आया, जितनी की उम्मीद की जा रही थी। वह पूर्ण बहुमत से भी एक सीट पीछे ही रह गई। विधानसभा चुनाव में वोट शेयर का अंकगणित ये बताता है कि उस आधार पर लोकसभा के चुनाव परिणाम निकाले जाएं, तो बीजेपी 13 और कांग्रेस 12 सीटों पर जीतने का दम रखती थी। हालांकि, विधानसभा चुनाव के बाद राज्य के 13 में से 12 निर्दलीय विधायक कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। अगर उन 12 विधायकों के 2.8% वोट शेयर को कांग्रेस के वोट शेयर में जोड़ दें, तो कांग्रेस को उस स्थिति में 16 सीटें मिल सकती थीं। लेकिन, अब राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के बीजेपी के साथ में आ जाने से यह समीकरण पार्टी के पक्ष में ज्यादा भारी हो गया है।

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