No Child Marriage: 2025 में भारत ने बाल विवाह पर कसी लगाम, अब नहीं खोएगा बचपन
No Child Marriage: साल 2025, भारत में बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई में एक मील का पत्थर रहा है। दशकों से चले आ रहे इस अपराध को खत्म करने के लिए केंद्र और राज्यों ने पहली बार मिलकर सख्त और समन्वित रणनीति अपनाई। इसका असर सिर्फ आंकड़ों में कमी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और भविष्य को लेकर समाज की सोच में भी साफ बदलाव दिखने लगा। अब बाल विवाह रोकने के प्रयास केवल कानून लागू करने तक नहीं रह गए हैं।
बल्कि प्रशासन की सक्रियता, व्यापक जागरूकता अभियानों, समुदाय की भागीदारी और आर्थिक सहायता योजनाओं के जरिए यह एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुके हैं। जो प्रथा लंबे समय तक सामाजिक स्वीकार्यता, प्रशासनिक चुप्पी और 'परंपरा' के नाम पर अनदेखी होती रही, उसे अब स्पष्ट रूप से एक अपराध मानकर रोका जा रहा है।

भारत सरकार ने No Child Marriage अभियान को शुरू किया
देश भर में अनेक नागरिक समाज संगठन और सामाजिक संस्थाएं वर्षों से जमीनी स्तर पर बाल विवाह के खिलाफ संघर्ष कर रही थीं और अक्सर वहां हस्तक्षेप करती थीं, जहां सरकारी तंत्र संकोच में पड़ जाता था। लेकिन नवंबर 2024 में जब भारत सरकार ने इस अभियान को औपचारिक रूप से शुरू किया, तो इसकी व्यापकता और गति में निर्णायक बदलाव आया, जो प्रयास बिखरे स्वरूप में चल तो रहे थे, वे अब एक साथ जुड़कर राष्ट्रीय संकल्प बन गए। इसी के चलते बाल विवाह को अब एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता और अपराध मानते हुए उसके त्वरित समाधान और कार्रवाई की जरूरत को स्वीकार किया जा रहा है।
एक लाख से अधिक बाल विवाह रोके गए
यह बदलाव इतना समन्वित और केंद्रित था कि बाल अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए काम करने वाले नागरिक सामाजिक संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन ने अपने 250 से अधिक सहयोगी संगठनों के साथ एक वर्ष में ही कानून प्रवर्तन एजेंसियों और समुदायों के सहयोग से एक लाख से अधिक बाल विवाह रोकने में सफलता हासिल की। इतना ही नहीं, अधिकारियों और प्रशासन के साथ मिलकर इस नेटवर्क ने 19 लाख से अधिक संवेदनशील परिवारों को सरकारी कल्याण योजनाओं से जोड़ा और सात लाख से अधिक बालिकाओं को दोबारा स्कूल तक पहुंचाया।
असम बना 'बाल विवाह मुक्त भारत' अभियान की मिसाल (No Child Marriage)
इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन की पहल सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज फॉर चिल्ड्रन (सी-लैब) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में असम में बाल विवाह के मामलों में करीब 84 प्रतिशत की देश में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। असम ने दिखा दिया कि इस गिरावट के पीछे सबसे प्रभावी हथियार है सख्त कानूनी कार्रवाई। शून्य सहनशीलता की नीति अपनाते हुए असम सरकार ने बाल विवाह से जुड़े मामलों में 5,225 एफआईआर दर्ज कर बता दिया कि परंपरा और रिवाज के नाम पर पनपने वाले इस अपराध पर अब कानून का चाबुक चलेगा। असम का अनुभव यह भी बताता है कि जागरूकता और कानून का होना जरूरी है, लेकिन असली बदलाव तब आता है जब कानून का डर लोगों के मन में बैठता है। जब यह स्पष्ट हो जाता है कि बाल विवाह जैसे अपराध का नतीजा सजा है, तभी लोग इसे करने से बचते हैं।
बिहार में टास्क फोर्स का गठन (No Child Marriage)
इसी साल बिहार सरकार ने बाल विवाह को रोकने के लिए मुख्य सचिव के नेतृत्व में एक राज्य-स्तरीय टास्क फोर्स बनाने का निर्णय लिया। यह फोर्स बाल विवाह से जुड़ी गतिविधियों पर आधिकारिक कार्रवाइयों की निगरानी करेगा। साथ ही पुलिस और अन्य एजेंसियों को बाल विवाह निषेध अधिनियम को प्रभावी रूप से लागू करने और इससे जुड़े मामलों में प्रभावी कार्रवाई कर इस गैरकानूनी प्रथा में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए। इस तरह उन समुदायों और इलाकों में, जहां बाल विवाह की घटनाएं अधिक हैं, वहां लक्षित हस्तक्षेप के जरिए बाल विवाह की घटनाएं रोकने में सकारात्मक परिणाम दिखाई दे रहे हैं।
राजस्थान में बढ़ी जवाबदेही (No Child Marriage)
बाल विवाह के खिलाफ कार्रवाई में राजस्थान ने एक सशक्त और प्रभावी मॉडल अपनाया है। राज्य सरकार ने कड़ी निगरानी के साथ स्पष्ट जवाबदेही तय करते हुए अक्षय तृतीया से पहले राजस्थान हाईकोर्ट के एक अहम फैसले के जरिए हर बाल विवाह के लिए सरपंचों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया। इससे अनभिज्ञता का बहाना खत्म हुआ और जिम्मेदारी सीधे तय हो गई। साथ ही विवाह पंजीकरण को अनिवार्य बनाकर हर शादी को दर्ज करने की व्यवस्था की गई, जिससे गुपचुप तरीके से होने वाले बाल विवाह पर प्रभावी रोक लगी और पारदर्शिता बढ़ी। इसके समानांतर 'बाल विवाह मुक्त भारत' अभियान का 100-दिवसीय गहन जागरूकता अभियान प्रशासन और समाज-दोनों को सक्रिय करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
कर्नाटक में कानून की सख्ती
राज्य मंत्रिमंडल द्वारा पारित बाल विवाह निषेध (कर्नाटक संशोधन) विधेयक, 2025 बाल अधिकारों की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इस संशोधन के तहत अब नाबालिगों की सगाई को भी दंडनीय अपराध बनाने का प्रस्ताव किया गया है। अब तक कानून केवल बाल विवाह को अपराध मानता था, जबकि सगाई जैसे आयोजनों को परंपरा के नाम पर अनदेखा कर दिया जाता था। इस बदलाव ने उस कानूनी खामी को बंद कर दिया है, जिसके जरिए बाल विवाह की तैयारी चुपचाप आगे बढ़ती थी। इस पहल के साथ कर्नाटक देश का पहला राज्य बन गया है, जिसने परंपरा और अपराध के बीच की सीमा को स्पष्ट, सख्त और प्रभावी रूप से परिभाषित किया है।
'बाल विवाह परंपरा नहीं, अपराध है'
यह बदलाव किसी एक सरकार या संस्था की उपलब्धि नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों के साझा प्रयास, प्रतिबद्धता और एकजुटता का नतीजा है। राज्यों, जिलों, संस्थाओं, जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मियों और समुदायों ने मिलकर यह तय करना शुरू किया है कि बाल विवाह परंपरा नहीं, अपराध है। इसी दिशा में असम, बिहार, राजस्थान, कर्नाटक जैसे राज्यों ने कानून को सख्ती से लागू किया, प्रशासन को सक्रिय कर व्यापक जागरूकता अभियान चलाया। दूसरी ओर, केंद्र सरकार के बाल विवाह मुक्त भारत अभियान को नागरिक समाज संगठनों ने जमीनी स्तर पर मजबूती दी। इन साझा प्रयासों का असर केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि लाखों बच्चों के सुरक्षित बचपन और उज्ज्वल भविष्य में साफ नजर आ रहा है। अब 'बाल विवाह मुक्त भारत' सिर्फ एक नारा नहीं रहा, बल्कि यह 2030 से पहले ही वास्तविकता बनने की ओर है।
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