1957 में नेहरू ने भारतीय क्षेत्र में चीन की सड़क होने की खुफिया रिपोर्ट नजरअंदाज किया, किताब में खुलासा
नई दिल्ली- 1962 की जंग से पहले भारत के अक्साई चिन इलाके और तिब्बत में चीन के बढ़ रहे दखल को लेकर एक नई किताब आ रही है, जिससे भारत की राजनीति एकबार फिर से गर्मा सकती है। इस किताब में यह दावा किया गया है कि चीन अक्साई चिन इलाके में सड़कों का निर्माण कर रहा है यह जानकारी 5 साल पहले ही सरकार को मिल गई थी, लेकिन फिर भी शीर्ष स्तर पर आर्मी इंटेलिजेंस की इस अहम जानकारी को यूं ही छोड़ दिया गया। यही नहीं इस किताब में यह भी कहा गया है कि जिस वक्त तिब्बत में चीन अपना दखल बढ़ा रहा था, उस समय भारत इतना सक्षम था कि चीन को रोक सकता था। तिब्बत की जनता भी इसी उम्मीद में बैठी थी, लेकिन भारत ने वह मौका भी गंवा दिया।

'एंड ऑफ ऐन एरा, इंडिया एग्जिट्स तिब्बत'
एक नई किताब आ रही है, जिसमें दावा किया गया है कि 1962 की जंग से 5 साल पहले भारतीय सेना के दो जांबाज सिपाहियों ने अपनी जान पर डालकर यह खुफिया सूचना जुटाई थी कि चीन भारतीय क्षेत्र में सड़क बना चुका है, लेकिन फिर भी तत्कालीन सरकार ने उसे नजरअंदाज कर दिया। 'एंड ऑफ ऐन एरा, इंडिया एग्जिट्स तिब्बत' नाम की यह किताब चीन मामलों के जाने-माने एक्सपर्ट क्लाउडे एर्पी ने लिखी है, जिसमें नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी, भारतीय और चीनी दस्तावेजों के अलावा कुछ इंटरव्यू के जरिए विस्तृत जानकारी जुटाई गई है। किताब में मुख्यतौर पर इस बात का जिक्र किया गया है कि कैसे अपने ही एजेंसियों से मिली ढेर सारी सूचनाओं के बावजूद भारत, तिब्बत पर चीन के कब्जे के खिलाफ कार्रवाई करने में नाकाम रहा।

आर्मी इंटेलिजेंस की रिपोर्ट पर संदेह में पड़े रहे-किताब
किताब में दावा किया गया है कि 1957 में अक्साई चिन इलाके में भारतीय सेना के एक अधिकारी और एक हवलदार अपनी जान पर खेलकर एक बेहद सीक्रेट मिशन पर निकले थे। वो दोनों भेष बदलकर याक चरवाहों के झुंड में शामिल हो गए और भारतीय क्षेत्र में चीन की ओर से किए गए सड़क के अवैध निर्माण का सबूत जुटाया। लेकिन, दुर्भाग्य से कुमाऊं रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल आर एस बसेरा और कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स के हवलदार दिवान सिंह की ओर से उठाए गए जोखिम और मुश्किलों के बावजूद तत्कालीन रक्षा मंत्री वीके कृष्णा मेनन और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सड़क के निश्चित स्थान को लेकर संदेह में ही पड़े रहे। आखिरकार पूरे दो साल बीतने के बाद भारत सरकार ने संसद में भी कबूल किया कि सड़क सही में बनाई गई है।

तिब्बत की रक्षा करने में सक्षम हो सकता था भारत-किताब
आने वाली किताब इस विषय पर आधारित है कि भारत ने तिब्बत पर किस तरह से अपना प्रभाव खो दिया, जिससे चीन को भारतीय सीमा के पास आक्रामक दावे करने का मौका मिलता चला गया। जबकि, तिब्बत के लोग इस आस में बैठे रह गए कि भारत उसपर चीनी सभ्यता और संस्कृति थोपे जाने से रक्षा करेगा। जबकि, एर्पी ने अपनी शोध में इस बात के संकेत दिए हैं कि भारत के पास इसके विकल्प मौजूद थे। उस समय भारतीय वायुसेना निश्चित तौर पर चीन की हवाई सेना पर भारी पड़ती, जिससे तिब्बतियों की रक्षा की जा सकती थी और यह बहुत जरूरी भी था। कूटनीति में भी भारत भारी पड़ सकता था।

माओ को लंबी तैयारी करने का मौका मिला- किताब
तिब्बत से भारत को सूचनाएं मिलती रहीं कि चीन किस तरह से गाड़ियों के लायक सड़कें बनाता जा रहा है, लेकिन नई दिल्ली के कान खड़े नहीं हुए। सड़कों की वजह से चीनी सेना को भारतीय सीमा तक जल्दी से पहुंचने की क्षमता प्राप्त हो गई। माओत्से तुंग ने लंबी तैयार की थी, वह दलाई लामा को शरण देने से चिढ़ा हुआ था, तीसरी दुनिया को नेतृत्व देने में नेहरू ने उसे ज्यादा भाव नहीं दिया, जिसके बाद आखिरकार उसने अक्टूबर 1962 में भारतीय इलाकों में हमले का आदेश दे दिया। जबकि, लेफ्टिनेंट कर्नल बसेरा और उनके सहयोग ना सिर्फ भारत में चीन की बनाई सड़क तक पहुंचे थे, बल्कि उसकी नाप भी ले ली थी। लेकिन, नेहरू और मेनन ने इसके बदले डीजी मिलिट्री इंटेलिजेंस से पूछा कि क्या इसकी नक्शे पर पुष्टि की जा सकती है। लेकिन, सुरक्षा कारणों से उनके पास कोई नक्शा नहीं था।

एक ब्रिटिश पर्वतारोही की सूचना भी नकार दी गई- किताब
भारतीय इलाके में चीन की ओर सड़क बनाए जाने का यह पहला मामला नहीं था। इससे पहले एक ब्रिटिश पर्वतारोही सिडनी विंगनैल भारतीय सेना की जानकारी में तिब्बत गए थे। उन्हें पहले पकड़ लिया गया था, लेकिन मुश्किल से वह छूट कर लौट आए थे। उनकी रिपोर्ट में भी अक्साई चिन में रोड की बात थी, जिसे मेनन ने नेहरू की मौजूदगी में सीआईए का प्रोपेगेंडा कहकर खारिज कर दिया था। (तस्वीरें- सांकेतिक)
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