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'मैंने देखा है भारत का सबसे बड़ा नरसंहार'

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    1983 में मैं 36 बटालियन पीएसी, रामनगर, बनारस में कमान्डेंट के पद पर तैनात था.

    उस समय असम में आसू (ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन) और एजीपी (ऑल असम गण संग्राम परिषद) की तरफ़ से गैर असमियों के ख़िलाफ़, आंदोलन ज़ोरों पर था जो कि 1979 से चल रहा था.

    इस आन्दोलन का मुख्य मुद्दा था कि असम से बाहरी लोगों को बाहर कर दिया जाए. इनमें सबसे ज़्यादा बांग्लाभाषी मुसलमान थे, उनके अलावा हिन्दू बिहारी और उत्तर प्रदेश, नेपाल और भूटान के लोग भी थे.

    चुनाव कराने पर इंदिरा सरकार का विरोध

    इंदिरा गांधी
    Getty Images
    इंदिरा गांधी

    उस समय वहां कांग्रेस सरकार थी. इसी आन्दोलन के दौरान असम बंद था और जनता क़र्फ्यू शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा था.

    इसी बीच छह जनवरी, 1983 को केंद्र में इंदिरा गाँधी की सरकार ने वहां फरवरी में 12 लोकसभाओं और विधानसभा का चुनाव कराने की घोषणा की.

    यह चुनाव 1979 की वोटर सूची पर आधारित था जिस पर आसू और एजीपी को आपत्ति थी क्योंकि इसमें तथाकथित बांग्लादेशी मुसलमान शामिल थे.

    आसू और एजीपी ने इस चुनाव के बहिष्कार की घोषणा कर दी. इन संगठनों के सभी नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया था.

    'बांग्लाभाषी लोग मतलब बांग्लादेशी'

    एक व्यक्ति असम में नागरिकता सूची में अपना नाम तलाश रहे हैं
    EPA
    एक व्यक्ति असम में नागरिकता सूची में अपना नाम तलाश रहे हैं

    जनवरी, 1983 में अचानक पीएसी मुख्यालय से एक आदेश मिला कि मुझे असम में चुनाव ड्यूटी के लिए पीएसी की आठ कम्पनियाँ लेकर जाना है.

    हम लोग पहले गुवाहाटी पहुंचे जहाँ हमें जोरहट ज़िले में रिपोर्ट करने को कहा गया. जोरहट पहुंचने पर हमें शिवसागर जो उस समय सब-डिवीजिनल मुख्यालय था- जाने के लिए कहा गया जहां मैंने अपना मुख्यालय स्थापित किया.

    वहां के उपपुलिस अधीक्षक ने हमें आसू के आन्दोलन और चुनाव बहिष्कार को लेकर की जा रही गतिविधियों के बारे में विस्तार से बताया.

    उन्होंने बताया कि आन्दोलनकारी अचानक जनता क़र्फ्यू की घोषणा कर देते हैं और सभी बाज़ार और वाहन बंद हो जाते हैं.

    आन्दोलनकारी तथाकथित बांग्लादेशियों जो कि वास्तव में अधिकतर बांग्लाभाषी मुसलमान और हिन्दू हैं, की बस्तियों पर हमला भी कर सकते हैं.

    साल 2013 में आयोजित एक कार्यक्रम
    All Assam Students Union @Facebook
    साल 2013 में आयोजित एक कार्यक्रम

    एक दो दिन बाद मुझे स्थानीय असमिया दुकानदारों से बातचीत करने का मौका मिला. बातचीत में यह उभरकर आया कि असमिया लोग सभी बांग्लाभाषियों को बांग्लादेशी कहकर संबोधित करते हैं और उनसे बहुत ईर्ष्या करते हैं.

    उनका कहना था कि इन बांग्लादेशियों ने हमारी ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया है. इनकी आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ रही है, जिस कारण एक दिन हम लोग अपने ही प्रांत में अल्पसंख्यक हो जायेंगे. हमारी अस्मिता और संस्कृति नष्ट हो रही है. कांग्रेस इन्हें यहाँ से भगाने की बजाय वोट का अधिकार देकर इनका वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल कर रही है.

    बातचीत के दौरान यह भी पता चला कि असमिया लोग जिनमें अधिकतर अहोम जाति के लोग थे, कुछ अन्य मूल निवासियों (क़बीलों) के साथ मिलकर अगले महीने होने वाले चुनावों का विरोध करेंगे. कुछ बांग्लाभाषी मुसलमानों से बातचीत करने पर पता चला कि वे कांग्रेस समर्थक हैं और वे चुनाव में ज़रूर भाग लेंगे.

    फिर आई हमले की ख़बर

    असम के मुसलमान
    EPA
    असम के मुसलमान

    पीएसी की अधिकतर पोस्टें वहां पर लगाई गईं थीं जहाँ बांग्लाभाषी लोगों की बस्तियां थीं क्योंकि उन पर हमले की आशंका थी. एक दिन मुझे एक संदेश आया कि मेरे क्षेत्र के हाथीखाल स्थान पर रात में कुछ लोगों ने इकठ्ठा होकर बांग्लाभाषी मुसलमानों की बस्ती पर हमला कर दिया था जिसमें लगभग 50 लोग मारे गये थे.

    हमलावरों ने रात में उस बस्ती को पूरी तरह से घेरकर फूस के घरों में आग लगा दी थी और लोगों को काट काट कर उसी आग में फेंककर जला दिया था. मरने वालों में पुरुष, महिलाएं और बच्चे थे. वहां से शायद ही कोई भागकर जान बचा सका था.

    इस सूचना पर मैं हाथीखाल गया और वहां का दृश्य देखकर स्तब्ध रह गया. सब घर बुरी तरह से जले हुए थे. उस समय तक हालांकि स्थानीय पुलिस लाशें उठाकर ले गई थी, लेकिन उस सूनी बस्ती में जले हुए जानवरों की लाशें पड़ी थीं.

    वहां मृतकों के कुछ रिश्तेदार मौजूद थे. ऐसे नरसंहार को देखने का मेरा यह पहला अवसर था. पुलिस की नौकरी के दौरान मैंने हत्याओं और दुर्घटनाओं में कई लाशें देखी थीं, लेकिन ऐसा नरसंहार नहीं देखा था.

    पोलिंग कर्मचारियों की मुश्किलें

    असम
    BBC
    असम

    उस दिन मुख्यालय आकर मैं भोजन भी नहीं कर सका. हाथीखाल का मंज़र बार बार मेरी आँखों के सामने आ जाता था. इसके बाद ऐसी कई छोटी छोटी घटनाएं देखने को मिलीं.

    चुनाव के दिन पास आए तो पता चला कि असम के सरकारी कर्मचारियों ने भी चुनाव ड्यूटी करने से मना कर दिया है और चुनाव ड्यूटी के लिए दिल्ली और बिहार से कर्मचारियों को लाया जा रहा है.

    उन कर्मचारियों को हवाई जहाज़ से असम लाया गया और उनका बीमा किया गया. उनसे मिलने पर पाया कि वे बुरी तरह डरे हुए थे और अपनी इच्छा के विरुद्ध चुनाव ड्यूटी पर लाए गए थे. हम लोगों ने उनका काफ़ी हौसला बढ़ाया लेकिन वे अन्दर तक डरे हुए थे.

    चुनाव के दिन हम लोगों ने गाड़ियों से पोलिंग पार्टियों को रवाना किया. थोड़े समय बाद ही हमें सन्देश आने शुरू हो गए कि कई पार्टियों की गाड़ियाँ पंचर हो गई हैं. जांच करने पर पता चला कि चुनाव विरोधियों ने रास्ते में लकड़ी में कील लगा कर और बांस के तीखे पंजे बना कर मिट्टी में छुपा रखे थे जिनसे गाड़ियाँ पंचर हो रही थीं.

    चुनाव ड्यूटी से लौटी पार्टियों ने बताया कि कई पोलिंग बूथों पर चुनाव विरोधियों ने मधुमक्खियों के छत्ते और गंदगी डाल दी थी जिस कारण उन्हें खुले में ही बैठ कर वोट डलवाने पड़े.

    चुनाव के दिन हमें कई जगह से वोटरों पर हमले की शिकायतें मिलीं. चुनाव के दौरान एक दूसरी जगह मेरे कर्मचारियों को हमलावरों पर गोली चलानी पड़ी थी जिसमें एक आदमी मारा गया था. इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वह चुनाव कैसा था. इसमें कुल 32 फ़ीसदी वोट पड़े थे और 108 में 90 सीटें जीत कर कांग्रेस की सरकार बनी थी.

    1800 से 3000 मौतों वाला नरसंहार

    असम के मुसलमान
    Reuters
    असम के मुसलमान

    असम में मेरी ड्यूटी के दौरान एक बहुत बड़ा नरसंहार ग्राम नेल्ली ज़िला नौगाँव में हुआ था. यह घटना मतदान के चार दिन बाद 18 फरवरी 1983 को हुई थी. इसमें 13 असमिया गाँव के लोगों ने असलहों और अन्य हथियारों से लैस होकर नेल्ली गाँव की मुस्लिम बस्ती पर हमला किया था.

    यह नरसंहार सवेरे 8 बजे शुरू होकर 3 बजे तक चला था. सरकारी आंकड़े के अनुसार 1800 लोग मारे गए थे जबकि गैर-सरकारी आंकड़ा 3000 का है. इस जनसंहार के बाद पूरे असम में बांग्लाभाषियों में बहुत दहशत फ़ैल गई थी.

    बाद में कई जांचों में पाया गया कि प्रशासन को उपरोक्त हमले की तैयारी की सूचना 15 फरवरी को ही मिल गयी थी लेकिन उसकी रोकथाम के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गई और इसके लिए न ही किसी अधिकारी को दंडित किया गया.

    असम में इस तरह की घटनाएँ जनवरी से लेकर अप्रैल तक होती रहीं. कई जगह बांग्लाभाषी मुसलामानों ने भी असमिया लोगों के गाँव पर हमले किए थे और कई जगह कबीलों ने भी हिंसा की थी. इस सबकी जड़ में बांग्लाभाषी मुसलमानों को भगाने का मामला ही था.

    जनवरी में चुनाव से लेकर मुझे कुल आठ महीने असम में रहने का मौका मिला. इस दौरान मैंने पाया कि चुनाव को लेकर असमिया और बांग्लाभाषी मुसलमान और हिन्दुओं में हुई हिंसा ने एक बहुत बड़ी दूरी और शत्रुता के भाव को जन्म दे दिया था जो आज तक चला आ रहा है.

    और अब ताज़ा हाल

    असम के मुसलमान
    Reuters
    असम के मुसलमान

    अब 2004 में सेवानिवृत्त होने के बाद असम में नागरिकता की पहचान के लिए चल रहे राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) की कार्यवाही का जायज़ा लेने मुझे यूनाइटेड अगेंस्ट हेट (UAH) के सौजन्य से एक फैक्ट फाइंडिंग टीम के साथ 28 जून से 2 जुलाई तक फिर असम जाने का मौका मिला.

    हमारे साथ कई वरिष्ठ पत्रकार भी थे. हम लोगों ने गुवाहाटी में पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और प्रफुल्ल महंता से भी एनआरसी के बारे में बातचीत की. हम लोग बारपेटा, गोआलपाड़ा तथा बोनगईगाँव जिले में बहुत सारे डी-वोटर (संदिग्ध वोटर) और विदेशी घोषित किए गए लोगों और डी-वोटर एवं विदेशी घोषित करके गिरफ़्तार किए गए लोगों के परिवारों से मिले.

    एनआरसी के संबंध में काम कर रही कई संस्थाओं के सदस्यों से भी मिले. हम लोग एनआरसी समन्वयक के कार्यालय में अतिरिक्त समन्वयक कलिता से भी मिले.

    इस फैक्ट फाइंडिंग अभियान के दौरान कई लोगों से बातचीत करके हम इन निष्कर्षों तक पहुंचे:-

    1. एनआरसी प्रक्रिया का सभी पक्षों ने स्वागत किया है क्योंकि लोग बांग्लादेशी के टैग से मुक्त होना चाहते हैं.

    2. एनआरसी तैयार करने हेतु अपनाई गई प्रक्रिया में बहुत सारी कमियां रही हैं.

    3. एनआरसी सेवा केंद्रों पर काम करने वाले अधिकतर कर्मचारी असमिया हैं. उनके बांग्लाभाषियों के लिए पूर्वाग्रह के कारण उनके मामलों को सहानुभूतिपूर्वक न देखकर छोटी-छोटी त्रुटियों के कारण प्रस्तुत अभिलेखों को रद्द कर दिया गया है.

    4. असम में 1997 में चुनाव आयोग की ओर से अपनाई गई डी-वोटर की अवधारणा अवैधानिक है. यह सर्वविदित है कि कोई व्यक्ति या तो वोटर हो सकता है या वोटर नहीं हो सकता. हमारे संविधान में ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं है. हैरानी की बात है कि इसे अब तक किसी कोर्ट में चुनौती नहीं दी गई.

    5. नागरिकों को डी-वोटर घोषित करके या विदेशी ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी होने की राय व्यक्त करने पर गिरफ़्तार करके जेल में डालना ग़लत है. इस समय असम में लगभग 1900 लोग जेलों में बंद हैं जिनमे आधी शादीशुदा औरतें हैं. उनके साथ छोटे छोटे बच्चे भी हैं. इन जेलों की व्यवस्था नरक जैसी है.

    6.2016 में असम में भाजपा की सरकार बनने पर विदेशी ट्रिब्यूनल में ज्यूडिशिएल अधिकारियों की जगह पांच साल की प्रैक्टिस वाले 30 वकीलों को नियुक्त किया गया है जिनमें कई का संबंध कथित तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से है.

    7.गुवाहाटी उच्च न्यायालय में विदेशी क़रार दिए गए नागरिकों के मामलों को कई वर्षों से एक ही जज उज्जल भुयां सुनते आ रहे हैं जिनकी निष्पक्षता पर सवाल उठते रहे हैं. यह आश्चर्य की बात है कि इस बेंच पर रोटेशन से जज क्यों नहीं बदला गया. शिकायत होने पर अब 4 जुलाई को उन्हें हटा दिया गया है.

    8. नागरिकता सिद्ध करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत सचिव द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र को भी सुबूत के तौर पर मान्यता देने की बात कही थी लेकिन एनआरसी में इसे वैध न मान कर अन्य सबूत मांगे गए.

    9.कई नागरिकों ने शिकायत की कि उन्हें विदेशी ट्रिब्यूनल में पेश होने का नोटिस या तो मिला ही नहीं या फिर बहुत देरी से मिला जिस कारण वे उपस्थित नहीं हो सके और उनके मामले का निस्तारण एक्स पार्टी हो गया.

    'बांग्लाभाषियों में भय'

    असम के मुसलमान
    BBC
    असम के मुसलमान

    उपरोक्त विवरण से साफ़ है कि हालांकि सभी पक्ष एनआरसी ऑपरेशन से सहमत थे, लेकिन उसे तैयार किए जाने की प्रक्रिया और उसमें लगे अधिकतर कर्मचारियों के असमिया होने के कारण बांग्लाभाषी लोगों के प्रति उपेक्षा के कारण लोगों के मामले छोटी छोटी त्रुटियों के कारण रद्द करने के आरोप लगे हैं.

    इसका नतीजा यह हुआ है कि अब 30 जुलाई को जारी किए गए एनआरसी ड्राफ्ट में 40,07,707 लोग सूची से बाहर हो गये हैं जो एक बहुत बड़ी संख्या है.

    यह भी एक अजीब बात है कि जहाँ एक तरफ गृह मंत्री राजनाथ सिंह यह कह रहे हैं कि इन लोगों के साथ कोई भी विदेशियों वाली कार्रवाई नहीं की जाएगी और उनकी नागरिकता के मामले के अंतिम निस्तारण तक उनकी नागरिकता यथावत बनी रहेगी.

    दूसरी ओर वही मंत्री एनआरसी के प्रकाशन के दो दिन पहले घोषणा करते हैं कि भारत की सबसे बड़ी जेल का निर्माण असम में किया जाएगा. क्या समझा जाए कि वह उन्हें दिलासा दे रहे हैं या डरा रहे हैं? इसके साथ ही भाजपा नेता अमित शाह और कैलाश विजयवर्गीय उन्हें लगातार घुसपैठिये कह रहे हैं.

    हमें याद रखना चाहिए कि यह लाखों लोगों के जीवन-मरण का प्रश्न है. मुझे आज बांग्लाभाषी लोगों के मन में वैसा ही भय और निराशा नजर आ रहा है जो मैंने 1983 में नेल्ली नरसंहार के बाद देखा था. कहीं ऐसा न हो कि यह भय और निराशा आक्रोश और प्रतिशोध का रूप धारण कर ले.

    अगर इस मामले में हिन्दू-मुस्लिम राजनीति की गई तो यह पहले से ही अशांत उत्तर-पूर्व की समस्या को और बढ़ा सकता है. कहीं ऐसा न हो कि वह उत्तर-पूर्व में एक और कश्मीर को जन्म दे दे.


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    BBC Hindi
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    English summary
    I have seen Indias biggest massacre

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