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कैसे मनाया गया था देश का पहला गणतंत्र दिवस?

By Bbc Hindi
गणतंत्र दिवस
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गणतंत्र दिवस

आज जब हिंदुस्ता स मनाने के लिए तैयार है, ऐसे में आज से 68 साल पहले दिल्ली में किस तरह भारत का पहला गणतंत्र दिवस मनाया गया, इसे याद करना अपने आप में बेहद दिलचस्प है.

उस दिन गणतंत्र दिवस की परेड पुराना क़िला के सामने ब्रिटिश स्टेडियम में हुई थी. इस जगह आज दिल्ली का चिड़ियाघर हैं और स्टेडियम की जगह पर नेशनल स्टेडियम मौजूद है.

देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जैसे ही गणतंत्र भारत में पहली बार तिरंगा झण्डा लहराया, इसी के साथ परेड की शुरुआत हो गई. सबसे पहले तोपों की सलामी दी गई जिससे पुराना क़िला गूंज उठा.

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी वहां मौजूद थे, उनके साथ सी राजगोपालाचारी भी थे, वे अंतिम ब्रिटिश वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन की जगह गवर्नर-जनरल का पद संभाल रहे थे.

राष्ट्रमंडल देशों में शामिल हुआ भारत

गणतंत्र दिवस का अर्थ था कि भारत अपनी ज़मीन से विदेशी राज के अंतिम निशान मिटाकर गणतंत्र राष्ट्रों की मंडली में शामिल होने जा रहा था.

किंग जॉर्ज VI ने भारत को अपनी ओर से शुभकामनाएं भेजी थीं और इसका आभार भी जताया कि नए स्वतंत्र हो रहे देश राष्ट्रमंडल देशों में शामिल होंगे.

हालांकि कुछ समय बाद ही किंग का निधन हो गया, भारत में इस शोक समाचार पर श्रद्धांजलि स्वरूप सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा की गई थी.

पहले गणतंत्र दिवस के समय ये अफ़वाहें भी उड़ी थीं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने 'दिल्ली चलो' आह्वान पर एक बार फ़िर सभी के सामने प्रकट हो सकते हैं.

राजपथ पर नहीं निकली थी परेड

1950 में हुई गणतंत्र दिवस परेड आज की तुलना में उतनी भव्य नहीं थी लेकिन फ़िर भी वह अपने आप में छाप छोड़ने लायक और भारतवासियों के दिलों में यादगार बनने योग्य तो थी ही.

थल, वायु और जल सेनाओं की कुछ टुकड़ियों ने इस परेड में हिस्सा लिया था, हालांकि उस समय किसी तरह की झाकियां नहीं निकाली गई थीं.

जिस तरह मौजूदा वक्त में गणतंत्र दिवस की परेड राजपथ से होते हुए लाल क़िले तक जाती है, वैसा उस समय नहीं हुआ था. उस वक्त परेड स्टेडियम में ही हुई थी.

हवाई करतब दिखाने वाले जहाज़ों में जेट या थंडरबोल्ट शामिल नहीं थे, इनकी जगह डकोटा और स्पिटफ़ायर जैसे छोटे विमानों ने ये किया था.

जनरल फ़ील्ड मार्शल करिअप्पा भारतीय सेनाओं के पहले प्रमुख थे, जिन्हें ब्रिटिश-भारतीय सेना में कई पदक प्रदान किए गए थे.

जवानों की अपनी एक टुकड़ी को उन्होंने फ़ौजी हिंदी में कहा था, ''आज हम भी आज़ाद, तुम भी आज़ाद और हमारा कुत्ता भी आज़ाद''. उनकी आवाज़ ने वहां जोश का एक अलग ही माहौल पैदा कर दिया था.

गणतंत्र दिवस
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चांदनी चौक की चमक

हाजी ज़हूरुद्दीन जो कि साल 1901 में रानी विक्टोरिया के निधन के वक्त एक स्कूली छात्र थे. पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर उनका जामा मस्जिद इलाके में एक होटल था, वे उस दिन हाजी कलां की सबसे मशहूर दुकान से मिठाइयां खरीद कर लाए थे और उन्होंने पूरे इलाक़े में बंटवाईं थीं.

चांदनी चौक में घंटेवाला हलवाई की तरफ़ से पूरे इलाके में मिठाइयां बांटी गई थीं, उन्होंने अपनी दुकान 18वीं सदी के अंत में शाह आलम के शासनकाल के दौरान शुरू की थी.

पहले गणतंत्र दिवस के दिन चांदनी चौक कई रंगों में सजा था. लाल मंदिर से लेकर फ़तेहपुरी मस्जिद तक लोगों की भीड़ हाथों में फूल मालाएं और तिरंगे लेकर मौजूद थी.

फूलमंडी के दुकानदारों ने गुलाब के पंखुड़ियों की बारिश कर दी थीं. लोग एक-दूसरे को बधाइयां दे रहे थे, उन्हें इस बात का एहसास था कि वे अब पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त कर चुके हैं.

गुरुद्वारा शीश गंज में बहुत बड़े लंगर का आयोजन किया गया था. इसी तरह गुरुद्वारा बंगला साहिब और रकाबगंज में भी सैकड़ों की तादाद में लोग पूरी-सब्जी और हलवा खाने के लिए लंबी क़तारों में खड़े देखे जा सकते थे.

लंगर
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लंगर

सबसे फ़ैशनवाला बाज़ार कनॉट प्लेस

कनॉट प्लेस की ख़ूबसूरती तो उस दिन देखते ही बन रही थी, ऐसा हो भी क्यों ना आखिर यह राजधानी का सबसे फ़ैशनवाला बाज़ार जो था.

कनॉट प्लेस के गलियारों में नाचते झूमते राम लाल को देखा जा सकता था. राम लाल ब्रिटिश सैनिकों के पैरों की मसाज किया करते थे. लाल क़िले के आस पास तैनात अंग्रेज जवान अक्सर शनिवार और रविवार को उनके पास अपने पैरों की मसाज करवाने आते थे.

बूढ़े हो चुके राम लाल उस वक्त को याद करते हुए बताते हैं कि एक जवान ने उन्हें 100 रुपये का नोट पकड़ा दिया था, जब वे बाकी बचे पैसे देने उसके पीछे भागे तो जवान को लगा कि वे उनसे और पैसे मांगने के लिए आ रहे हैं और इसी वजह से उस जवान ने रामलाल पर बंदूक तान दी. उस समय 100 रुपये का एक नोट आज के 1000 रुपये के बराबर था.

फ़तेहपुरी में रहने वाले मुस्लिम परिवारों ने अपने-अपने घरों में स्वादिष्ट पकवान बनाए थे. मटिया महल के कई होटल जैसे करीम और जवाहर ने भिखारियों के लिए मुफ़्त खाने की व्यवस्था की थी. कबाब और दूध विक्रेताओं ने अपने ग्राहकों के लिए भारी छूट दी थी.

कनॉट प्लेस
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युवा लड़कियों का नृत्य

रात के वक्त सभी निजी और सार्वजनिक भवनों को खूबसूरत रौशनियों से सजाया गया था. वायसरॉय भवन जो अब राष्ट्रपति भवन बन चुका है, उसे किसी दुल्हन की तरह सजाया गया था.

इसके अलावा संसद भवन, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, केंद्रीय सचिवालय, इंडिया गेट और ऑल इंडिया रेडियो की इमारतें सभी एक से बढ़कर रौशनियों से नहा रही थीं.

नई दिल्ली के बड़े-बड़े होटलों और रेस्टोरेंट में नाच गाने के कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, इनमें प्रमुख थे डेविकोस और गेलोर्ड होटल. एंग्लो-इंडियन क्लब की तरफ़ से की गई डांस प्रस्तुति की सभी जगह चर्चा थी.

इस आयोजन में हिस्सा लेने के लिए सेंट जॉर्ज इंग्लिश मीडियम स्कूल के प्रिंसिपल की बेटियां आगरा से दिल्ली आई थीं. तीनों लड़कियों की खूबसूरती की चारों ओर चर्चा थी.

वहां मौजूद कई युवा पुरुष जवान लड़कियों पर अपना दिल हार रहे थे. लड़िकयां ऊंची हील और स्कर्ट पहने मौजूद थीं. उसी दौरान हुई एक घटना में जिम्मी परेरा नामक युवक को अपना दांत तक खोना पड़ गया था, दरअसल उनकी गर्लफ्रेंड पर किसी दूसरे लड़के ने कुछ फब्तियां कस दी थीं. और इस वजह से दोनों युवकों के बीच लड़ाई हो गई थी.

एंग्लो-इंडियन संगठन के अध्यक्ष सर हेनरी गिड्ने और उपाध्यक्ष फ्रैंक एंथनी ने भाषण दिए थे, उन्होंने लोगों को नए गणतंत्र राष्ट्र की शुभकामनाएं दीं और देश के प्रति निष्ठा की शपथ दिलवाई.

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राष्ट्रपति भवन का रात्रिभोज

इस बीच सबसे ज़्यादा चर्चा जिस बात की थी वह था राष्ट्रपति भवन में होने वाला रात्रिभोज. पंडित नेहरू अपनी बेटी इंदिरा गांधी के साथ वहां मौजूद थे, उनके साथ कई अन्य नेता जैसे राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, सरदार बलदेव सिंह और कपूरथला की राजकुमारी अमृत कौर भी मौजूद थे.

कश्मीरी गेट इलाके में रहने वाले पंडित रामचंदर उस समय 90 साल के थे, उन्होंने याद करते हुए बताया था कि उन्होंने कभी भी दिल्ली को इतने भव्य रूप में नहीं देखा था, यहां तक कि रानी विक्टोरिया की गोल्डन जुबली के वक्त भी नहीं.

सर हेनरी गिड्नी ने उस वक्त एक बात कही थी, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता. उन्होंने कहा था कि भारत वह धरती है जहां सभ्यता अपने चरम तक पहुंच चुकी थी, वह अब दोबारा उसी सभ्यता को प्राप्त करने की तरफ कदम बढ़ाएगा. हेनरी का जन्म 1873 में हुआ था और उन्होंने पूर्वोत्तर भारत में अंग्रेजों के अभियान में हिस्सा लिया था.

अपने इस कथन के साथ वे एक तरह से महान जर्मन भाषाविद मैक्स म्युलर की बात दोहरा रहे थे. मैक्स म्युलर ने कहा था, गणतंत्र दिवस की इस धूमधाम के बीच, रौशनी की चमक बिखेरते अंतिम दिए के बुझने से पहले, तमाम मुशायरों और कवि सम्मेलनों के ज़रिए इस यादगार मौके पर वह स्वप्न जीवित रहना चाहिए, अल्लामा इक़बाल के ये अमर शब्द हमेशा फ़िजाओं में गूंजते रहने चाहिए-

''हिंदी हैं हम, वतन हैं, हिन्दुस्तान हमारा!''

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English summary
How was the country's first Republic Day celebrated?

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