अमेठी से वायनाड की दौड़ में क्या हासिल करेंगे राहुल गांधी?
नई दिल्ली- जब से राहुल गांधी के केरल में वायनाड लोकसभा क्षेत्र से भी चुनाव लड़ने का ऐलान हुआ है इसको लेकर तरह-तरह की बातें आ रही हैं। कांग्रेस का दावा है कि उनके जरिए पार्टी दक्षिण भारत में स्थिति मजबूत करना चाहती है। इसके लिए वो इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी के भी दो अलग-अलग मौकों पर दक्षिण भारत से चुनाव लड़ने का हवाला दे रही है। जबकि, बीजेपी का दावा है कि राहुल के लिए इस बार अमेठी सुरक्षित नहीं रह गई है, इसलिए वे अपने लिए सबसे सेफ सीट की तलाश करते-करते वायनाड तक पहुंच गए। लेकिन, इन सब के बीच एक विश्लेषण होना बहुत जरूरी है। वह ये कि राहुल के इस फैसले से खुद को नरेंद्र मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताने वाले राहुल के सियासी कद पर क्या असर पड़ेगा? क्या वे एक ऐसे कांग्रेसी नेता के रूप में उभरेंगे, जिनका पूरे देश में एक जैसा प्रभाव होगा या फिर देश की राजनीतिक दिशा तय करने वाले हिंदी हार्टलैंड (Hindi Heartland)में ही उनका कद छोटा पड़ जाएगा?

क्या छवि इस तरह से बदलेगी?
राहुल के फैसले ने यह संदेश दिया है कि हिंदी हार्टलैंड (Hindi Heartland) खासकर उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी को चुनौती वे नहीं, उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा दे रही हैं। उन्होंने प्रयागराज से लेकर मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी तक की गंगा बोट यात्रा और अयोध्या तक में अपनी सियासी पहचान बनाने की कोशिश की है। वे फिलहाल खुद चुनाव नहीं लड़ रही हैं, लेकिन मौजूदा चुनाव में देश के सबसे बड़े राज्य में मोदी के मुकाबले वही कांग्रेस की चेहरा बन गई हैं। अगर कोई कांग्रेसी ये तर्क देता है कि केरल से चुनाव लड़ने से राहुल असल मायने में अपनी दादी और मां की तरह राष्ट्रीय नेता के तौर पर उभर रहे हैं, तो कोई उनसे ये पूछे कि क्या यूपी को अकेली बहन के कंधों पर छोड़कर क्या वे अपने इस मकसद को पूरा कर सकते हैं? अगर यूपी में मोदी का सामना अकेले प्रियंका करेंगी, तो कोई चाहे या न चाहे संदेश तो यही जाएगा कि राहुल से हो नहीं पाता, इसलिए बहन प्रियंका को आगे करना पड़ा? क्या इस छवि के साथ राहुल एक राष्ट्रीय नेता के रूप में उभर पाएंगे? आम भावना तो यही बनेगी कि राहुल तो केरल चले गए, उत्तर प्रदेश में मोदी से लड़ने के लिए अकेली प्रियंका को छोड़ दिया? क्योंकि, दिल्ली की सियासत उत्तर प्रदेश से तय होनी है, केरल के वायनाड से नहीं।

पीएम पद पर दावेदारी की गंभीरता पर सवाल
2014 के चुनाव के बाद से मोदी की शख्सियत ने भारत में लोकप्रियता का एक नया मानक गढ़ा है, इस बात से शायद उनके घनघोर आलोचक भी इनकार नहीं करेंगे। आज की तारीख में मोदी जितना बड़ा राजनीतिक कद का नेता न तो बीजेपी में है और न ही कांग्रेस में। इस बात में भी कोई दो राय नहीं हो सकती कि राहुल को मोदी की लोकप्रियता से मुकाबला करना है, जिसमें वे काफी पीछे हैं। मोदी की वजह से आज वाराणसी पर पूरे देश और दुनिया की नजरें लगी हुई है और राहुल ने वहीं से अपने को दूर कर लिया है? कांग्रेस के मैनेजरों ने और खुद उन्होंने भी अपने को एक गंभीर राजनीतिक व्यक्तित्व के तौर पर पेश करने के लिए सालों तक कड़ी मेहनत की है, उन्हें कई तरह की ट्रेनिंग मिलने की चर्चा होती है, ताकि वे एकदिन भारत की अगुवाई कर सकें, मोदी की राजनीतिक चुनौती का सामना कर सकें। क्या उनके वायनाड से चुनाव लड़ने के एक फैसले से उनके सभी प्रयासों को झटका नहीं लगा है? सवाल ये क्यों नहीं उठेगा कि जब प्रियंका मोदी से मुकाबला करने की सबसे कठिन चुनौती का सामना अकेले कर सकती हैं, तो उन्हें ही कांग्रेस के प्रचार अभियान या फिर नेतृत्व का चेहरा क्यों नहीं होना चाहिए?

अगर दक्षिण में लड़ना था तो वायनाड ही क्यों?
कांग्रेसी ये दलील देते हैं कि उनके वायनाड से चुनाव लड़ने से एक साथ केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में पार्टी को फायदा मिल सकता है। क्योंकि, ओपिनियन पोल में इस इलाके में उन्हें मोदी से बेहतर माना गया है। लेकिन, इन दावों का जमीनी असलियत कुछ अलग है। सच्चाई तो ये है कि 2014 में उन्हें अमेठी में जीतने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। स्मृति ईरानी ने बीते 5 वर्षों में वहां अपनी जमीन और मजबूत की है। यह भी गौर करने लायक तथ्य है कि 2017 के विधानसभा चुनावों में अमेठी की चारों विधानसभा सीटों में कांग्रेस हार चुकी है।
अगर कोई तर्क दे कि पिछले चुनाव में मोदी ने भी तो वडोदरा और वाराणसी से एक साथ चुनाव लड़ा था। लेकिन, मोदी ने गुजरात से बाहर काशी की वह सीट चुनी थी, जो हिंदुत्व की प्रतीक थी, जिसकी ताकत के बदौलत उन्हें हिंदी हार्टलैंड में बड़ी जीत मिल सकती थी और आखिरकार उनका आकलन सही भी हुआ। बीजेपी गुजरात में भी सभी सीटें जीत गई और यूपी में भी इतिहास रच दिया। जबकि, तब वोटरों के समीकरण से वह सीट मोदी के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी गई थी।
लेकिन, राहुल के लिए वायनाड का महत्त्व सिर्फ इतना है कि उनके लिए इससे ज्यादा सेफ सीट शायद कोई मिल नहीं सकती थी। पिछले दो चुनावों से वहां कांग्रेस आसानी से जीत रही है और वहां मतदाताओं का समीकरण भी ऐसा है, जहां कम से कम बीजेपी उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। यूं कहें कि 2014 में वाराणसी को मोदी ने चुनौती के रूप में स्वीकार किया था, तो 2019 में राहुल ने वायनाड को अपनी सियासी सुरक्षा के लिए कबूल फरमाया है। पिछले कुछ वर्षों में राहुल ने सत्ताधारी बीजेपी के खिलाफ जो आक्रामक तेवर अपनाया था, उसके मुकाबले उनका यह फैसला एकदम उलट है। इसमें वह पूरी तरह रक्षात्मक होते दिख रहे हैं। अगर 1980 में इंदिरा गांधी और 1999 में सोनिया गांधी के कर्नाटक से चुनाव लड़ने की बात करें, तब उनका यूपी और बाकी हिंदी हार्टलैंड में पार्टी के साथ अपने सियासी कद का भी दबदबा था। लेकिन, राहुल ने उस सीट को चुना है जिसकी अहमियत सिर्फ यही है कि वहां पर मतदाताओं का समीकरण उन्हें सूट करता है, जबकि उस सीट की केरल के स्थानीय राजनीति में भी कोई महत्त्व नहीं रहा है।
क्या इस फैसले के बाद कांग्रेस अध्यक्ष फ्रंट फूट (Front Foot) पर खेलने के अपने दावे को फिर से दोहरा पाएंगे? क्योंकि, उनका आचरण बैक फूट (Back Foot) वाला नजर आ रहा है।












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