तो अब आतंकियों की साजिश का कभी पता नहीं लगा पाएंगी एजेंसियां?
नई दिल्ली। अभी थोड़े दिनों पहले हमने आपको बताया था कि कैसे प्राइवेट सर्वर्स के जरिए आतंकी संगठन भारत में अब उधमपुर हमलों को अंजाम देते हैं। अब एक नई जानकारी सामने आ रही है और वह है कि पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन दिन पर दिन टेक्नोलॉजी को लेकर और ज्यादा एडवांस होते जा रहे हैं।
पहले से ज्यादा चौंकन्ने आतंकी
सुरक्षा एजेंसियां भी इस ओर उनकी सक्रियता को देखकर हैरान हैं। भारत में जब से लश्कर-ए-तैयबा ने 26 /11 को अंजाम दिया है उसके बाद से ही आतंकी अब उनके बीच होने वाली बातचीत को लेकर काफी चौकन्नें हो गए हैं। टेक्नोलॉजी के प्रयोग से लश्कर जैसे संगठन अब एजेंसियों के लिए एक बड़ा सवाल बनता जा रहा है।
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लाखों रुपए की सैलरी पर युवा इंजीनियर
लश्कर हमेशा से ही भारतीय एजेंसियों के लिए एक बड़ा सिरदर्द रहा है। यह संगठन टेक्नोलॉजी के लिहाज से बाकी संगठनों से काफी आगे है। लश्कर की अपनी एक खास टेक्नोलॉजी विंग है जिसमें युवाओं को भर्ती किया गया है। इन युवाओं को लश्कर की ओर से हर माह लाखों रुपए बतौर सैलरी मिलते हैं।
इन युवाओं पर जिम्मेदारी होती है कि वे लश्कर के लिए उन टेक्निकल रास्तों को खोजें जिससे संगठन को आतंकी हमलों के दौरान आतंकियों के साथ सुरक्षित संपर्क स्थापित करने में मदद मिले।
जम्मू कश्मीर के उधमपुर में हुए हमलों के बाद होने वाली जांच में एनआईए को इस बात का पता लगा कि कैसे लश्कर टेक्नोलॉजी के जरिए राज्य में घुसपैठ को अंजाम दे रहा है।
डेवलप कर लेते हैं खास एप
इन हमलों में हाथ लगे लश्कर के आतंकी मोहम्मद नावेद के पास से जानकारी मिली है कि लश्कर ने एक खास तरह की एप डेवलप की है। इस एप के जरिए आतंकियों ने आपस में सुरक्षित संपर्क स्थापित किया।
हमलों के दौरान इस एप को डेवलप किया गया और आतंकियों ने इसे डेवलप किया। इस एप के जरिए आतंकी आपस में कम्यूनिकेट कर रहे थे और आपस में मैसेज एक्सचेंज कर रहे थे।
एनआईए की मानें तो लश्कर जैसे संगठन अब हमलों के बाद किसी भी तरह का कोई सुराग नहीं छोड़ना चाहते हैं। लश्कर के सभी सदस्यों के पास इस तरह की कोई टेक्नोलॉजी नहीं है।
सिर्फ उन आतंकियों को यह एप मुहैया कराई गई है जो हमलों का हिस्सा बनते हैं। यह बिल्कुल फेसबुक के किसी ग्रुप की ही तरह है जिसमें हमलें में शामिल पांच से 10 आतंकियों को ही जगह मिलती है।













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