हिंडनबर्ग रिसर्च के नेट एंडरसन हीरो हैं या विलेन, इसे ऐसे समझें

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  • नेट एंडरसन ने 2017 में हिंडनबर्ग रिसर्च की स्थापना की थी.
  • हिंडनबर्ग ने अब तक कई अमेरिकी कंपनियों को निशाना बनाया है.
  • कंपनी का नाम नाज़ी जर्मनी के एक नाकाम स्पेस प्रोजेक्ट पर रखा गया है.
  • अदानी वाली रिपोर्ट हिंडनबर्ग की 19वीं रिपोर्ट है.
  • हिंडनबर्ग का कहना है कि अदानी समूह ने 88 में से 62 सवालों के जवाब नहीं दिए हैं.

हिंडनबर्ग जैसी शॉर्ट सेलिंग कंपनियाँ अपने रिसर्च से निवेशकों का पैसा डूबने से बचाती हैं जैसा कि उनका दावा है, या फिर वो शेयर बाज़ार को नुक़सान पहुँचाकर अपनी जेब भरती हैं?

ये बहस अमरीका में सालों से चल रही है जहाँ हिंडनबर्ग जैसी कंपनियाँ क़ानूनन काम कर रही हैं. उन्हें पसंद करने वाले भी हैं और उनके दुश्मनों की भी कमी नहीं है.

हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट की सनसनीखेज़ हेडलाइन दी थी--'कॉर्पोरेट इतिहास में सबसे बड़ा धोखा', अदानी समूह ने रिपोर्ट को झूठ क़रार दिया.

हिंडनबर्ग के आलोचक कह रहे हैं कि उसकी रिपोर्ट 'तेज़ी से आगे बढ़ते भारत को नीचे खींचने की कोशिश' है.

आम तौर पर शेयर के दाम ऊपर जाने पर पैसा बनता है, लेकिन शॉर्ट सेलिंग में दाम गिरने पर पैसा कमाया जाता है. इसमें किसी ख़ास शेयर में गिरावट के अनुमान पर दांव लगाया जाता है.

दरअसल, हिंडनबर्ग जैसे ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलर्स कुछ ख़ास कंपनियां के शेयर की क़ीमत में गिरावट पर दांव लगाते हैं, फिर उनके बारे में रिपोर्ट छापकर निशाना साधते हैं.

वे इस काम के लिए ऐसी कंपनियों को चुनते हैं जिनके बारे में उन्हें लगता है कि उनके शेयरों की क़ीमत वास्तविक मूल्य से बहुत ज़्यादा है, या फिर उनकी नज़र में वो कंपनी अपने शेयर-धारकों को धोखा दे रही है.

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ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलर क्या काम करते हैं?

नेट एंडरसन ने साल 2017 में हिंडनबर्ग रिसर्च की स्थापना की थी.

अमेरिका की एक शॉर्ट सेलिंग कंपनी स्कॉर्पियन कैपिटल के चीफ़ इन्वेस्टमेंट ऑफ़िसर कीर कैलॉन के मुताबिक़, हिंडनबर्ग प्रतिष्ठित संस्था है और उनकी रिसर्च को भरोसेमंद माना जाता है. उसकी वजह से अमेरिका में कई मौक़ों पर भ्रष्ट कंपनियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई है.

न्यूयॉर्क से शॉर्ट सेलिंग पर न्यूज़ लेटर "द बीयर केव" निकालने वाले एडविन डॉर्सी बताते हैं हिंडनबर्ग रिसर्च जैसी ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलिंग फ़र्म के रिपोर्ट जारी करने के दो प्रमुख कारण होते हैं. पहला, ग़लत काम की कलई खोलकर मुनाफ़ा कमाना और दूसरा, न्याय और उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना.

एडविन डॉर्सी कहते हैं, "ये देखकर बेहद निराशा होती है कि चंद लोग शेयरधारकों की क़ीमत पर अमीर हो रहे हैं, और शायद धोखेबाज़ी कर रहे हैं. ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलिंग की रिपोर्टें एक तरह की खोजी पत्रकारिता है, लेकिन मुनाफ़े की प्रेरणा थोड़ी अलग है. मैं नेट और हिंडनबर्ग को काफ़ी सराहनीय मानता हूँ."

ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलर रिपोर्ट के साथ-साथ सोशल मीडिया का भी जमकर इस्तेमाल करते हैं, लेकिन कई आम निवेशक ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलिंग फ़र्म्स को पसंद नहीं करते क्योंकि दाम नीचे गिरने से उनके निवेश पर बुरा असर पड़ता है.

आश्चर्च की बात नहीं कि कई कंपनियां भी उन्हें पसंद नहीं करतीं. साल 2021 में एलन मस्क ने शॉर्ट सेलिंग को एक घोटाला बताया था.

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शॉर्ट सेलिंग कंपनी स्कार्पियन कैपिटल के चीफ़ इन्वेस्टमेंट ऑफ़िसर कीर कैलॉन अदानी मामले को भारत का 'एनरॉन मोमेंट' बताते हैं.

वो कहते हैं, "ये रोचक बात है कि अडानी और एनरॉन दोनो इन्फ़्रास्ट्रक्चर कंपनियां हैं जिनके मज़बूत राजनीतिक संबंध रहे हैं."

साल 2001 में एनरॉन भारी आर्थिक नुक़सान छिपाने के बाद दीवालिया हो गई थी, उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के एनरॉन प्रमुख केन ले और कंपनी अधिकारियों से नज़दीकी संबंध थे.

अदानी की आर्थिक हालत एनरॉन जैसी तो नहीं है, लेकिन उन पर केन ले की तरह सरकार से अतिरिक्त निकटता के आरोप लग रहे हैं.

कैलॉन कहते हैं, "मज़बूत और साफ़-सुथरी कंपनियों को शॉर्ट सेलर रिपोर्टों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता. अगर कोई व्यक्ति गूगल, फ़ेसबुक या माइक्रोसॉफ़्ट के बारे में लिखेगा तो लोग उस पर हँसेंगे और स्टॉक पर कोई असर नहीं पड़ेगा."

हिंडनबर्ग प्रमुख नेट ऐंडरसन के बारे में वो कहते हैं, "उनकी ज़बर्दस्त साख है. उनके शोध की विश्वसनीयता है. उसका बहुत असर हुआ है."

अमेरिका में कोलंबिया लॉ स्कूल के प्रोफ़ेसर जोशुआ मिट्स ने शॉर्ट सेलिंग की आलोचना करने वाला एक चर्चित पेपर 'शॉर्ट ऐंड डिस्टॉर्ट' लिखा.

जोशुआ कहते हैं, "जिस वजह से वॉल स्ट्रीट में कई लोग नेट एंडरसन की इज़्ज़त करते हैं वो ये है कि वो अपने बारे में खुलकर बोलते हैं. इसका ये मतलब नहीं कि खुलकर बोलने वाला सच ही बोल रहा हो. कुछ लोगों ने उन पर सवाल उठाए हैं, लेकिन उन्होंने हाल के सालों में अमेरिका की सबसे बड़ी धोखेबाज़ियों को उजागर किया है."

अमेरिका में जस्टिस डिपार्टमेंट को सलाह देने वाले जोशुआ मिट्स कहते हैं, "हम कहते हैं कि कंपनियों को पारदर्शी होना चाहिए, सीधी बात करनी चाहिए कि वो निवेशकों के पैसे से क्या कर रहे हैं. उसी तरह हमें ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलर्स से भी कहना चाहिए कि वो पारदर्शी रहें और सीधी बात करें."

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हिंडनबर्ग की सबसे नामी रिपोर्ट

हिंडनबर्ग पर इस रिपोर्ट की टाइमिंग, या फिर उन्हें कितना मुनाफ़ा हुआ, इस पर कई सवाल उठे हैं. हमने नेट ऐंडरसन से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन हमें कोई जवाब नहीं मिला.

हिंडनबर्ग की वेबसाइट के मुताबिक़ अभी तक अदानी वाली रिपोर्ट को मिलाकर 19 रिपोर्टें लिखी हैं, और सबसे नामी रिपोर्ट सितंबर 2020 में जारी हुई थी. इसमें निकोला नाम की अमेरिकी इलेक्ट्रिक ऑटो कंपनी का भंडाफोड़ किया गया था.

एक वक्त 30 अरब डॉलर की मार्केट कैपिटल वाली कंपनी निकोला ने ज़ीरो कॉर्बन उत्सर्जन के भविष्य का सपना दिखाया और जनवरी 2018 में एक हाइवे पर बैटरी से चलने वाले 'निकोला वन सेमी-ट्रक' के तेज़ रफ़्तार से चलने का वीडियो जारी किया.

हिंडनबर्ग ने जाँच के बाद अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि दरअसल सेमी-ट्रक को पहाड़ के ऊपरी हिस्से पर घसीटकर ले जाया गया और फिर ढलान पर फ़िल्म किया गया.

साल 2015 में स्थापित निकोला ने आरोपों से इनकार किया, लेकिन बाद में कंपनी प्रमुख ट्रेवर मिल्टन को इस्तीफ़ा देना पड़ा. हिंडनबर्ग की रिपोर्ट छपते ही कंपनी के शेयर करीब 24 प्रतिशत गिरे. निकोला पर 12 करोड़ डॉलर से अधिक का जुर्माना लगा.

साल 2021 में मिल्टन पर धोखेबाज़ी के आरोप साबित हुए.

अदानी की बात करें तो हिंडनबर्ग के आरोपों पर कंपनी ने सभी आरोपों से इनकार किया, जिसके जबाव में हिंडनबर्ग ने कहा कि अदानी ने उसके 88 में से 62 सवालों का जवाब नहीं दिया है.

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ अमेरिका का जस्टिस डिपार्टमेंट हिंडनबर्ग सहित क़रीब 30 शॉर्ट सेलिंग कंपनियों या उनके साथियों के बारे में व्यापार के संभावित दुरुपयोग को लेकर जानकारी इकट्ठा कर रहा है, हालांकि किसी पर कोई आरोप नहीं लगे हैं.

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अदानी
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हिंडनबर्ग ने अदानी को क्यों चुना?

न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अस्वत दामोदरन ने एक ब्लॉग में लिखा कि जब ये रिपोर्ट आई तो उन्हें आश्चर्य हुआ क्योंकि हिंडनबर्ग ने पूर्व में आम तौर पर ऐसी कंपनियों को निशाना बनाया है जो बहुत छोटी हों या फिर जिनके बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं हो, लेकिन अडानी एक बड़ी भारतीय कंपनी है जिसके बारे में इतनी बात होती है.

हिंडनबर्ग की पुरानी रिपोर्टें देखें तो वो अमेरिकी और चीनी कंपनियों के बारे में हैं तो फिर उन्होंने अपनी 19वीं रिपोर्ट के लिए अदानी को क्यों चुना?

न्यूयॉर्क में शॉर्ट सेलिंग पर न्यूज़ लेटर "द बीयर केव" निकालने वाले एडविन डॉर्सी के मुताबिक़, उन्हें नहीं पता कि हिंडनबर्ग ने अदानी की ओर देखना क्यों शुरू किया लेकिन "ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलर्स को जब कोई टिप मिलती है, कहीं से गुमनाम ईमेल आती है तो वो उस कंपनी की ओर देखना शुरू कर देते हैं."

वो कहते हैं, "कई बार कंपनी का स्टॉक जब बहुत तेज़ी से ऊपर जाता है तो ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलर का ध्यान उसकी ओर जाता है."

अप्रैल 2022 की एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़, गुज़रे दो सालों में अदानी के शेयर पैंडेमिक के बावजूद 18-20 गुना बढ़ गए थे.

शॉर्ट सेलिंग कंपनी स्कॉर्पियन कैपिटल चीफ़ इन्वेस्टमेंट ऑफ़िसर कीर कैलॉन कहते हैं, "अदानी स्पष्ट तौर पर निशाने पर थे. भारत के भीतर भी सालों से अदानी कंपनियों पर फ़्रॉड के आरोप लगते रहे हैं. कुछ साल पहले हमने शॉर्ट सेलर के तौर पर उस पर स्वतंत्र रूप से रिसर्च किया, फिर हमने ये सोचकर छोड़ दिया कि इसमें बताने लायक कोई बात नहीं, सब जगज़ाहिर है."

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अदानी समूह
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शार्ट सेलर्स पर अमेरिका में बढ़ी जांच

अदानी समूह हमेशा फ़्रॉड के हर आरोप से इनकार करता रहा है.

कोलंबिया लॉ स्कूल के प्रोफ़ेसर जोशुआ मिट्स के मुताबिक़, अमेरिका में ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलर्स को लेकर नियामक संस्थाओं की जांच बढ़ी है, इसलिए उन्होंने दूसरे बाज़ारों का रुख़ किया है जहाँ बाज़ार शायद इतने विकसित न हों.

वो कहते हैं, "अगर बाज़ार का रेग्युलेटर अमेरिका से पांच या दस साल पीछे हो तो, या फिर स्थानीय रेग्युलेटर बहुत स्मार्ट नहीं है तो शॉर्ट सेलर्स के इस तरह के कारनामे बहुत रोचक हो जाते हैं. ये सच है कि पिछले एक दशक में ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलर्स ज़्यादा-से-ज़्यादा ग्लोबल हो रहे हैं."

न्यूयॉर्क में शॉर्ट सेलिंग पर न्यूज़ लेटर "द बीयर केव" निकालने वाले एडविन डॉर्सी के मुताबिक़, अमेरिका की सबसे पहली बड़ी कंपनी सिट्रॉन रिसर्च थी जिसकी स्थापना एंड्र्यू लेफ़्ट ने की थी.

वॉल स्ट्रीट जर्नल के एक आंकड़े के मुताबिक़ साल 2001 से 2014 के बीच में सिट्रॉन ने 111 शॉर्ट सेल रिपोर्टें लिखीं, और हर सिट्रॉन रिपोर्ट छपने के बाद टारगेट शेयर के दाम में औसतन 42 प्रतिशत की गिरावट आई.

हालांकि एंड्र्यू ने साल 2013 में टेस्ला के बारे में कहा था कि कंपनी के शेयर के दाम कुछ ज़्यादा ही हैं और इलेक्ट्रिक कार एक सनक-सी है, लेकिन उसके बाद टेस्ला के शेयर के दाम और कारों की बिक्री में बढ़ोतरी दर्ज हुई.

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इस कारोबार में एक और बड़ा नाम कार्सन ब्लॉक का है जिनके बारे में अमेरिकी बाज़ारों को नियंत्रित करने वाली संस्था एसईसी के एक अधिकारी ने कहा था कि कॉर्सन ब्लॉक ने धोखेबाज़ी की घटनाओं पर एजेंसी से ज़्यादा रोशनी डाली है, और निवेशकों के पैसे बचाए हैं.

ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलर्स क्लब के नए सितारे नेट एंडरसन ने कुछ वक्त इसराइल में भी गुज़ारा है और उन्हें अमेरिकी मीडिया में 'जायंट किलर' भी बुलाया गया है.

एडविन डॉर्सी के मुताबिक़, अमेरिका में ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलिंग 20-25 साल पुरानी है और वहां ऐसी क़रीब 20 बड़ी कंपनियां हैं.

ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलिंग पर एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2022 में 113 नए और बड़े शॉर्ट कैंपेन आए, और हिंडनबर्ग सबसे सफल ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलिंग फ़र्म्स में से एक थी.

लेकिन मज़ेदार बात ये है कि अमेरिकी मीडिया कह रहा है कि बड़ी-बड़ी कंपनियों को ज़मीन पर लाने वाले ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलर्स पर भी अमेरिकी क़ानून की नज़र है.

साल 2018 में अमेरिकी बाज़ारों को नियंत्रित करने वाली संस्था एसईसी ने एक हेज फंड कंपनी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की थी, जिसे बाद में हर्जाना देना पड़ा था.

अमेरिका में कोलंबिया लॉ स्कूल के प्रोफ़ेसर जोशुआ मिट्स कहते हैं, "अगर कुछ पार्टियों की जांच हो रही है, इसका मतलब ये नहीं कि पूरी इंडस्ट्री या फिर एक इंडस्ट्री के हर भागीदार की जांच हो रही है."

वे कहते हैं, "अगर भारतीय सिक्योरिटीज़ रेग्युलेटर्स को इसे लेकर चिंता है तो वो देख सकते हैं कि अमेरिका क्या कर रहा है, और यहां कई सरकारी कार्रवाइयां हुई हैं."

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अमेरिका में क़ानूनी लड़ाई
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हिंडनबर्ग के ख़िलाफ़ चुनौती का भविष्य

फ़ाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ गौतम अदानी ने हिंडनबर्ग के ख़िलाफ़ क़ानूनी लड़ाई के लिए एक बड़ी और महंगी अमेरिकी लॉ फ़र्म को चुना है.

इससे पहले एक वक्तव्य में अदानी ने क़ानूनी रास्ता अपनाने की बात कही थी, जबकि हिंडनबर्ग ने कहा था कि अम़ेरिका में क़ानूनी प्रक्रिया के दौरान वो ढेर सारे दस्तावेज़ों की मांग करेंगे.

जानकारों के मुताबिक़, जिन कंपनियों को शॉर्ट सेलर्स निशाना बनाते हैं वो कई बार मानहानि का दावा करते हुए अदालत का रुख़ करती हैं, लेकिन वहां केस को साबित करना चुनौतीपूर्ण होता है.

वजह है अमेरिका में आज़ादी से बोलने के अधिकार को मिली क़ानूनी सुरक्षा.

अमेरिका में कोलंबिया लॉ स्कूल के प्रोफ़ेसर जोशुआ मिट्स के मुताबिक़, "अमेरिकी अदालतें बोलने की आज़ादी का बहुत ध्यान रखती हैं, और बहुत सारे ऐक्टिविस्ट शॉर्ट सेलर्स ये कहकर केस जीत गए कि उनका बोलने का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए. चाहे वो अपना मत व्यक्त कर रहे हों, या फिर रिपोर्ट में क्या लिखा हो, बोलने की आज़ादी शॉर्ट सेलर्स को एक कवच प्रदान करती है, चाहे कंपनी को क्यों न लगे कि रिपोर्ट ग़लत है."

हालांकि जोशुआ मिट्स ये भी कहते हैं कि "अगर शॉर्ट सेलर अपने शॉर्ट कैंपेन से जुड़े व्यवहार और आचरण को लेकर पारदर्शी नहीं है, तो ये उनके लिए क़ानूनी बोझ ज़रूर बन सकता है."

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भारत में शॉर्ट सेलिंग की स्थिति

अशोका यूनिवर्सिटी में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर गुरबचन सिंह के अनुसार, भारत में शॉर्ट सेलिंग होती है लेकिन बड़े स्तर पर नहीं, शॉर्ट सेलिंग पर सेबी के शॉर्ट पेपर में इसमें संभावित धोखेबाज़ी की बात की गई है, और बताया गया है कि किन वजहों से इस पर भारत में 1998 और 2011 में प्रतिबंध लगाया गया था.

जानकार बताते हैं कि जिस तरह की रिपोर्टें हिंडनबर्ग ने लिखी हैं, वैसी रिपोर्ट भारत में लिखना चुनौतीपूर्ण है.

सेबी के साथ रजिस्टर्ड रिसर्च विश्लेषक नितिन मंगल कहते हैं, "हमारे लिए आलोचना सहना बहुत मुश्किल होता है. हम आलोचना को सकारात्मक रूप से नहीं लेते. लोग मेरे रिसर्च की बहुत आलोचना करते हैं, लेकिन मुझे फ़र्क नहीं पड़ता."

मंगल के मुताबिक़, भारत में क़ानूनी कारणों से ऐसी रिसर्च कंपनियां नहीं हैं.

वे कहते हैं, "भारत में कंपनियां आपके ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई कर सकती हैं. आपके ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज कर सकती हैं. अमेरिका में प्रक्रिया बहुत अलग है."

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