रेप केस में बरी करते हुए जज ने बताया 'ना' का मतलब कई बार 'ना' नहीं होता
नई दिल्ली। लड़की की ना का मतलब हर बार ना ही नहीं होता है, कई बार ये अस्पष्ट होता है और एक कमजोर ना में 'हां' भी सकता है। सोमवार को ये टिप्पणी दिल्ली हाईकोर्ट ने फिल्म 'पीपली लाइव' के को-डायरेक्टर महमूद फारूकी को रेप के केस में बरी करते हुए की। महमूद फारूकी को 30 जुलाई को साकेत (दिल्ली) कोर्ट ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी की एक अमेरिकी रिसर्चर के साथ रेप का दोषी पाया था। इसमें उन्हें हुए सात साल की सजा सुनाई गई थी।

निचली अदालत से मिली सजा के खिला महमूद ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सोमवार को उन्हें अदालत ने बरी कर दिया। जज आशुतोष ने मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि हर बार ना का मतलब ना नहीं होता है, ऐसे भी कई मामले हैं, जब महिला की धीरे से की गई 'नो' में उसका 'यस' छुपा हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस बात के भी संदेह है कि महिला ने जो वाकया बताया है कि वो हकीकत है या नहीं और ना ही इस बात को पुख्ता सबूत है कि महिला के साथ जबरदस्ती हुई।
आपको बता दें कि कि साकेत कोर्ट ने फारूकी को सात साल जेल की सजा सुनाई थी और उन्हें पिछले साल 4 अगस्त को जेल भेज दिया था। कोर्ट ने माना था कि उन्होंने उस मौके का फायदा उठाया था, जब पीड़िता घर पर अकेली थी। 30 जुलाई, 2016 में फारूकी को कोर्ट ने 2015 के रेप मामले में दोषी माना था और नशे की हालत में अमेरिकी महिला के साथ रेप करने के मामले में उनपर 50 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया था।
ये है मामला
पीड़ित अमेरिकी युवती के मुताबिक, यह घटना 28 मार्च 2015 की है। पीड़िता पीएचडी के सिलसिले में रिसर्च के लिए दिल्ली आई थी। इस दौरान उसकी रिसर्च गोरखपुर की गुरु गोरखनाथ यूनिवर्सिटी से जुड़ी थी। युवती का कहना था कि फारुकी ने नशे की हालत में उसे दुराचार का शिकार बनाया था। पीड़ित युवती एक रिसर्च के सिलसिले में भारत आई थी। 28 मार्च, 2015 को फारुकी से मिलने उनके घर गई थी। बीते 30 जुलाई को अदालत ने फारुकी को दुष्कर्म का दोषी करार दिया था जिसके बाद उसे फिर जेल भेज दिया गया था।












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