मोदी सरकार पर सख्त कोर्ट, बोस की खुफिया जानकारी क्यों नहीं हो रही सार्वजनिक
कोलकाता। सुभाष चंद्र बोस की मौत से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक नहीं किये जाने के खिलाफ कोलकाता हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से सफाई मांगी है। कोर्ट ने मोदी सरकार से बोस की फाइलें सार्वजनिक नहीं किये जाने की वजहों को बताने के लिए कहा है।

कोलकाता हाईकोर्ट के जज एके बनर्जी और शिवाकांत प्रसाद की बेंच ने मोदी सरकार से बोस की फाइलों के बारे में सवाल पूछा है। कोर्ट ने पूछा है कि जनहित में बोस से जुड़ी खुफिया फाइलों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता है।
2007 में ही फाइलों को सार्वजनिक किये जाने की संस्तुति दी गयी थी
कोर्ट ने बोस की फाइलों को सार्वजनिक नहीं किये जाने पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि 2007 में सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन ने बोस जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक किये जाने की संस्तुति दी थी बावजूद इसके बोस की फाइलों को सार्वजनक क्यों नहीं किया जा रहा है।
20 सालों तक होती रही बोस के रिश्तेदारों की सघन जासूसी
केंद्र सरकार को 2 हफ्तों के भीतर फाइलों को सार्वजनिक नहीं किये जाने की वहजों को बताने का समय दिया गया है। गौरतलब है कि नेशनल आर्काइव की गुप्त सूची से हटाई गई खुफिया ब्यूरों की दो फाइलों से इस बात का खुलासा हुआ है कि करीब 20 सालों तक जवाहर लाल नेहरू ने बोस के रिश्तेदारों की जासूसी करवाई थी।
इन खुफिया फाइलों से यह भी खुलासा हुआ है कि बोस के परिवार की काफी जबरदस्त तरीके से जासूसी की जा रही थी। फाइलों से मिली जानकारी के अनुसार नेताजी के कोलकाता स्थित दोनों घरों से परहर समय नजर रखी जाती थी।
नेहरू को था खुद की सत्ता छिन जाने का डर
फाइलों से खुलासा हुआ है कि आईबी नेताजी के भतीजों शिशिर कुमार बोस और अमिय नाथ बोस पर हर समय पैनी नजर रखती थी। बताया जाता है कि शरत चंद्र बोस के ये दोनों बेटे नेता जी के बेहद करीबी थे।
वहीं नेता जी की पड़पोते का दावा है कि नेहरू जी को इस बात का डर था कि अगर बोस वापस भारत आते हैं तो वह देश के सबसे बड़े नेता होंगे और वह देश की कमान संभाल सकते थे।












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