यहां जमकर हो रहा 'जय किसान' प्रशासन देख रहा तमाशा

सरकार के सारे कानून कायदे ताक पर रखकर किसान गेहूं का बचा खुचा घास फूस जला रहे हैं और प्रशासन कोई कदम नहीं उठा पा रहा है। उसे प्रशासन का कोई डर भय नहीं है। धुंआ मीलों दूर तक वातावरण को प्रदूषित कर रहा है जिससे अस्थमा के मरीजों को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है। आग लगाने से मित्र कीट भी जल रहे हैं। वैसे भी खतरनाक कीटनाशकों के अंधा धुंध प्रयोग से ये कीट खत्म होते जा रहे हैं।
राज्य के जिला प्रशासनों और कृषि विभाग के आदेशों के बावजूद किसान गेहूं के अवशेषों को जलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। अब किसान प्रशासनिक कार्रवाई से बचने के लिए रात में आग लगाते हैं। ऐसे में प्रशासन चाहकर भी कार्रवाई करने में सक्षम नहीं है। इस बारे में उपायुक्तों की ओर से हिदायतें जारी की गई हैं लेकिन किसान इन आदेशों को दरकिनार कर धरती की उर्वरा शक्ति को खत्म करने में लगे हैं ।
कृषि विभाग का अभियान केवल किसानों को जारूक करने तक ही सीमित रहा। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस ओर ध्यान देने की कोई जरूरत ही नहीं समझता। आगे भी यही सब चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब धरती मां बांझ हो जाएगी। लेना सब चाहते हैं लेकिन धरती का कर्ज कोई नहीं उतारना चाहता ।
पंजाब को आने वाले दिनों में भयावह स्थिति का सामना करना पड़ेगा क्योंकि भूजल स्तर तो काफी नीचे चला ही गया है साथ ही रासायनिक खादों का इस्तेमाल तथा अन्न की अंधाधुंध पैदावार करके धरती की उर्वरा शक्ति खत्म कर दी है। दिलचस्प बात यह है कि कृषि विभाग खेतों में अवशेषों को जलाने पर पूरी तरह अनभिज्ञता जाहिर कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहा है। कृषि विभाग के आला अधिकारियों का कहना है कि उन्हें इस इसकी कोई जानकारी ही नहीं कि किसान खेतों में अवशेषों को जला रहे हैं।
अवशेष जलाने से खेत में मौजूद कार्बनिक पदार्थ नष्ट हो जाते हैं जिस सेजमीन का स्वास्थ्य खराब हो जाता है। अवशेष जलाने से मित्र कीट तथा सूक्ष्म जीव मर जाते हैं तथा मिट्टी की उर्वरा शक्ति कमजोर हो जाती है। इससे फसलों में बीमारियां जल्दी लगती हैं और कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है। किसानों को रासायनिक कीटनाशकों तथा खाद पर अधिक व्यय करना पड़ता है। अवशेष जलाने से खेती से होने वाली आय में भारी कमी आ जाती है तथा पशुओं के लिए बनने वाला चारा नष्ट हो जाता है ।
फसल की कटाई के बाद बची फूंस को किसान लगातार आग लगा रहे हैं। खेत में आग लगने का बहाना कर फायर ब्रिगेड को सूचित कर रहे हैं ताकि प्रशासन की आंख में धूल झोंककर कानूनी कार्रवाई से बच सकें। ज्यादातर गेहूं की फसल अप्रैल में काट ली गई। मजदूरों की किल्लत और बेमौसमी बरसात की मार से बचने के लिए कार्बाइनों से से गेहूं काटने का दौर चला और कुछ ही दिनों में किसान फारिग हो गए। फसल कटने के बाद बची अवशेषों का हल निकालने की जुगत में किसान यह काम कर रहे है।












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