26 को शपथ न ले पायें मोदी इसलिये लश्कर ने किया हेरत में हमला

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई जब नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण के लिए भारत आए तो उन्होंने इस बात को भारतीय मीडिया के साथ एक इंटरव्यू में जानकारी दी कि कैसे लश्कर, पाकिस्तान की मदद से अब अफगानिस्तान में अपनी जमीन मजबूत करने में लगा हुआ है।
इसके अलावा एक अंग्रेजी डेली की रिपोर्ट में अफगानिस्तान की राजदूत शाइदा अब्दाली के हवाले से छपा है कि हेरात हमले के पीछे लश्कर का हाथ था और इस हमले का मकसद दूतावास में रह रहने वाले भारतीय अफसरों को अगवा करना था।
अब्दाली के मुताबिक लश्कर इस हमले के जरिए और अफसरों को अगवा करने के साथ चाहता था कि भारत में बनने वाली नई सरकार मुसीबतों के बीच घिर जाए। अफगानिस्तान के हेरात प्रांत में शुक्रवार को हुए हमले की जिम्मेदारी अभी तक किसी आतंकी संगठन ने नहीं ली है।
हालांकि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई साफ-साफ कह चुके हैं कि इस हमले के पीछे हाफिज सईद के नेतृत्व वाला आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा जिम्मेदार है।
करजई के मुताबिक उन्हें एक प्रमुख विदेशी इंटेलीजेंस एजेंसी से इस बारे में जानकारी मिली है।
हामिद करजई के मुताबिक अगर आतंकी अपने मंसूबों में कामयाब हो जाते तो नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के लिए 26 मई को होने वाला शपथ ग्रहण समारोह काफी तकलीफदेह हो सकता था।
गौरतलब है कि 23 मई को हेरात में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर चार आतंकवादियों ने हमला किया था। आईटीबीपी और अफगान सिक्यॉरिटी के जवानों ने सभी आतंकियों को मार गिराया था।
इसके अलावा एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में हामिद करजई ने साफ किया है कि जब तक पाकिस्तान अफगानिस्तान में आतंकवाद का समर्थन बंद नहीं करेगा तब तक भारत और अफगानिस्तान दोनों ही देशों में स्थिरता की उम्मीद करना बेमानी है।
वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने साफ कर दिया है कि वर्ष 2016 के बाद न तो नाटो और न ही अमेरिका का कोई भी सैनिक अफगानिस्तान में रहेगा। वर्ष 2014 के अंत तक अमेरिका ने अपने सैनिकों की संख्या कम कर 9800 करने का ऐलान कर दिया है।
ओबामा के मुताबिक वर्ष 2016 के अंत तक वहां जवानों की मौजूदगी और कम होकर ‘दूतावास में सामान्य उपस्थिति' तक सीमित हो जाएगी।
उन्होंने कहा कि 2015 की शुरुआत में देश के विभिन्न हिस्सों में नाटो सहयोगियों और अन्य साझीदारों के साथ मिलकर अमेरिकी सेवा के लगभग 9800 सदस्य होंगे।
ओबामा ने बताया कि वर्ष 2015 के अंत तक हम यह मौजूदगी आधी कर देंगे। इसके एक वर्ष बाद हमारी सेना की उपस्थिति काबुल में दूतावास तक सीमित हो जाएगी।












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