हरियाणा विधानसभा चुनाव: मनोहर लाल बनाम जाट 'परिवार', कौन किस पर भारी ? जानिए
नई दिल्ली- हरियाणा की राजनीति आज दो हिस्सों में साफ बंटी हुई नजर आ रही है। एक तरफ मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व वाली बीजेपी है और दूसरी तरफ दिग्गज जाट नेताओं की अगुवाई वाले कई प्रभावशाली परिवार और उनकी अलग-अलग राजनीतिक पार्टियां। हरियाणा की राजनीति में जाति ने हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और इसबार के चुनाव में भी यह सबसे बड़े मुद्दे के रूप में बरकरार है। लेकिन, खट्टर की अगुवाई वाली बीजेपी के आत्मविश्वास का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि इस चुनाव में उसका मुख्य नारा है- 'अबकी बार 70 पार'। इसकी वजह ये है कि कांग्रेस बंटी हुई है। इंडियन नेशनल लोकदल का अगुवा चौटाला परिवार कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा हुआ है। ऐसे में आइए समझने की कोशिश करते हैं कि हरियाणा के अलग-अलग इलाकों में क्या तस्वीर उभर रही है, जिसके आधार पर आने वाले 21 अक्टूबर को राज्य के मतदाता 90 सीटों पर मतदान करने वाले हैं।

उत्तर हरियाणा का हाल
2014 में जब मनोहर लाल खट्टर जैसे गैर-जाट नेता ने हरियाणा की कमान संभाली उससे पहले दशकों तक प्रदेश की राजनीति में जाट नेताओं का ही दबदबा था। खट्टर से पहले करीब दो दशकों तक जाट नेताओं को ही हरियाणा में मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। तब भाजपा को उत्तर हरियाणा में ही बड़ी सफलता हासिल हुई थी, जो कि चंडीगढ़, पंचकुला, अंबाला, कुरुक्षेत्र, करनाल और पानीपत तक फैला हुआ है। यहां बीजेपी की जीत के पीछे मुख्य रूप से पंजाबी बोलने वाले बनिया समुदाय का समर्थन रहा, जो लंबे वक्त से हरियाणा में उपेक्षित महसूस कर रहे थे। 21 तारीख के चुनाव में भी बीजेपी को विशेष रूप से ऊंची जातियों और बनिया-खत्री वोटों का ही भरोसा है। खट्टर के नेतृत्व से बीजेपी का इस वोट बैंक पर दावा और पुख्ता माना जा रहा है। शुरुआती सालों में कुछ झटकों से बाहर निकलकर आज खट्टर खुद को एक साफ छवि और बेहतर शासन देने वाले नेता के रूप में स्थापित कर चुके हैं।
Recommended Video

जाट बेल्ट में किसकी गलेगी दाल?
कहने के लिए हरियाणा के नेता कहते रहे हैं कि राज्य में '36 बिरादरी' शांतिपूर्ण तरीके से आपस में मिल-जुलकर रहते हैं। लेकिन, ये सच्चाई है कि कई दशकों तक यहां की राजनीति में जाटों का ही दबदबा रहा है। करीब 25 फीसदी आबादी वाले जाटों का प्रभाव हिसार, भिवानी, महेंद्रगढ़, रोहतक, झज्जर, सोनीपत, जींद और कैथल इलाकों में फैले हुए हैं, जो जाट बेल्ट के नाम से मशहूर है। पूर्व मुख्यमंत्रियों भजन लाल, भूपेंद्र सिंह हुड्डा और ओम प्रकाश चौटाला के परिवारों ने इसी जाट बेल्ट के दबदबे के दमपर हरियाणा पर राज किया है। फरवरी, 2016 में हुए आरक्षण आंदोलन ने इस इलाके में जाट और गैर-जाटों की दूरी और बढ़ा दी थी। लेकिन, अब दिग्गज जाट नेताओं के परिवारों को भी यह बात समझ में आ चुकी है कि पिछले दो चुनावों में जिस तरह से वे हाशिए पर गए हैं, उनके लिए गैर-जाटों का समर्थन जुटाना भी उतना ही जरूरी हो गया है। हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद हुड्डा और बाकी नामी जाट परिवारों के लिए अपने राजनीतिक वजूद को बचाए रखना भी इसबार बहुत बड़ा संघर्ष साबित हो रहा है। इसलिए, कांग्रेस और आईएनएलडी जैसी विपक्षी पार्टियां स्थानीय मुद्दों को उठा रही हैं तो भाजपा सीएम की साफ छवि और प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे के भरोसे ही बाजी मार लेने के प्रति निश्चिंत नजर आ रही है।

दक्षिण हरियाणा में क्या होगा इसबार ?
दक्षिण हरियाणा में गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे विकसित जिले भी हैं तो मेवात जैसा अति-पिछड़ा इलाका भी। 2014 के विधानसभा चुनाव में जीतकर बीजेपी ने प्रदेश में सरकार तो जरूर बना ली, लेकिन दक्षिण हरियाणा के परिणाम ने उसे काफी मायूस किया था। वह सिर्फ सोहना सीट ही जीत सकी थी। इसलिए, पिछले पांच वर्षों से भारतीय जनता पार्टी ने इस क्षेत्र में प्रभावशाली मुस्लिम जनसंख्या को देखते हुए उन्हें अपने पक्ष में करने की तमाम कोशिशें की हैं। पार्टी ने इलाके के कई मुस्लिम विधायकों को अपने पाले में किया है। नूह से आईएनएलडी के सीटिंग एमएलए जाकिर हुसैन और फिरोजपुर झिरका के नसीम अहमद को पार्टी में शामिल किया गया और उन्हें टिकट भी दिया गया है। पार्टी को ट्रिपल तलाक जैसे फैसलों से भी काफी उम्मीदें हैं। यही नहीं पिछले पांच साल में मोदी सरकार ने मेवात क्षेत्र के विकास से जुड़े कई कदम उठाए हैं, जो कि नीति आयोग के आकांक्षी जिलों की लिस्ट में सबसे नीचे था। मंत्रियों को जिम्मेदारी दी गई है कि वे इस क्षेत्र के स्वास्थ्य और आर्थिक विकास पर विशेष रूप से ध्यान दें। पार्टी को यकीन है कि इस चुनाव में उसे इसका लाभ जरूर मिलेगा।

बीजेपी की चुनौती और उम्मीद
हरियाणा में दलितों की 30 फीसदी जनसंख्या भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। राज्य की 14 सुरक्षित सीटों में से अभी 9 बीजेपी और एक उसकी सहयोगी शिरोमणि अकाली दल के पास है। जबकि बाकी 4 कांग्रेस के पास। आशंका है कि बाबा राम रहीम पर हुई कार्रवाई के चलते बीजेपी को कुछ दलित वोटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है, जिसका फायदा कांग्रेस और बीएसपी को होने की उम्मीद है। वैसे बीजेपी को भरोसा है कि राष्ट्रवाद और विकास उसके ऐसे दो कार्ड हैं, जो उसे दोबारा पहले से भी ज्यादा बहुमत के साथ सत्ता में वापस ला सकते हैं। इसके पीछे कारण ये बताया जा रहा है कि बीजेपी को लगता है कि आर्टिकल-370 हटाने से सुरक्षा बलों से जुड़े लोगों का उसे पूर्ण समर्थन मिल सकता है, जो कि पार्टी के मुताबिक यहां करीब 10.6 फीसदी की तादाद में हैं।












Click it and Unblock the Notifications