बढ़ सकती हैं सपा, बसपा और भाजपा का मुश्किलें!
सियासत का हर दांव कहीं न कहीं इस डायलॉग के इर्द गिर्द घूमता है कि कर शपथ....अग्निपथ...अग्निपथ। न रूकेगा कभी, न झुकेगा कभी...कर शपथ...कर शपथ....अग्निपथ। जी हां, इसी तर्ज पर आगामी 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एक नया गठबंधन होने जा रहा है। जिसके साथ ही सभी सियासी दलों के बीच कांटे की टक्कर होगी।

दरअसल सूबे में एक नई सुगबुगाहट चल पड़ी है। जिसकी वजह से सियासी खेमों की हलचलें बढ़ गई हैं। हालांकि इस बात की चर्चा काफी समय से चल रही है कि सूबे की राजनीति में नीतीश कुमार दिलचस्पी दिखाने लगे हैं।
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पर, यह तस्वीर तब साफ हो गई जब नीतीश सम्राट अशोक क्लब के निमंत्रण पर हिस्सा लेने उत्तर प्रदेश के गाजीपुर आए। साफ तौर पर नीतीश का उद्देश्य कोइरी समुदाय को लुभा कर बिहार से अपने राजनीतिक कदम बढ़ाने का था।
इस बीच लोगों ने इस बात पर चर्चा शुरू कर दी कि आखिर नीतीश इस कदम के साथ क्या नया करने का मंसूबा पाले बैठे हैं।
यूपी चुनाव ट्रॉल
मायावती
कुछ ने तो यहां तक कहा कि केंद्र में काबिज होने का रास्ता यूपी से ही तय कर पाना संभव है। निश्चित तौर पर यूपी की सियासत से देश की सत्ता पाने के लिए नीतीश ने कोशिशें शुरू कर दी हैं।
किसके बीच होगा गठबंधन
सूत्रों के मुताबिक सूबे की राजनीति में एक नया गठबंधन नजर आने वाला है। सुपर 30 वाले सुपर बिहार के नीतीश कुमार पलायन यानि की संभावनाओं की तलाश में यूपी का रूख कर रहे हैं। बिहार में कत्लेआम के दौर के बीच उनके माथे पर चिंता की लकीरें राजनीतिक विस्तार यानि की 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों की खातिर दिखाई दे रही हैं।
बहरहाल इस गठबंधन में नीतीश के साथ राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह, अस्तित्व खोती जा रही कांग्रेस के एक मात्र राजकुमार राहुल गांधी नजर आएंगे।
मुख्यमंत्री पद को लेकर हो सकती है तना-तनी
माना जा रहा है कि अजीत सिंह ने अपने बेटे जयंत की खातिर मुख्यमंत्री पद की मांग की है। लेकिन नीतीश गठबंधन में खुद को जनता की नजरों में हाईलाईट करने के लिए अपनी पार्टी से भी मुख्यमंत्री पद के लिए आवाज बुलंद कर सकते हैं। वहीं गठबंधन की स्थिति में कांग्रेस अपने उम्मीदवार के लिए मुख्यमंत्री पद की मांग करने से नहीं चूकने वाली। इस तरह की स्थितियों में चौधरी को डिप्टी सीएम के रूप में भी पेश किया जा सकता है।
क्या होगा गठबंधन का 'नाम' और 'निशान'
इस पार्टी का चुनाव चिन्ह चक्र हो सकता है। पहले यह निशान जनता दल के पास था। जनता दल के टूटने के बाद से यह किसी को आवंटित नहीं किया गया है। जबकि इस गठबंधन को जन विकास पार्टी का नाम दिया जा सकता है। जिसके अध्यक्ष नीतीश कुमार ही होंगे।
गठबंधन के पीछे क्या हैं जातिगत आंकड़े
आपको बताते चलें कि नीतीश कुमार कुर्मी हैं और अजित सिंह जाट हैं। यूपी में 57 सीटों पर जाटों का दबदबा है तो 190 पर सीटों पर कोइरी और कुर्मी मिलकर 5 प्रतिशत जनसंख्या है। कांग्रेस के साथ आने से वे ब्राह्मण और मुस्लिम मतों को भी लुभा सकते हैं।
यूपी चुनाव के ट्रॉल
तो क्या बैकफुट पर चली जाएंगी सपा, बसपा और भाजपा?
इस गठबंधन के साथ ही प्रदेश के छोटे बड़े सियासी दलों की नींद उड़ने वाली है। हालांकि भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष पद केशव प्रसाद मौर्या की नियुक्ति ने नीतीश की योजना को प्रभावित जरूर किया है। लेकिन ब्राह्मण वर्ग से अब तक दूरी बनाकर चल रही भाजपा को अपने तय वोटबैंक की खातिर योजना को अंतिम रूप देना होगा। जबकि सपा के साथ रहे मुस्लिम मतदाताओं में सेंध मारने के लिए गठबंधन में कांग्रेस का शामिल होना चिंता का विषय है।
बसपा के लिहाज से नीतीश एक बड़ा संकट पैदा कर सकते हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि प्रदेश की जनता को कौन कितना विश्वास दिला पाता है। क्योंकि उसी के आधार सियासत की हर तस्वीर, तकदीर साफ हो पाएगी।












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