खेलों में यौन उत्पीड़न: कार्यस्थल पर क्या हैं नियम और क्या हैं क़ानूनी प्रावधान

भारतीय खेल जगत में पिछले कुछ दिनों से भूचाल आया है. कुछ महिला पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के प्रमुख और बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं.

हालाँकि बृज भूषण शरण सिंह ने यौन उत्पीड़न के आरोपों को ख़ारिज करते हुए इस्तीफ़ा देने से इनकार कर दिया है.

लेकिन भारतीय कुश्ती खिलाड़ियों का कहना है कि जब तक उचित कार्रवाई नहीं होती, वो अपना धरना जारी रखेंगे. इन महिला खिलाड़ियों के साथ पुरूष खिलाड़ी भी धरने में शामिल हैं.

शुक्रवार को मीडिया से बात करते हुए भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृज भूषण शरण सिंह ने कहा, "मैं किसी की दया पर नहीं बैठा हूँ. मैं चुना हुआ अध्यक्ष हूँ."

इसस पहले उन्होंने कहा था, ''किसी भी एथलीट का यौन शोषण नहीं हुआ है. अगर यह सच साबित होता है तो मैं फाँसी पर लटकने को तैयार हूँ.''

वही दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालिवाल ने भी खिलाड़ियों से बात की थी और कहा था , ''हम आपके साथ मज़बूती के साथ खड़े हैं और आपको न्याय दिलाएँगे."

साथ ही उन्होंने इस संबंध में खेल और युवा मंत्रालय को नोटिस जारी किया है.

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने बीजेपी महिला नेताओं की चुप्पी सवाल उठाते हुए ट्वीट किया, ''बीजेपी की महिला ब्रिगेड क्या इस हफ़्ते मौन व्रत पर. किसी भी महिला मंत्रियों ने महिला कुश्ती खिलाड़ियों के बीजेपी और डब्लयूएफ़आई के प्रमुख को लेकर जो भयानक कहानियाँ बताई, वो तक नहीं सुनीं.''

इस बीच खेल मंत्रालय ने भारतीय कुश्ती फ़ेडरेशन से इस मामले में स्पष्टीकरण मांगा है.

खेल में यौन उत्पीड़न की ख़बरें कोई नई बात नहीं है.

पिछले साल एक भारतीय साइकिलिस्ट ने भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) को यौन उत्पीड़न की शिकायत की थी. इस साइकिलिस्ट ने अपने कोच पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था.

हाल ही में हरियाणा के खेल राज्य मंत्री और पूर्व हॉकी खिलाड़ी संदीप सिंह पर छेड़छाड़ के आरोप लगे थे, जिसके बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. एक महिला हॉकी टीम की कोच ने उन पर गंभीर आरोप लगाए थे.

साई और साइकिलिंग फेडरेशन ऑफ़ इंडिया ने इन आरोपों की जाँच के लिए पैनल का गठन किया है.

इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने एक रिपोर्ट छापी थी जिसमें कहा गया था पिछले दस सालों में साई के समक्ष यौन उत्पीड़न की 45 शिकायतें आईं थीं, जिनमें से 29 शिकायतें कोच के ख़िलाफ़ थीं. अख़बार ने ये जानकारी सूचना के अधिकार के तहत हासिल की थी.

कुश्ती ख़िलाड़ी विनेश फोगाट ने भी पत्रकारों से बातचीत में कहा था, "कोच महिलाओं को परेशान कर रहे हैं और फ़ेडरेशन के चहेते कुछ कोच तो महिला कोचों के साथ भी अभद्रता करते हैं. वे लड़कियों को परेशान करते हैं. भारतीय कुश्ती महासंघ के प्रेसिडेंट ने कई लड़कियों का यौन उत्पीड़न किया है."

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वहीं ये सवाल भी उठ रहे हैं इन महिलाओं ने अपनी शिकायत एक उचित मंच के समक्ष क्यों नहीं दर्ज की और क्या धरना एक सही क़दम था?

इस सवाल पर स्पोर्ट्स एक्टिविस्ट और वरिष्ठ वकील राहुल मेहरा कहते हैं कि भारत के लिए इतने मेडल लाने वाली ख़िलाड़ी ऐसे धरने पर बैठी हैं और अभी तक जिस पर आरोप लगे हैं उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं हुई है, जो काफ़ी दुखद है.

उनके अनुसार, ''क़ानून ये कहता है कि इंटर्नल कमेटी होनी चाहिए और उसकी अध्यक्ष महिला होगी, कमेटी में 50 फ़ीसदी महिलाएँ होंगी. इनकी कमेटी में पाँच सदस्य हैं जिसमें सिर्फ़ एक महिला है तो ये कैसी कमेटी हुई. वहीं ये कमेटी प्रेसिडेंट ने बनाई है तो क्या फ़ायदा होता कमेटी के पास जाने का. वहीं पुलिस के पास जाना इन्हें वाजिब नहीं लगा होगा, इसलिए उन्होंने धरना करने और मीडिया के ज़रिए अपनी बात रखने का रास्ता चुना.''

यौन उत्पीड़न के मामले आने पर क्या हैं क़ानून?

वकील राहुल मेहरा बताते हैं कि यौन उत्पीड़न चाहे किसी भी कार्यस्थल पर हो, उसे लेकर क़ानून में प्रावधान किए गए हैं.

भारत में वर्किंग प्लेस या कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को लेकर POSH एक्ट 2013 लाया गया.

ये क़ानून कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष अधिनियम 2013 के नाम से भी जाना जाता है.

हालाँकि आमतौर पर ये माना जाता है कि खेल कार्यस्थल इस क़ानून के दायरे में नहीं आता है, लेकिन ऐसा नहीं है.

इस क़ानून के अंतर्गत खेल में कार्यस्थल स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट, स्टेडियम, खेल परिसर आते हैं. कोई वेन्यू या तो आवासीय हो सकता है या जहाँ प्रशिक्षण होता हो या ऐसी किसी प्रकार की खेल से जुड़ी गतिविधि होती है, वो इसमें शामिल माना जाएगा.

यौन उत्पीड़न के दायरे में क्या आता है?

यौन उत्पीड़न में शारीरिक और मौखिक बातें शामिल मानी गई हैं.

इसमें अभद्र भाषा का इस्तेमाल या इशारा शामिल हैं.

वहीं अगर कोई किसी काम के एवज में सेक्शुअल फ़ेवर की मांग करता है और महिला के इनकार करने पर भेदभाव की धमकी देता है, तो ऐसी बातें भी इसमें शामिल हैं.

क़ानून में क्या हैं प्रावधान?

साक्षी मलिक
BBC
साक्षी मलिक

ये क़ानून कहता है कि अगर किसी कार्यस्थल पर 10 से ज़्यादा लोग काम करते हैं, तो उसे एक आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) बनानी चाहिए.

इस समिति का काम यौन उत्पीड़न की शिकायतों को सुनना और उसका निपटारा करना होता है.

वहीं, नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट कोड ऑफ़ इंडिया (एनएसएफ़) 2011 में कहा गया है कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना एनएसएफ़ और खेल से जुड़ी संस्थाओं का काम है.

साथ ही इसमें ये भी कहा गया है कि यौन उत्पीड़न की रोकथाम करना, नियमों के बारे में बताना और ऐसे मंच होने चाहिए, जहाँ महिलाएँ ऐसे मुद्दों को उठा सकें.

वकील राहुल मेहरा सवाल उठाते हैं कि खेल मंत्रालय को ये भी देखना चाहिए क्या इसके तहत कोई काम भी हो रहा है?

वहीं ऐसे क्षेत्र, जहाँ 10 से कम महिलाएँ काम करती हैं या अंसगठित क्षेत्र में जो महिलाएँ काम करती हैं, वो ज़िला स्तर पर बनी स्थानीय समिति में जाकर अपनी शिकायत दर्ज कर सकती हैं.

ये महिलाएँ समिति के समक्ष तीन महीने में शिकायत दर्ज कर सकती है और अगर वे तीन महीने बाद ये क़दम उठाती है तो उसके लिए उन्हें जायज़ कारण देने पड़ते हैं.

समिति अगर उनके कारणों से संतुष्ट होती है, तो उनकी शिकायत स्वीकार कर लेती है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वो शिकायत दर्ज नहीं करा सकती हैं.

वहीं अगर दफ़्तर क़ानून के तहत कार्रवाई नहीं करता है तो क़ानून में 50,000 जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है.

आगे की प्रक्रिया

कार्यस्थल पर बनी आईसीसी यौन उत्पीड़न के मामले की प्रारंभिक जाँच रिपोर्ट तैयार करती है.

इस जाँच में अगर वो अपराध सिद्ध हो जाता है तो आईसीसी को शिकायत और अपनी जाँच रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करानी होती है.

इस जाँच के दौरान महिला तीन महीने की छुट्टी या अपने दफ़्तर की किसी और शाखा में अपना तबादला करा सकती है.

वहीं अगर महिला के आरोप झूठ निकलते हैं, तो उसके ख़िलाफ़ भी क़ानून में कार्रवाई का प्रावधान हैं.

अगर महिला इस मामले में चाहती है कि उसकी शिकायत पर कोई कार्रवाई न की जाए, तो दोनों पक्षों के बीच समझौता भी करवाया जा सकता है लेकिन ऐसा पैसों के लेन-देन के आधार पर नहीं होना चाहिए.

वहीं सज़ा का प्रावधान अपराध सिद्ध होने पर दिया गया है, जिसमें हर अपराध पर अलग-अलग धाराओं के तहत सज़ा का प्रावधान है.

उदाहरण के लिए छेड़छाड़ के मामले में धारा 354 में जेल की सज़ा या फिर जुर्माने का प्रावधान है.

ये सज़ा दो साल तक हो सकती है. वही कोर्ट जेल और जुर्माने का आदेश भी दे सकता है.

वहीं धारा 376 (बलात्कार) में सात साल तक की सज़ा का प्रावधान किया गया है.

इसे आजीवन कारावास या 10 साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

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