अहमद पटेल कांग्रेस के 'बाबूभाई' ना होते तो महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे कभी मुख्यमंत्री नहीं बनते
नई दिल्ली- अहमद पटेल कांग्रेस के ऐसे हाई प्रोफाइल नेता थे, जिन्होंने लो प्रोफाइल रहकर पिछले दो दशकों से पर्दे के पीछे से कांग्रेस संगठन और उसकी सरकारों का संचालन किया। यूं कह लीजिए कि वो गांधी परिवार से जुड़े ऐसे अकेले गैर-गांधी कांग्रेसी रहे, जिन्होंने बगैर सत्ता में रहे भी पार्टी और पार्टी की सरकारों को अपने इशारों पर चलाया। पार्टी के बड़े नेता जो उनके करीब रहे वो उन्हें एक ऐसे मृदुभाषी शख्स के रूप में जानते रहे, जिनके चेहरे पर हर संकट और विपरीत परिस्थितियों में भी एक मुस्कान नजर आती थी। अपने साथियों के बीच वह 'बाबू' के नाम से लोकप्रिय रहे तो सम्मान के तौर पर पार्टी के लोग या दूसरे भी उन्हें 'बाबूभाई' कहकर संबोधित करते थे। 'बाबूभाई' सिर्फ उनका सम्मान से पुकारा जाने वाला नाम नहीं था, बल्कि वाकई कांग्रेस की आलाकमान वाली परिपार्टी में उनका कद 'बाबूभाई' जैसी किसी विशाल छवि के व्यक्तित्व जैसा ही ऊंचा था। पिछले साल तक महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना ने अपनी जो एक कट्टर हिंदुवादी छवि बना रखी थी, पार्टी के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे 'बाबूभाई' के बगैर कोई सोच भी नहीं सकता था कि उसकी सरकार बनवाने के लिए वह सोनिया गांधी को राजी कर लेते।

2019 के अक्टूबर में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे ने संजय राउत के जरिए भारतीय जनता पार्टी को जो अपने पैंतरे दिखाने शुरू किए तो कुछ दिनों बाद कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच ऐसी बात की अनौपचारिक चर्चा शुरू हुई, जिसके बारे में तब पार्टी में सोचा भी नहीं जा सकता था। लोग आपस में बात कर रहे थे कि एनसीपी और कांग्रेस के पास वह आंकड़ा है, जिससे विपरीत विचारधारा वाली शिवसेना की सरकार बनवाई जा सकती है। लेकिन, कांग्रेस में एक को छोड़कर किस नेता की इतनी हैसियत थी कि सोनिया गांधी तक अपने मन में पक रहे ख्याली पुलाव को पहुंचा सकें।
महराष्ट्र के एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा है, 'पहले शरद पवार सोनिया गांधी से मिले, उसके बाद उद्धव ठाकरे ने भी उनसे संपर्क किया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। दबाव बढ़ रहा था तो कांग्रेस और पवार समेत एनसीपी के बड़े नेताओं ने अहमद पटेल से बात की, सिर्फ वही एक व्यक्ति थे जो इसका हल निकाल सकते थे। पटेल कांग्रेस अध्यक्ष को समझाने के लिए तैयार हो गए। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने उनसे कहा कि बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए और पार्टी के सॉफ्ट-हिंदुत्व को मजबूत करने के लिए भी यह जरूरी है। आखिरकार कांग्रेस अध्यक्ष इसके लिए तैयार हो गईं.....'
पटेल कांग्रेस के ऐसे नेता थे, जो ना कभी मंत्री रहे और ना ही कभी पावर पाने की चाहत जताई, लेकिन फिर भी कम से कम दो दशकों तक वो गांधी परिवार के बाद सबसे पावरफुल कांग्रेसी रहे। शिवसेना जैसी बीजेपी की सबसे पुरानी (22 साल बाद) सहयोगी को कांग्रेस के गठबंधन में शामिल करना 2014 में हुई पार्टी की तबाही के बाद पार्टी की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है, जो बाबूभाई के बिना शायद नामुकिन ही था।
गुजरात से 8 बार सांसद (लोकसभा और राज्यसभा) रहे अहमद पटेल का कद पार्टी में कितना बड़ा था इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह पार्टी के कोषाध्यक्ष थे, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के संसदीय सचिव रहे और करीब 20 वर्षों से सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव थे। यूं तो चार दशकों से ज्यादा समय तक उनका पार्टी में किसी ना किसी रूप में प्रभुत्व रहा, लेकिन 2004 में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए को सत्ता तक पहुंचाने, 2008 में मनमोहन सरकार को अविश्वास प्रस्ताव से बचाने और 2009 में उसकी सत्ता में वापसी के पीछे अगर कांग्रेस का किसी नेता का सबसे बड़ा योगदान था तो वो बाबूभाई ही थे।
जबसे सोनिया गांधी ने उन्हें अपना राजनीतिक सचिव नियुक्त किया उनके हर राजनीतिक फैसले के पीछे दिमाग अहमद पटेल का ही माना जा सकता है। गुजरात से जुड़े कांग्रेस के एक वरिष्ठ सांसद नाम नहीं जाहिर होने देने की शर्त पर कहते हैं, 'एक शहरी कहावत है कि अहमदभाई ने कांग्रेस शासन में चार प्रधानमंत्रियों की ओर से मिले पद की पेशकश को ठुकरा दिया था। एक ऐसी पार्टी में जहां हर दिन किस्मत बदल जाती है, उनका सबके साथ एक खास निजी रिश्ता था, सिर्फ एक ही मकसद होता था कि हाई कमान ने जो चाहा है वह पूरा करना है और उन्हें पता था कि पार्टी के अंदर और बाहर नेता कैसे काम करते हैं। अगर नेतृत्व ने कोई फैसला ले लिया तो उनके लिए वह आखिरी शब्द होता था, चाहे वह खुद उससे असहमत ही क्यों ना हों।' यही वजह है कि 10 साल के यूपीए शासन के दौरान 10 जनपथ के बाद यदि कहीं सबसे बड़ा सत्ता का केंद्र था तो वह अहमद पटेल ही थे। उस समय उनका कद बिना किसी पद पर रहते हुए भी केंद्रीय मंत्रियों से बड़ा था।
लेकिन, अहमद पटेल ने पार्टी नेतृत्व के प्रति वफादारी और कड़ी मेहनत से ऐसा ओहदा पाया था। कहते हैं कि यूपीए के दूसरे कार्यकाल में जब मनमोहन सरकार घोटाले-दर-घोटाले के आरोपों में दब चुकी थी, ज्यादातर मंत्री रात 8 बजे के बाद किसी से मुलाकात नहीं करते थे। उस दौर में यूपीए के दो बड़े नेताओं को ही संपर्क के मामले में अपवाद माना जाता था। वे थे सोनिया के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल और एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार। गुजरात के एक बड़े पार्टी नेता ने अपना नाम नहीं बताने की आग्रह करते हुए कहा है, 'अहद पटेल के दरवाजे बंद होने के कुछ घंटे बाद पवार के दरवाजे खुलते थे।' मतलब, अहमद पटेल सुबह के 4 बजे तक बैठकें करते थे और लोगों से मिलते रहते थे, जबकि शरद पवार सुबह 8 बजे से लोगों से मिलना शुरू कर देते थे।
गुजरात के भरूच के एक छोटे से गांव के रहने वाले अहमद पटेल ने जमीनी स्तर से कांग्रेस की राजनीति शुरू की थी। उनका पॉलिटिकल करियर तालुका पंचायत के अध्यक्ष बनने से शुरू हुआ। 1977 में वह 26 साल की उम्र में सबसे युवा लोकसभा सांसद बने और इसके लिए उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी सराहा था।
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