गुजरात विधानसभा चुनाव: जीत का छक्का मारने के लिए बीजेपी के सामने हैं ये 10 चुनौतियां
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नई दिल्ली। लंबे इंतजार और विपक्ष के आरोपों के बीच चुनाव आयोग ने आज Gujarat assembly elections 2017 के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी है। भले ही ओपिनियन पोल में गुजरात में बीजेपी की साफ जीत दिखाई जा रही हो लेकिन सत्ता में बीजेपी की वापसी इतनी आसान नहीं है। विपक्ष तो साफ तौर पर आरोप लगा चुका है कि चुनाव आयोग ने चुनाव कार्यक्रम की घोषणा में इसलिए जानबूझकर देरी की ताकि बीजेपी लोकलुभावन घोषणाएं कर सकें। मंगलवार को हुई कैबिनेट बैठक के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपनी टीम के साथ जिस बड़े पैमाने पर कल्याणकारी योजनाओं का ऐलान किया, उससे साफ है कि बीजेपी भी ये मानकर चल रही है कि मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी का चेहरा ना होने की वजह से उसकी राह पहले की तरह इस बार आसान नही हैं। गुजरात विधानसभा चुनाव- 2017 में बीजेपी की जीत की राह में कौन-कौन से रोड़ा हैं, हम आपको बताते हैं।

जातिगत समीकरण बीजेपी के पक्ष में नहीं
सबसे बड़ी वजह ये है कि राज्य के मौजूदा जातिगत समीकरण बीजेपी के पक्ष में नहीं है। इसमें तीन फैक्टर काम कर रहे हैं। पहला पटेल समाज, दूसरा ओबीसी और तीसरा दलित। पार्टी सबसे ज्यादा आशंकित पटेल समाज को लेकर है। 65 से 70 प्रतिशत तक इनका वोट बैंक माना जाता है। बीजेपी को मालूम है कि मुस्लिम वोट बैंक पहले की तरह उऩ्हें नहीं मिलने वाला है। इतना बड़ा वोट बैंक सुनिश्चित न होना ही पार्टी की परेशानी का सबब है। इसीलिए मोदी के हाल के गुजरात दौरों पर जो घोषणाएं हुईं उसमें पाटीदार समाज को ध्यान में रखा गया है।

गुजरात में बाढ़ और जीएसटी
दूसरा कारण है कि गुजरात में आई बाढ़ से लोग अब तक उबर नहीं पाए हैं, और लोग ये महसूस कर रहे हैं कि सरकार ने बाढ़ से नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। तीसरा बड़ा कारण है जीएसटी। छोटे व्यापारी इससे काफी परेशान हैं और इसके लागू होने से उनके धंधे पर बुरा असर पड़ा है। जीएसटी की पिछली बैठक में गुजरात के व्यापारियों को कुछ राहत देने की कोशिश की गई और आगे भी संभावना है कि और रियायत देने के ऐलान हों। चौथी वजह है सोशल मीडिया पर जिस तरह कांग्रेस ने पिछले दो-तीन महीने में बढ़त ली है। विकास के मुद्दे का सोशल मीडिया पर मजाक उड़ा और अब जीएसटी का जुमला सोशल मीडिया पर छाया है। इससे पार्टी चिंतित है और चाहती है कि राहुल के जुमलों से जो माहौल बन रहा है उसे वक्त रहते फीका किया जाए।

बेरोजगारी बड़ी समस्या
पांचवीं वजह है गुजरात के नौजवान। राज्य में 65 फीसदी लोग 35 साल से कम उम्र के माने जाते हैं और उनमें बेरोजगारी की बड़ी समस्या है। कांग्रेस ने न केवल नौजवान बेरोजगारी भत्ता और स्मार्ट फोन देने की घोषणा कर अपनी ओर खींचने का प्रयास किया है बल्कि अलग अलग जातियों के युवा नेताओं को साथ ले लिया है। छठवां कारण है प्रदेश नेतृत्व। राज्य के मुख्यमंत्री रहते हुए भी नरेंद्र मोदी का जो कद पार्टी और सरकार में था, दूर दूर तक विजय रूपाणी नहीं ठहरते। न तो पार्टी के प्रदेश नेतृत्व में वो करिश्माई व्यक्तित्व हैं और न ही सरकार में। कुल मिलाकर केंद्र में रहने के बावजूद ये चुनाव मोदी और अमित शाह को ही लड़ना है जबकि प्रदेश के नेता उनके पीछे पीछे चल रहे हैं। सातवां बड़ा कारण है कि गुजरात के बड़े ब्यूरोक्रेट दिल्ली बुला लिए गए हैं। ज्यादातर अनुभवी और तेज तर्रार प्रशासनिक अफसर राष्ट्रीय स्तर पर मोदी सरकार को संभाल रहे हैं। ऐसे में गुजरात में प्रशासनिक अनुभवहीनता और क्राइसिस मैनेजमेंट में वो बात नहीं रही। इससे सरकार की छवि पर भी असर पड़ा है।

एंटी इनकम्बैंसी भी अहम वजह
आठवां कारण एंटी इनकम्बैंसी है। लंबे अरसे से बीजेपी सत्ता में है। इसलिए राज्य के अलग अलग वर्ग में अलग अलग कारणों से नाराजगी बढ़ी है और सभी के हित साधना मुमकिन भी नहीं है जबकि कांग्रेस से नाराजगी की कोई वजह कम से कम राज्य में तो नहीं है। नौंवा कारण राहुल गांधी के दौरों में भीड़ जुटना है। पहली बार ऐसा है कि राहुल के दौरों की चर्चा मीडिया में भी खासी हो रही है और दसवां कारण है राहुल गांधी, गुजरात में पार्टी की छवि बदलने की कोशिश कर रहे हैं इसीलिए मंदिरों में पूजा अर्चना कर हिंदू वोट बैंक को संदेश दिया जा रहा है कि पार्टी उनके साथ है। कांग्रेस जानती है कि मुस्लिम वोट वैसे भी बीजेपी के पास जाने वाला नहीं है। इन दस बड़ी वजह से बीजेपी मुश्किल में है।












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