Gujarat Assembly Election 2017: बीजेपी के शहंशाहों के आगे टिक पाने में कांग्रेस के सामने हैं ये 10 चुनौतियां

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    Gujarat Assembly Election 2017: BJP is biggest challenge for Congress । वनइंडिया हिंदी

    नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार जोति ने लंबे इंतजार के बाद मंगलवार को गुजरात विधानसभा चुनाव 2017 के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी। गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भले ही राजनीतिक बढ़त लेती नजर आ रही है लेकिन ये बढ़त क्या वाकई वोट में तब्दील हो पाएगी, क्या बीजेपी सरकार की एंटी इनकम्बैंसी को कांग्रेस भुना पाएगी, क्या यूथ वोट कांग्रेस की झोली में आएंगे और क्या जातियों का गणित इस बार उसके पक्ष में रहेगा। ऐसे कई बड़े सवाल हैं जिससे कांग्रेस को उबर पाना आसान नहीं है। इसमें कोई शक नहीं है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए गुजरात चुनाव प्रतिष्ठा का ही सवाल नहीं है बल्कि यहीं से 2019 का रास्ता साफ होना है। गुजरात के मतदाता संकेत देंगे कि 2019 के आम चुनाव और बाकी राज्यों के हालात क्या हैं, देश की जनता का मूड किस दिशा में जा रहा है।

    कांग्रेस के साथ क्या मुश्किलें हैं?

    कांग्रेस के साथ क्या मुश्किलें हैं?

    आखिर कांग्रेस के साथ क्या मुश्किलें हैं जिन्हें पार पाना है और इसके बिना गुजरात का साथ उनके हाथ नहीं आने वाला है। सबसे बड़ी मुश्किल नेतृत्व को लेकर है। पहला बड़ा कारण है कि केंद्र में पार्टी की अगुवाई को लेकर लंबे अरसे से चल रहा असमंजस है। राहुल गांधी को कमान सौंपने में जितनी देरी हो रही है, उससे जनता में यही संदेश जा रहा है कि पार्टी में आत्मविश्वास की कमी है।

     राहुल को नेतृत्व सौंपने में बार बार सोच क्यों रही है?

    राहुल को नेतृत्व सौंपने में बार बार सोच क्यों रही है?

    आखिर राहुल को नेतृत्व सौंपने में बार बार सोच क्यों रही है। दूसरा सबसे बड़ा कारण गुजरात में प्रदेश संगठन की उदासीनता रही है। गुजरात की पृष्ठभूमि में जितने कद्दावर नेता बीजेपी के पास हैं, कांग्रेस के पास नहीं। मोदी, अमित शाह, स्मृति ईरानी से लेकर लंबी फेहरिस्त है लेकिन जब कांग्रेस की बारी आती है तो भरत सोलंकी और शक्ति सिंह गोहिल इनके कद के आगे नहीं ठहरते। अहमद पटेल भले ही गुजरात से बढ़े नेता हैं लेकिन उनकी राज्य में चुनाव के अलावा कितनी सक्रिय भूमिका रही है, सभी को मालूम है।

     संगठन के कैडर का बिखराव

    संगठन के कैडर का बिखराव

    तीसरा सबसे बड़ा कारण संगठन के कैडर का बिखराव होना है। 22 साल के लंबे राजनीतिक वनवास की वजह से राज्य में संगठन मजबूत नहीं रहा। कार्यकर्ता निराशा में या तो राजनीति ही छोड़ गए या फिर बीजेपी में चले गए। चौथा सबसे कारण है ओबीसी और पाटीदार दोनों के बीच विश्वास कैसे कायम करें। दोनों जातियां आरक्षण को लेकर एक दूसरे की धुर विरोधी हैं और पार्टी दोनों नांव पर सवार होने के प्रयास में हैं। हो सकता है कि आपसी मतभेद के चक्कर में दोनों ही कांग्रेस के न हो पाएं। खास तौर से खतरा ओबीसी को लेकर है जो राज्य में सबसे ज्यादा तादाद में हैं और पाटीदार कांग्रेस के जितने करीब आ रहे हैं, ओबीसी उतनी ही दूर छिटक सकते हैं जबकि पटेल और ओबीसी पहले से ही बीजेपी के खेमे में रहे हैं।

    कांग्रेस का परंपरागत वोट

    कांग्रेस का परंपरागत वोट

    पांचवां कारण मुस्लिम है। इसमें कोई शक नहीं है कि कांग्रेस का परंपरागत वोट रहा है लेकिन हिंदू वोट को हासिल करने के चक्कर में मुस्लिम वोट बिखरने का खतरा पहले ही भी रहा है और इस चुनाव में भी है। जिस तरह राहुल गांधी गुजरात में हिंदू विरोधी छवि को बदलने के लिए मंदिरों में मत्था टेक रहे हैं उससे मुस्लिम समुदाय की एकजुटता हिल सकती है। छठवां बड़ा कारण मोदी के ताबड़तोड़ दौरे हैं। जाहिर है कि गुजरात में मोदी की जो पकड़ और लोकप्रियता है उसमें कोई दूर दूर तक नहीं ठहरती। जिस तरह उन्होंने गुजरात के चौतरफा सभाएं और रोड शो किए हैं और उनमें हजारों करोड़ की घोषणाएं की हैं, उसका नुकसान कांग्रेस को हो सकता है।

    बूथ लेबल तक मैनेजमेंट

    बूथ लेबल तक मैनेजमेंट

    सातवां कारण आरएसएस की अंदरूनी रणनीति है जो भीतर ही भीतर घात करती है और मात करती है। बूथ लेबल तक मैनेजमेंट और फीड बैक के जरिए बीजेपी को निर्देश मिलते हैं और आगे उसी हिसाब से बदलाव होते हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि मोदी और अमित शाह चौंकाने वाली राजनीति करते रहे हैं। चुनाव में उनके पास जो पत्ते हैं, वो गुजरात में कांग्रेस को कितना सरप्राइज करेंगे, ये किसी को नहीं मालूम जबकि कांग्रेस के पत्ते लगातार खुलते जा रहे हैं। आठवां कारण गुजरात में बीजेपी का पन्ना प्रमुख है जो बूथ लेबल पर तैनात रहता है। ये बीजेपी की बड़ी ताकत है जो बिलकुल निचले स्तर पर काम करती है। कांग्रेस के पास इसका कोई विकल्प नहीं है। नौंवा बड़ा कारण बीजेपी विरोधी दलों को एकजुट न कर पाना है। पहले तो महागठबंधन के तौर पर चुनाव लड़ना मुश्किल है और बन भी जाता है तो खींचतान में उसे निभाना और भी टेढ़ी खीर है।

    पाटीदार, ओबीसी और दलित

    पाटीदार, ओबीसी और दलित

    दसवां कारण टिकट वितरण में पार्टी को सबसे मुश्किल आनी है और थोड़ी सी चूक जी का जंजाल बन सकती है। इसकी वजह ये है कि पार्टी को पाटीदार, ओबीसी और दलित युवा नेताओं को साथ लेकर चल रही है और तीनों को संतुष्ट कर पाना आसान नहीं है। इसके अलावा अहमद पटेल के राज्यसभा चुनाव के वक्त पार्टी से जो विधायक छोड़ कर गए हैं उनका मजबूत विकल्प तलाशना है। यही नहीं यदि बाकी दलों को साथ लेकर चलती है तो उन्हें भी टिकट देने को लेकर पार्टी को खासे दबाव का सामना करना है जबकि बीजेपी के सामने ऐसा कोई संकट नहीं। कुल मिलाकर कांग्रेस खेमे की तस्वीर काफी जोड़ तोड़ और उलझी हुई है जिसे एक तार में पिरोने की सबसे बड़ी चुनौती है।

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