गोपी चंद नारंग जिन्हें भारत और पाकिस्तान दोनों ने सम्मान दिया

गोपीचंद नारंग
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गोपीचंद नारंग

उर्दू के जानेमाने साहित्यकार और आलोचक प्रोफ़ेसर गोपी चंद नारंग ने बुधवार रात लगभग 10 बजे अमेरिकी प्रांत नॉर्थ कैलिफ़ोर्निया के एक शहर में अंतिम सांस ली.

उनकी मौत यूं तो एक आलिम (बुद्धिजीवी) की मौत थी जो बक़ौल एक फ़िलॉसफ़र एक आलमर (दुनिया) की मौत होती है. मगर गोपी चंद नारंग ने जिस तरह की ज़िंदगी जी है, ये उनकी एक यात्रा का समापन और दूसरी अनंत यात्रा का आरम्भ है, और ये मातम का नहीं बल्कि जश्न का वक़्त है.


डॉक्टर मोहन सिकंदराबादी कहते हैं...


यह दौर-ए जूज़व -ए हयात मोहन है अपने कल की तरफ़ ही राग़िब

मिलें के जाकर वहीं पे एक दिन, जुदा हुए थे जहां से पहले


बलुचिस्तान में हुआ जन्म

गोपी चंद नारंग का जन्म 11 फ़रवरी, 1931 को ब्रिटिश इंडिया के दुकी में हुआ था जो कि अब पाकिस्तान के बलूचिस्तान में है.

उर्दू में ऐसा कोई सम्मान नहीं है जो उन्हें न मिला हो. उनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें केवल वही सम्मान नहीं मिले जिसकी ज्यूरी में वो ख़ुद थे जिसमें ज्ञानपीठ सबसे ऊपर है जिसकी उर्दू ज्यूरी के वो सर्वेसर्वा थे.

मगर ज्ञानपीठ वालों का मूर्तिदेवी अवार्ड भी उन्हें मिला. उन्हें साहित्य अकादमी की सबसे बड़ी फ़ेलोशिप मिली, उन्हें पद्मभूषण सम्मान भी मिला.

पाकिस्तान का सबसे बड़ा अवार्ड सितारा-ए इम्तियाज़ भी उन्हें मिला.

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गोपीचंद नारंग

भारत और पाकिस्तान दोनों से मिला सम्मान

वो उर्दू के पहले ऐसे स्कॉलर थे जिन्हें भारत और पाकिस्तान दोनों देशों से नागरिक सम्मान मिला.

उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड मिला और कुछ महीने पहले तक वो साहित्य अकादमी के अध्यक्ष भी रहे. ये संस्था भारत की 24 भाषाओं में भारतीय साहित्य के विकास के लिए काम करती है.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और मौलाना नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी जैसे बड़े विश्वविद्यालयों ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधियां दीं.

उन्होंने कई बरसों तक जामिया मिल्लिया इस्लामिया और दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाया. वह रिटायरमेंट के बाद जामिया और दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर एमिरेट्स भी बनाए गए. उन्होंने सेंट स्टीफ़ेन्स कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपने टीचिंग करियर का आग़ाज़ किया.

फिर वह दिल्ली यूनिवर्सिटी के ही डिपार्टमेंट ऑफ़ उर्दू में रीडर बने. वहां से वो यूनिवर्सिटी ऑफ़ विकॉस्न्सिन और फिर मैडिसन गए. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिनेसोटा और ऑस्लो यूनिवर्सिटी में भी छात्रों को पढ़ाया.

मैडिसन में रहने के दौरान नोबेल पुरस्कार विजेता हर गोबिंद खुराना उनके बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे. जब खुराना एमआईटी जा रहे थे तो उन्होंने नारंग साहब से भी साथ चलने को कहा.

खुराना साहब के इस ऑफ़र पर नारंग साहब ने जो कहा उसकी मिसाल लोग आज भी देते हैं.

उस वक़्त नारंग साहब ने खुराना साहब से कहा था, "आपकी प्रयोगशाला एमआईटी में है और मेरी भारत में."

डॉक्टर हरगोबिंद खुराना को 1968 में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था
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डॉक्टर हरगोबिंद खुराना को 1968 में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था

भारत ने नहीं किया मायूस

भारत ने भी नारंग को मायूस नहीं किया. गोपीचंद नारंग ने जब हरगोविंद खुराना से कहा था कि भारत उनकी प्रयोगशाला है तो उनके ज़ेहन में दूसरे कामों के अलावा दिल्ली की करखंदारी भाषा पर काम करना भी रहा होगा.

इस भाषा में उन्हें शुरुआत से ही दिलचस्पी थी. दिल्ली की उर्दू की करखंदारी बोली पर उनका काम महत्वपूर्ण था जिससे अब शायद बहुत कम लोग परिचित होंगे.

भाषा विज्ञान का उर्दू में वह आरम्भिक दौर था. बाद में नारंग ने उर्दू साहित्य पर अधिक ध्यान दिया. उर्दू साहित्य में टीका को एक पूर्ण शाख़ा बनाने में गोपी चंद नारंग का अहम किरदार था.

उन्होंने उर्दू के 400 साल लंबे सांस्कृतिक इतिहास को अपने शोध का अहम बिंदु बनाया.

https://www.youtube.com/watch?v=wnQIbeib-Zk

किस्सों पर भी किया काम

अपनी ज़िंदगी के आख़िरी पच्चीस सालों से ज़्यादा का वक़्त उन्होंने उर्दू साहित्य की भारतीय जड़ों की तलाश में गुज़ार दिए.

उर्दू किस्सों से माख़ूज़ उर्दू मसनवियां (2002), उर्दू ग़ज़ल और हिंदुस्तानी ज़ेहन-ओ-तहज़ीब (2002), ग़ालिब: मानी आफ़रिनी (2013) इस सिलसिले की महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं.

91 साल की ज़िंदगी में गोपी चंद नारंग को कम से कम 10 बड़े सम्मान मिले और दुनिया की छह बड़ी फ़ेलोशिप मिली. उन्होंने सात जगहों पर पढ़ाने का काम कया और उन्होंने 70 से अधिक किताबें लिखीं जिनमें से आठ अंग्रेज़ी ज़ुबान में, सात हिंदी में और 50 से अधिक उर्दू भाषा में थीं.

उनकी किताबों का दुनिया की कई ज़ुबानों में अनुवाद तो हुआ ही, ख़ुद गोपी चंद नारंग पर 30 किताबें लिखी गईं हैं.

इससे ज़्यादा की कामना किसी लिखनेवाले से करना शायद नाइंसाफ़ी होगी.

उर्दू के चाहने वालों ने भी उन्हें ख़ूब मोहब्बत और इज़्ज़त दी. इतनी मोहब्बत और इज़्ज़त भारत में उर्दू के दूसरे लिखने वालों को कम ही नसीब हुई है.

गोपी चंद नारंग ने अपनी पूरी ज़िंदगी उर्दू को सांप्रदायिकता की क़ैद से निकालने में लगा दी.

वो कहा करते थे, ज़ुबान एडजस्ट कर लेगी और वो ज़िंदा रहेगी, दरिया की तरह जो अपने किनारे बदलता रहता है.

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