विवादों के बीच मध्‍य प्रदेश के ग्‍वालियर में उतरे तीन राफेल फ्रेंच फाइटर जेट

ग्‍वालियर। देश में इन दिनों फ्रांस में बने फाइटर जेट राफेल की डील को लेकर राजनीतिक विवाद है। इन सभी विवादों के बीच राफेल ने रविवार को मध्‍य प्रदेश के ग्‍वालियर में लैंडिंग की हैं। सूत्रों की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक तीन राफेल जेट्स ग्‍वालियर में उतरे हैं और इस दौरान हो सकता है इंडियन एयरफोर्स (आईएएफ) के पायलट्स को इन विमानों पर ट्रेनिंग दी जाए। कहा यह भी जा रहा है कि फ्रांस के पायलट आईएएफ का मिराज 2000 जेट उड़ाएंगे। कहा जा रहा है कि जल्‍द ही राफेल की पहली खेप भारत आ सकती है। गौरतलब है कि भारत ने फ्रांस के साथ 36 राफेल जेट की डील की है।

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36 राफेल की डील

भारत-फ्रांस के बीच 36 राफेल विमानों के लिए 58,000 करोड़ की डील हुई है। डील के मुताबिक फ्रांस भारत को 36 राफेल लड़ाकू विमान और दूसरे हथियार देगा। साल 2016 में फ्रांस के रक्षा मंत्री भारत आए थे और उस समय दोनों देशों के बीच डील फाइनल हुई थी। इस डील के मुताबिक, 18 महीने के बाद भारत को पहला विमान मिलेगा। तीन साल बाद 2019 में विमान भारत को मिलने शुरू होंगे और सभी 36 विमान साढ़े पांच साल में भारत पहुंच जाएंगे। डील के मुताबिक, 18 महीने के बाद भारत को पहला विमान मिलेगा। तीन साल बाद 2019 में विमान भारत को मिलने शुरू होंगे और सभी 36 विमान साढ़े पांच साल में भारत पहुंच जाएंगे।राफेल लड़ाकू विमानों को फ्रांस की डसाल्ट एविएशन कंपनी बनाती है। डील के मुताबिक रफाल के साथ फ्रांस भारत को हवा से मार करने वाली मिसाइलें और दूसरे हथियार भी देगा।राफेल की खासियत ये है कि ये 3800 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है। राफेल से भारत पड़ोसी देशों के कई अड्डों के निशाना बना सकता है

कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी का आक्रामक रुख

कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी राफेल डील को केंद्र की एनडीए सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। उन्‍होंने शुक्रवार को इंडियन एक्‍सप्रेस की एक रिपोर्ट को ट्वीट किया जिसमें कहा गया है कि डील के 10 दिन पहले ही अनिल अंबानी के स्‍वामित्‍व वाली रिलायंस एंटरटेनमेंट की ओर पूर्व फ्रेंच राष्‍ट्रपति फ्रैंकोइस होलांद की पार्टनर की एक फिल्‍म के लिए ज्‍वॉइन्‍ट पार्टनरशिप का ऐलान किया गया था। यह ऐलान उस समय किया गया था जब राफेल पर बातचीत जारी थी। रिलांयस इस फिल्‍म के साथ बतौर सह निर्माता जुड़ा था। राहुल के इस ट्वीट के साथ ही एक बार फिर ठंडे पड़ चुके दूध में उबाल आ चुका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2012 से लेकर 2014 के बीच बातचीत किसी नतीजे पर न पहुंचने की सबसे बड़ी वजह जेट की क्‍वालिटी थी। कहा गया कि डसाल्ट एविएशन भारत में बनने वाले विमानों की गुणवत्ता की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थी। साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर भी रजामंदी वाली स्थिति नहीं थी।

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