कैसे 'असफल चंद्रयान-2' मिशन कर रहा Chandrayaan-3 में इसरो वैज्ञानिकों की मदद?
साल 2019 में चंद्रयान-2 का लैंडर चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग करने ही वाला था, तभी अचानक उसके सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी हुई और वो क्रैश हो गया। ये मिशन असफल रहा, लेकिन इसने चंद्रयान-3 में वैज्ञानिकों की काफी मदद की।
इसरो ने अपनी गलतियों से सीखा और नए यान में कई बदलाव किए। आइए 5 प्वाइंट में जानते हैं कि चंद्रयान-2 के क्रैश के बाद नए यान में क्या-क्या बदलाव किए गए हैं-

1. चंद्रयान-3 के लैंडर की संरचना में बदलाव किया गया है। इसके अलावा उसमें अतिरिक्त फ्यूल भी रखा गया है, ताकि आपातकालीन स्थिति में वो उसका इस्तेमाल कर सके। वहीं यान के सोलर पैनल चंद्रयान-2 की तुलना में बड़े हैं। ये ज्यादा बिजली उत्पादन कर रहे। सबसे खास बात ये है कि पहले एक इंजन से लैंडिंग होती थी, लेकिन अब इंजन की संख्या दो कर दी गई है।
2. वहीं सॉफ्ट लैंडिंग के लिए टचडाउन लिमिट को बढ़ाया गया है। इसरो चीफ सोमनाथ के मुताबिक पिछली बार तेज रफ्तार की वजह से चंद्रयान-2 क्रैश हो गया था, लेकिन इस पर काफी काम किया गया है। इस बार ये सुनिश्चित किया गया है कि 3 मीटर प्रति सेकंड की टचडाउन स्पीड पर भी यान को कोई नुकसान ना हो।
3. पिछली बार लैंडिंग साइट को 500 मीटर x 500 मीटर रखा गया था। जिससे यान को लैंडिंग में दिक्कत हुई। इस बार इसे बढ़ाकर 2.5 किमी x 4 किमी कर दिया गया है। ऐसे में आपातकालीन स्थिति में वो आसपास भी उतर सकता है।
4. इसरो प्रमुख के मुताबिक चंद्रयान-2 ऑर्बिटर बहुत अच्छे से काम कर रहा है। ये चंद्रयान-3 लैंडर के साथ कम्यूनिकेशन का काम करेगा। इससे सिग्नल ग्राउंड स्टेशन तक पहुंचेगा। ऐसे में मिशन को काफी मदद मिलेगी।
5. इसरो चीफ ने ऑन ऑर्बिट टेस्ट पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि नए मेथेड में हर चीज की जांच ऑर्बिट में ही हो सकती है। चंद्रमा की कक्षा में पहुंचाने और लैंडिंग स्थल तक ले जाने की पूरी प्रक्रिया में काफी बदलाव किया गया है।












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