Explained: Mob lynching पर प्रस्तावित कानून क्या है? इसके बारे में सबकुछ जानिए
Mob lynching new law: केंद्र सरकार ने देश में मौजूदा आपराधिक कानूनों को बदलने के लिए बहुत बड़ा कदम उठाया है। आपराधिक कानूनों से जुड़े तीनों पुराने कानूनों की जगह पर तीन नए देशी कानून का प्रस्ताव संसद के सामने पेश किया गया है। इसमें मॉब लिंचिंग के अपराध में मृत्युदंड तक की सजा देने का प्रावधान किया गया है।
देश में पिछले कुछ वर्षों में मॉब लिंचिंग एक बहुत ही गंभीर आपराधिक समस्या के तौर पर उभर कर सामने आई है। इसपर सुप्रीम कोर्ट का रवैया बहुत ही सख्त रहा है। लेकिन, ऐसी घटनाएं पूरी तरह से रुक नहीं पा रही हैं। ऐसे में केंद्र सरकार ने इसे गंभीर अपराध की श्रेणी में लाकर बहुत बड़ा कानूनी और राजनीतिक कदम उठाया है।

मॉब लिंचिंग पर नया कानून क्या है?
शुक्रवार को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने देश में जो आपराधिक कानूनों को बदलने वाले तीन बिल पेश किए हैं, उसमें यह भी प्रावधान शामिल है कि अब मॉब लिंचिंग के लिए न्यूनतम सात वर्ष से लेकर मृत्युदंड या फांसी तक की सजा दी जा सकती है। इसके लिए नए कानून में मॉब लिंचिंग को हत्या की परिभाषा के दायरे में रखा गया है। अभी 1860 की आईपीसी के तहत सिर्फ 11 अपराधों के लिए मृत्यु की सजा का प्रावधान है।
मॉब लिंचिंग के दोषी कौन?
मॉब लिंचिंग को लेकर प्रस्तावित कानून कहता है, 'जो भी हत्या करेगा उसे मृत्यु या उम्र कैद की सजा होगी और जुर्माना भी देना होगा।' इस प्रावधान में इसके बारे में आगे बताया गया है, 'जब 5 या अधिक लोगों का एक समूह एकत्र होकर कुल वंश, जाति या समुदाय, लिंग, जन्म के स्थान, भाषा, व्यक्तिगत विश्वास या किसी अन्य आधार पर हत्या कर देता है, ऐसे समूह के प्रत्येक सदस्य को मृत्युदंड या उम्र कैद या कम से कम 7 वर्ष कारावास से दंडित किया जाएगा; और जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।'
मॉब लिंचिंग पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है?
लाइव लॉ डॉट इन के मुताबिक पिछले महीने ही तहसीन पूनावाला केस में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बेला त्रिवेदी की बेंच ने राज्यों से मॉब लिंचिंग के मामलों में डेटा शेयर करने के लिए कहा है। अदालत ने मौखिक टिप्पणी में स्पष्ट तौर पर कहा कि 'कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती, इसे रोकने की आवश्यकता है।'
न्यायिक निर्णय अदालतों में होते हैं, सड़कों पर नहीं- सुप्रीम कोर्ट
इससे पहले 17 जुलाई, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने देश में कानून हाथ में लेने, मॉब लिंचिंग, सांप्रदायिक हिंसा और हेट क्राइम को लेकर कहा था कि 'यह देखना सरकारों का दूभर कर्तव्य है कि कोई भी इंसान या कोई विशेष समूह कानून अपने हाथ में न ले। हर नागरिक को कानून के उल्लंघन की सूचना पुलिस को देने का अधिकार है। न्यायिक निर्णय की प्रक्रिया न्याय के पवित्र परिसर में होती है, न कि सड़कों पर। किसी को भी यह दावा करते हुए कानून का संरक्षक बनने का अधिकार नहीं है कि उसे किसी भी तरह से कानून की रक्षा करनी है।'
मॉब लिंचिंग के मामले
हाल के महीनों में मॉब लिंचिंग का एक मामला हरियाणा के भिवानी में कुख्यात हुआ था। यहां एक कार से दो आदमियों का जला हुआ शव बरामद हुआ था। उनके रिश्तेदारों के मुताबिक उनकी हत्या कथित गोरक्षकों ने कर दी। दोनों पीड़ित राजस्थान के भरतपुर के रहने वाले थे। पिछले पांच-साढ़े पांच वर्षों में देश के कई हिस्सों से ऐसी जघन्य हत्याओं के मामले सामने आ चुके हैं, जिन्हें मॉब लिंचिंग माना गया है।
मॉब लिंचिंग पर राजनीति
देश में मॉब लिंचिंग को लेकर बीजेपी अक्सर विरोधी दलों के निशाने पर रही है। क्योंकि, ऐसी घटनाओं के तार कई बार कथित गोरक्षकों से जुड़ चुके हैं। सितंबर, 2015 में यूपी के नोएडा के पास दादरी में बीफ खाने के शक में अखलाक की हुई मॉब लिंचिंग को इसकी शुरुआत माना जा सकता है। विपक्षी दलों ने इस घटना को हाथों-हाथ लिया था और दादरी में नेताओं की लाइन लग गई थी। इन घटनाओं को लेकर पीएम मोदी एक बार काफी आहत हुए थे और 6 अगस्त, 2016 को उन्होंने इन कथित गोरक्षकों को असमाजिक तत्व बताया था।
ऐसे में 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले खुद बीजेपी की सरकार की ओर से मॉब लिंचिंग के लिए मृत्युदंड का प्रावधान लाना, बहुत बड़ा राजनीतिक संदेश साबित हो सकता है। खासकर, यह इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि अल्पसंख्यकों का जो पिछड़ा तबका इन घटनाओं में पीड़ित हुआ है, उस पर बीजेपी अबकी बार खास फोकस कर रही है।
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