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J&K: कैसे कश्मीर में अलगाववाद का हुआ खात्मा, घाटी में इस मानसिकता वालों का भविष्य अब क्या है?

End of Separatism in Kashmir: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में यह दावा किया है कि जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद अब खत्म हो चुका है। यह दावा केंद्र सरकार की हालिया कार्रवाइयों के संदर्भ में किया गया है, जिसमें हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से जुड़े कई संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया और कुछ छोटे समूहों ने अलगाववादी विचारधारा से नाता तोड़ने की घोषणा की है।

अमित शाह ने 25 मार्च को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा, 'कश्मीर में अलगाववाद इतिहास बन चुका है। मोदी सरकार की एकीकृत नीतियों ने इसे खत्म कर दिया है।'

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End of Separatism in Kashmir: कश्मीर में अलगाववाद के खात्मे के मायने?

उन्होंने दावा किया कि हुर्रियत से जुड़े दो संगठनों - डेमोक्रेटिक पॉलिटिकल मूवमेंट और जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट - ने अलगाववाद से नाता तोड़ लिया है। इसके अगले ही दिन, शाह ने दो और संगठनों - तहरीक-ए-इस्तेकलाल और तहरीक-ए-इस्तिकामत - के भी अलगाववाद से दूरी बनाने की घोषणा की जानकारी दी।

हालांकि, इन संगठनों की पहचान और उनके वास्तविक प्रभाव को लेकर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। वैसे इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक इनमें से कुछ संगठन केवल नाम मात्र के हैं और इनके नेताओं की कोई प्रमुख राजनीतिक पहचान नहीं है। खुद हुर्रियत से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि उन्होंने पहली बार इन संगठनों के नाम सुने हैं।

Amit Shah on Kashmir: हुर्रियत की पुरानी हरकतें अब बर्दाश्त नहीं

अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से सरकार लगातार हुर्रियत और अन्य अलगाववादी संगठनों पर कार्रवाई कर रही है। इस प्रक्रिया में हुर्रियत के अधिकतर शीर्ष नेता जेल में हैं और संगठन लगभग निष्क्रिय हो चुका है।

हुर्रियत का कट्टरपंथी धड़ा, जिसे पहले सैयद अली शाह गिलानी और अब मसरत आलम चला रहा है, पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है। जबकि नरमपंथी माने जाने वाले धड़े के प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक की गतिविधियों पर सरकार का नियंत्रण है। 2023 में ही उनकी चार साल लंबी नजरबंदी खत्म हुई।

हाल ही में केंद्र सरकार ने मीरवाइज के राजनीतिक संगठन 'अवामी एक्शन कमेटी' और शिया नेता मसूर अब्बास अंसारी के 'इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन' पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। इन संगठनों का कश्मीर की राजनीति में छह दशकों से अधिक तक एक तरह का दबदबा रहा है। इस तरह से लगा है कि सरकार अब हुर्रियत की पुरानी हरकतों को किसी भी रूप को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है।

Modi Govt Kashmir Policy: क्या केंद्र सरकार अलगाववादियों से बातचीत चाहती है?

फरवरी 2024 में मीरवाइज दिल्ली गए थे और कई नेताओं से मुलाकात की थी। इससे उम्मीद जगी थी कि केंद्र सरकार नरमपंथी अलगाववादियों से संवाद करने के लिए तैयार हो सकती है।

लेकिन इसके तुरंत बाद सरकार ने अवामी एक्शन कमेटी और इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन पर प्रतिबंध लगाकर यह स्पष्ट कर दिया कि वह अलगाववादी संगठनों से संवाद तो चाहती है, लेकिन इसके लिए उनके किसी दबाव को झेलने के लिए भी अब तैयार नहीं है।

End of Separatism in Kashmir: कश्मीर में राजनीतिक परिदृश्य का नया स्वरूप

मुख्यधारा की कश्मीरी राजनीतिक पार्टियां सरकार के इन कदमों को एक नए राजनीतिक ढांचे की ओर संकेत मानती हैं। लेकिन, महबूबा मुफ्ती की पीडीपी के लिए अब उम्मीद की किरणें फीकी लगने लगी है।

पीडीपी नेता वहीद पारा का कहना है कि केंद्र सरकार अब घाटी में केवल उन्हीं राजनीतिक दलों के लिए स्थान छोड़ना चाहती है जो मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हैं। उनका कहना है कि सरकार अब 'मौन' को ही कश्मीर में स्थिरता मान रही है।

आने वाले समय में, घाटी में मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के लिए और गुंजाइश बन सकती है, बशर्ते कि वह राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनें।

सरकार की नीति यह स्पष्ट करती है कि वह अब कश्मीर में किसी भी तरह के अलगाववाद को न तो सहन करेगी और न ही इसके लिए कोई जगह छोड़ेगी।

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