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Electoral bonds:दान देने और पाने वालों का नाम उजागर करना जनहित नहीं, CIC ने क्यों कहा ऐसा ?

नई दिल्ली- केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission) ने अपने ही एक पिछले आदेश को पलटते हुए इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए चंदा देने वालों और उसे पाने वाले राजनीतिक दलों को बहुत बड़ी राहत दे दी है। सीआईसी (CIC)ने साफ किया है कि इलेक्टोरल बॉन्ड (Electoral bonds) के दानदाताओं के नामों को उजागर करने में कोई जनहित ( public interest) नहीं है। इसके साथ ही आयोग ने साफ कर दिया है कि इस तरह की जानकारी सूचना के अधिकार (Right to Information) के तहत साझा नहीं दी जा सकती है।

इसमें व्यापक जनहित नहीं- CIC

इसमें व्यापक जनहित नहीं- CIC

महाराष्ट्र (Maharashtra) के एक आरटीआई (RTI) कार्यकर्ता विहार दुरवे ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (State Bank of India) से यह जानकारी मांगी थी कि वह अपने विभिन्न ब्रांचों के जरिए साल 2016 से 2018 के बीच इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने वालों का ब्योरा दे, जो रकम दान के तौर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP), कांग्रेस (Congress) और वामपंथी दलों (Left parties) से समेत दूसरी राजनीतिक पार्टियों (political parties)को दी गई हैं। लेकिन, सूचना आयुक्त सुरेश चंद्रा (information commissioner Suresh Chandra) ने 21 दिसंबर को जारी अपने आदेश कहा है, 'ऐसा लगता है कि दानदाताओं और दान प्राप्तकर्ताओं (donors and donees) के निजता के अधिकार (right to privacy)का उल्लंघन करके ऐसा करने में व्यापक जनहित (public interest) नहीं है।' जबकि, इस साल जनवरी में सीआईसी के दूसरे बेंच ने कहा था कि इलेक्टोरल बॉन्ड्स को और ज्यादा पारदर्शी होना चाहिए और इसे खरीदने वालों का नाम सार्वजनिक होना चाहिए।

इलेक्टोरल बॉन्ड्स के जरिए राजनीतिक दलों को मिलता है डोनेशन

इलेक्टोरल बॉन्ड्स के जरिए राजनीतिक दलों को मिलता है डोनेशन

इलेक्ट्रोल बॉन्ड ऐसी व्यवस्था है, जिसमें कोई नागरिक या कंपनियां (corporates) एसबीआई से इसे खरीदकर राजनीतिक दलों को दान कर सकते हैं, जो इसे वापस बैंक से भुना सकते हैं। समाज के एक वर्ग की यह दलील है कि जनहित में दानदाताओं की पहचान जाहिर होनी ही चाहिए। दरअसल, जनसंपर्क अधिकारी और एसबीआई के फर्स्ट अपिलेट अथॉरिटी(FAA)ने आवेदनकर्ता को यह जानकारी देने से इसलिए मना कर दिया था कि यह सूचना थर्ड पार्टी इनफॉर्मेशन (third party information) के दायरे में आता है, इसलिए इसे जाहिर नहीं किया जा सकता। गौरतलब है कि आरटीआई ऐक्ट (RTI Act)के सेक्शन 8 में यह प्रावधान है कि बिना थर्ड पार्टी की लिखित सहमति के ये सूचनाएं साझा नहीं की जा सकती। लेकिन, उसी में यह भी प्रावधान है कि अगर सूचना अधिकारी इसपर राजी होता है कि यह व्यापक जनहित (larger public interest) से जुड़ा मामला है तो ये सूचना साझा की जा सकती है।

भाजपा को मिला 60% फंड-ADR

भाजपा को मिला 60% फंड-ADR

अपनी याचिका में दुरवे ने कहा था कि दानदाताओं के नाम उजागर करना व्यापक जनहित में और इससे सियासी दलों को मिलने वाले फंड में पारदर्शिता आएगी। उन्होंने कहा था कि 'नागरिकों को यह जानना जरूरी है कि कौन सी कंपनियां किस पार्टी के लिए फंडिंग कर रही हैं, ताकि उन्हें पता चल सके कि क्या वे नीति निर्माण को प्रभावित कर रहे हैं।' अगर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के दावों पर यकीन करें तो इस साल जनवरी तक राजनीतिक दलों को कुल 12,452 इलेक्टोरल बॉन्ड्स मिले थे, जिसकी कीमत 6210.39 करोड़ रुपये है। इसमें से अकेले बीजेपी को 60% और कांग्रेस को 31.5% फंड मिले। एडीआर के मुताबिक भाजपा को मिला ये फंड उसकी ओर से कूपन, वाउचर या कैश में मिले दान से भी ज्यादा था।

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