Election: चुनावी बयार में नेता की माइक से दोस्ती, नतीजों के बाद ईद का चांद!
Lok Sabha Election 2024: चुनाव का मौसम आते ही देश में एक अजीब-सी हलचल मच जाती है। नेताओं का चेहरा चमकने लगता है, जैसे सालों से गूंगे शख्स के मुंह में अचानक आवाज आ गई हो। हर गली, हर मोहल्ले में भाषणों की बाढ़ आ जाती है, मानो शब्दों की सुनामी आ गई हो।
चुनावी अभियानों में तरह-तरह की गतिविधियां परवान चढ़ने लगती हैं। मीडिया में भी इन्हें व्यापक कवरेज मिलता है। यह समय उम्मीदवारों के लिए अपनी नीतियों और वादों को जनता तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण अवसर होता है। इसमें भाषणबाजी, विकास के वादे, रैलियों का तमाशा जैसी हलचल आपको उम्मीदों का सूरज प्रतीत होंगी। लेकिन, हकीकत कुछ और ही होगी। आइए आपको ले चलते हैं इस व्यंगात्मक चुनावी दुनिया में...

नेता जी की भाषणबाजी
नेता जी मंच पर आते हैं, पहले माइक चेक करते हैं, फिर गला साफ करते हैं, और फिर शुरू होता है उनका भाषण। लुभाने वाले शब्दों से शुरू होकर 'देश को बदल देंगे' वाली भावना पर खत्म होता है। ऐसा लगता है जैसे यह देश एक चाय का कप है और नेता जी उसमें चीनी घोलने आए हैं।
विकास के वादे
हर नेता विकास के वादे करता है। लेकिन, अगर चुनाव से पहले का विकास और चुनाव के बाद का विकास देखें, तो लगता है कि विकास एक मिसिंग पर्सन है, जिसे ढूंढ़ने के लिए 'विकास देखा क्या?' के पोस्टर हर जगह लगाए जाने चाहिए।
रैलियों का तमाशा
रैलियों में भीड़ देखकर लगता है, जैसे मानो यह कोई चुनावी सभा नहीं, बल्कि कोई मेलोड्रामा हो। जनता वहां सिर्फ इसलिए आती है, क्योंकि उन्हें मुफ्त खाना और ट्रक में बैठने का मौका मिल जाता है। और नेता जी, को लगता है कि इतनी भीड़ उनकी लोकप्रियता का प्रतीक है।
मनोरंजन का भी बोल-बाला
चुनावी मंच पर कभी-कभी 'मुजरा', कभी लोकगीत, और कभी-कभी 'खटाखट-खटाखट' जैसे बयान और कार्यक्रम भी होते हैं। जनता ताली बजाती है, हंसती है और सोचती है, 'वाह! क्या लोकतंत्र है!'
चुनाव के बाद ईद का चांद!
चुनाव खत्म होते ही नेता जी गायब हो जाते हैं, जैसे जादू की छड़ी घुमाई हो। उनके वादे हवा में उड़ जाते हैं और जनता फिर से अगले चुनाव का इंतजार करने लगती है।
तमाशा या उम्मीदों का सूरज?
लोकसभा चुनाव एक ऐसा तमाशा है, जो हर पांच साल में आता है, मनोरंजन करता है, उम्मीदें जगाता है, और फिर चुपचाप चला जाता है। तो, आप भी तैयार हो जाइए, अगली बार जब चुनाव आए, तो पॉपकॉर्न लेकर बैठिए, क्योंकि यह तमाशा आपको हंसाएगा, रुलाएगा और सोचने पर मजबूर कर देगा कि 'क्या यही है हमारा लोकतंत्र?












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