औवैसी का नया गठबंधन बिहार विधानसभा चुनाव में क्या गुल खिलाएगा ? कैसा रहा है पिछला रिकॉर्ड ?

पटना। सांसद असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की पार्टी आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) और पूर्व सांसद देवेंद्र यादव की समाजवादी जनता दल (डेमोक्रेटिक) इस बार बिहार चुनाव में साथ-साथ हैं। दोनों पार्टियों ने इस गठबंधन को संयुक्त जनतांत्रिक सेक्लुयर गठबंधन (UDSA) नाम दिया है। इन दोनों पार्टियों के मिलने को राजनीतिक दल भले ही महत्व न देने का दिखावा कर रहे हों लेकिन ये माना जा रहा है कि इस गठबंधन के आने से लड़ाई रोचक होने वाली है।

बिहार की राजनीति में जगह ढूढ़ रहे ओवैसी

बिहार की राजनीति में जगह ढूढ़ रहे ओवैसी

ओवैसी पिछले काफी समय से अपनी पार्टी AIMIM को हैदराबाद से निकालकर दूसरे प्रदेशों में विस्तार करने की कोशिश में लगे हुए हैं। इसके लिए ओवैसी बिहार में भी काफी सक्रिय बने हुए हैं। खास बात ये है कि जिस तरह की राजनीति की छवि ओवैसी की बनी हुई है उसमें उनके लिए बिहार में संभावनाएं भी काफी दिखाई देती हैं। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने अपने प्रत्याशी उतारे थे लेकिन पार्टी खाता खोलने में असफल रही थी। हालांकि बाद में हुए उपचुनाव में पार्टी ने एक सीट पर जीत हासिल कर विधानसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है।

ओवैसी के गठबंधन की हो रही चर्चा

ओवैसी के गठबंधन की हो रही चर्चा

अब नजर डालते हैं कि ओवैसी और देवेंद्र यादव की पार्टी के इस नए गठबंधन पर। वैसे तो इस गठबंधन को राजनीतिक दल अपने लिए कोई परेशानी नहीं मान रहे हैं लेकिन इनके साथ आने से सीमांचल क्षेत्र में दूसरे दलों के सामने होने वाली परेशानी किसी से छिपी नहीं है। बिहार की राजनीति का जो सबसे मजबूत वोटिंग समीकरण मुस्लिम यादव वोटबैंक है जिसे एमवाई समीकरण कहा जाता है। अभी तक ये परंपरागत रूप से लालू प्रसाद यादव की जनता दल के साथ रहा है। राज्य में एमवाई वोटर लगभग 30 प्रतिशत है। इसमें 16 फीसदी मुस्लिम मतदाता है जबकि 14 फीसदी यादव वोट हैं।

एमवाई समीकरण में सेंध लगाने की कोशिश

एमवाई समीकरण में सेंध लगाने की कोशिश

ओवैसी जानते हैं कि वो मुस्लिम वोट बैंक में तो कुछ सेंध लगा सकते हैं जो कि उन्होंने लगाई भी है लेकिन सिर्फ 16 फीसदी के सहारे (वो भी पूरा नहीं मिलने वाला) राज्य में अपनी पैठ नहीं बनाई जा सकती है। इसलिए जरूरी है कि दूसरा महत्वपूर्ण वोट बैंक यादव को साधने की कोशिश की जाए। पूर्व सांसद देवेंद्र यादव की सजद (डी) के आने से उम्मीद है कि गठबंधन मुस्लिम यादव वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब होगा। जो अब तक लालू यादव की आरजेडी के साथ रहा है।

सीमांचल की कई सीटों पर मुस्लिम निर्णायक भूमिका में

सीमांचल की कई सीटों पर मुस्लिम निर्णायक भूमिका में

पार्टी ने अभी तक प्रत्याशियों को लेकर घोषणा नहीं की है लेकिन माना जा रहा है कि सीमांचल क्षेत्र में गठबंधन प्रत्याशी उतार सकता है। सीमांचल की 15 सीटें करीब ऐसी हैं जहां मुसलमान मतदाता चुनाव में निर्णायक भूमिका में होते हैं। राजनीति के जानकार कहते हैं कि यूडीएसए की जिन वोटों पर नजर है वो अभी तक राजद के समर्थक माने जाते रहे हैं। ऐसे में ओवैसी और देवेंद्र यादव का गठबंधन जितना अधिक वोट पाएगा, महागठबंधन के खाते से ही खींचेगी। यूडीएसए को फायदा महागठबंधन को नुकसान ही पहुंचाएगा।

ये गठबंधन चुनावों में दिखा सकता है कमाल

ये गठबंधन चुनावों में दिखा सकता है कमाल

यहां ये ध्यान देने की जरूरत है कि पिछले चुनाव में ओवैसी ने छह सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे लेकिन एक भी नहीं जीता था। लेकिन 2019 में किशनगंज उपचुनाव में पार्टी के प्रत्याशी कमरुल होदा ने जीत दर्ज कर सभी को चौंका दिया था। ऐसे में अगर इस बार ओवैसी वोटों का ध्रुवीकरण करने में सफल रहें तो आश्चर्य नहीं किया जा सकता है। चूंकि ये गठबंधन जो भी वोट पाएगा उसका नुकसान महागठबंधन को होना तय है। यही वजह है कि महागठबंधन के नेता ओवैसी पर बीजेपी की टीम बी होने का आरोप लगाकर उन्हें खारिज करते हैं। हालांकि मुस्लिम बहुल इलाके में यूडीएसए गठबंधन के उम्मीदवार भाजपा को कुछ फायदा पहुंचा सकते हैं लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सारे मुसलमान ओवैसी को वोट देंगे।

यही वजह है कि ओवैसी ने देवेंद्र यादव की पार्टी के साथ गठबंधन कर इस खालीपन को भरने की कोशिश की है। दोनों पार्टियों की उम्मीद है कि साथ आने से दोनों एक दूसरे के पक्ष में अपने वोट ट्रांसफर करा पाएंगे और गठबंधन विधानसभा चुनाव में सीटें निकालने में सफल होगा। बता दें कि ओवैसी ने इस बार 50 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया था।

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