दलित बच्चों के साथ स्कूल में भेदभाव, क्यों होती हैं ऐसी घटनाएं

अमेठी के एक सरकारी स्कूल में दलित बच्चों के साथ कथित तौर पर भेदभाव करने के आरोप में स्कूल की प्रिंसिपल को निलंबित करने के बाद उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हो गई है.

वहीं, स्कूल प्रिंसिपल का आरोप है कि उनके ख़िलाफ़ कुछ लोगों ने साज़िश की है और अधिकारियों ने भी कार्रवाई करने से पहले उनकी बात नहीं सुनी.

अमेठी ज़िले के संग्रामपुर इलाक़े में गडेरी गांव स्थित प्राथमिक विद्यालय में पिछले दिनों कुछ अभिभावकों ने आरोप लगया था कि विद्यालय की प्रिंसिपल कुसुम सोनी दलित समुदाय के बच्चों के साथ भेदभाव करती हैं और स्कूल में मिड-डे मील देते समय उन बच्चों की अलग लाइन लगवाई जाती है.

अमेठी के बेसिक शिक्षा अधिकारी डॉक्टर अरविंद पाठक ने बीबीसी को बताया कि स्थानीय लोगों की शिकायत और प्रारंभिक जांच के आधार पर महिला प्रिंसिपल के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई गई है.

बीएसए डॉक्टर अरविंद पाठक का कहना था, "शिकायत मिलने के बाद मैं ख़ुद, खंड विकास अधिकारी, खंड शिक्षा अधिकारी, ग्राम प्रधान के प्रतिनिधि इत्यादि के साथ गांव में गया था. वहां दस बारह महिलाएं और बच्चे भी थे. उन लोगों ने टीचर की कई शिकायतें कीं. जातिगत आधार पर भेदभाव, मिड डे मील के दौरान अलग-अलग लाइन लगवाना, बच्चों को मारने-पीटने जैसी शिकायतें थीं. इस आधार पर एफ़आईआर दर्ज कराई गई है."

प्रिंसिपल का आरोप से इनकार

लेकिन, स्कूल प्रिंसिपल कुसुम सोनी साफ़ तौर पर कहती हैं कि उन्होंने किसी भी बच्चे के साथ ग़लत व्यवहार नहीं किया.

स्थानीय मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, "मिड डे मील में बच्चों को अलग-अलग बैठाकर खाना खिलाने वाली बात पूरी तरह से ग़लत है. बात सिर्फ़ इतनी थी कि तबीयत ख़राब होने के कारण एक दिन हम देर से पहुंचे थे. हालांकि स्कूल खुला था और रसोईकर्मी साफ़-सफ़ाई कर रहे थे. उसी समय ख़ुद को ग्राम प्रधान का प्रतिनिधि बताकर कुछ लोग वहां पहुंचे और उन्होंने सभी को बाहर निकालकर ताला लगा दिया और कुछ बच्चों के अभिभावकों के अलावा मीडिया वालों को बुलाकर अनाप-शनाप आरोप लगा दिए."

दरअसल, ये इकलौता मामला नहीं है जबकि मिड डे मील या फिर अन्य मामलों में सामाजिक भेदभाव के उदाहरण सामने आए हों, बल्कि ऐसा अक़्सर देखने को मिलता है.

ऐसे और भी मामले

अमेठी की घटना के साथ ही इसी हफ़्ते यूपी के मैनपुरी में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया जब दलित समुदाय के बच्चों को खाना खाने के बाद बर्तन अलग रखवाया जा रहा था. शिकायत के बाद अधिकारियों ने शुक्रवार को बेवर प्रखंड स्थित इस स्कूल का दौरा किया और प्रथम दृष्ट्या शिकायत सही मिलने पर स्कूल की प्रिंसिपल गरिमा राजपूत को निलंबित कर दिया.

इसके अलावा अलावा दो रसोइयों को भी हटा दिया गया. लेकिन, स्कूल प्रिंसिपल को निलंबित करने के बाद ग़ैर-दलित समुदाय के लोगों ने विरोध स्वरूप अपने बच्चों को स्कूल भेजना ही बंद कर दिया.

पिछले साल मार्च में बरेली ज़िले के मीरगंज में कपूरपुर प्राथमिक स्कूल कपूरपुर में मिड डे मील के दौरान सामान्य और दलित छात्रों को अलग-अलग जगह से भोजन की थाली व ग्लास दिए जाने का मामला सामने आया था.

यह तब हुआ जब ब्लॉक के ही एक अधिकारी निरीक्षण के लिए वहां पहुंचे थे और उनके सामने ही दलित और ग़ैर दलित बच्चों के लिए अलग-अलग बर्तन की व्यवस्था की गई थी.

साल 2019 के अगस्त महीने में बलिया ज़िले के एक प्राथमिक विद्यालय में मिड डे मील के दौरान भेदभाव का मामला सामने आया था. इस संबंध में एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें दलित बच्चे, सामान्य बच्चों से अलग बैठकर न सिर्फ़ भोजन कर रहे थे बल्कि दलित बच्चे अपनी थाली भी घर से ला रहे थे.

पिछले साल ही कौशांबी ज़िले के एक गांव के प्राइमरी स्कूल में एक महिला टीचर ने दलित रसोइये को पहले खाना बनाने से रोका और न रुकने पर उसकी पिटाई कर दी.

मिड डे मील
Getty Images
मिड डे मील

क्या कहते हैं अधिकारी

ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले विद्यालयों में अक़्सर यह देखने को मिलता है कि यदि रसोइया दलित है तो अगड़ी जाति के बच्चे उसका बनाया खाना खाने से मना कर देते हैं और यदि रसोइया अगड़ी जाति का है तो वो दलित बच्चों के साथ भेदभाव करता है. इन मामलों में स्कूल के अध्यापकों और प्रिंसिपल का भी कहीं न कहीं साथ होता है.

हालांकि, अमेठी के बेसिक क्षिक्षा अधिकारी डॉक्टर अरविंद पाठक कहते हैं कि ऐसी घटनाएं कभी-कभी सामने आती ज़रूर हैं, लेकिन सामान्य तौर पर ऐसा नहीं होता और शिक्षकों से भी इस तरह के भेदभाव को रोकने की कोशिश करने को कहा जाता है.

अरविंद पाठक कहते हैं, "सामान्य तौर पर तो नहीं होता लेकिन इक्का-दुक्का घटनाएं ज़रूर हो जाती हैं. हालांकि विद्यालयों में सामाजिक सद्भाव बढ़ाने की ही कोशिश होती है पर अपवाद तो होते ही हैं और वही घटनाएं समस्या दिखाने लगती हैं. यथासंभव कोशिश यही होती है और बच्चों को भी यही सिखाया जाता है कि सामाजिक सद्भाव और सामाजिक समरसता बनाए रखें.''

''स्कूल में इस सब की ज़िम्मेदारी मुख्य रूप से टीचर की ही होती है और वो लोग ऐसा करते भी हैं, लेकिन कभी-कभी कोई टीचर भी इन सामाजिक विसंगतियों का शिकार हो जाते हैं. पर हां, आमतौर पर ऐसा नहीं होता, अपवाद स्वरूप ही ऐसी घटनाएं होती हैं."

भीमराव अंबेडकर की तस्वीर के साथ विरोध प्रदर्शन
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भीमराव अंबेडकर की तस्वीर के साथ विरोध प्रदर्शन

क्यों होती हैं ऐसी घटनाएं

ऐसी घटनाएं न सिर्फ़ उत्तर प्रदेश में बल्कि अन्य राज्यों में भी देखने को मिलती हैं. लेकिन, भेदभाव के ख़िलाफ़ कड़े क़ानून होने और सामाजिक समरसता की इतनी कोशिशों के बावजूद भेदभाव की ये घटनाएं क्यों होती हैं?

समाजशास्त्री और लेखक रमाशंकर सिंह ने कई राज्यों की जाति-व्यवस्था पर काफ़ी शोध किया है.

रमाशंकर सिंह कहते हैं, "दरअसल, जाति को लेकर जो हमारी समझ है वो हमें किताब से पता चलती है, लेकिन धरातल पर स्थिति अलग है. जाति ऐसी चीज़ है जो कि ख़त्म नहीं हो सकती. यह एक तरह से पुनरुत्पादित होती है. हमारे यहां इसे ख़त्म करने की कभी कोशिश भी नहीं हुई. जितने भी समाज सुधार आंदोलन हुए, उनका परिणाम भी इसी रूप में सामने आया है और आख़िरकार ये आंदोलन भी जातीय पुनरुत्पादन के केंद्र बन जाते हैं. वास्तव में जाति को भारतीय समझ ने कभी भी बुरा नहीं माना बस उसमें सुधार करता रहा है."

रमाशंकर सिंह कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि यह भेदभाव सिर्फ़ जातीय स्तर पर या फिर ग्रामीण पृष्ठभूमि में ही या फिर स्कूलों में ही देखने को मिलता है, बल्कि यह कई स्तरों पर देखा जा सकता है. वो कहते हैं कि यही दलित बच्चे यदि किसी अधिकारी के या फिर किसी अमीर के रहे होते, तो भी क्या स्कूल प्रिंसिपल ऐसा कर सकती थीं?

रमाशंकर सिंह कहते हैं, "हमें यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि जाति अभी भी विद्यमान है जो अलग-अलग रूपों में प्रकट होती रहती है. स्कूल वाली घटनाएं जहां हो रही हैं, वो समाज का सबसे निचला तबका है. उसकी गतिशीलता ज़्यादा नहीं होती. वो नाम और जाति सबसे पहले सीखता है और दूसरे किस जाति के हैं, ये भी वो अपने आप सीख जाता है.''

''अपने से छोटे पर हिंसा करके सुख का अनुभव करने की एक सार्वभौमिक प्रवृत्ति है जो जातीय संरचना में सबसे साफ़ दिखाई देती है, लेकिन अन्य स्तरों पर भी वैसे ही मौजूद है. ग़रीब है तो अमीर उसके ऊपर हिंसा करेगा और आनंद की अनुभूति करेगा. हर व्यक्ति में विशिष्टता का बोध होता है और यह बना हुआ है. इस तरह की घटनाएं इसी सामाजिक स्तरीकरण को दर्शाती हैं और ये इतनी जल्दी ख़त्म होने वाली भी नहीं हैं."

इसी साल जून महीने में महोबा ज़िले में वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हुई वर्चुअल बैठक के दौरान एक दलित ग्राम प्रधान को ज़िले के कुछ लोगों ने कथित तौर पर जबरन कुर्सी से नीचे उतार दिया.

महिला ग्राम प्रधान के पति की शिकायत के आधार पर चार लोगों और कुछ अज्ञात के ख़िलाफ़ एफ़आईआर भी दर्ज कराई गई थी. उनके साथ यह कथित दुर्व्यवहार करने वाले सभी अभियुक्त पिछड़ी जातियों से संबंध रखते थे.

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