तय हार के बावजूद विपक्ष इसलिए लेकर आया मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव

नई दिल्‍ली। मोदी सरकार के खिलाफ बुधवार को पेश अविश्‍वास प्रस्‍ताव को लोकसभा स्‍पीकर सुमित्रा महाजन ने मंजूर कर लिया है। अब 10 दिनों के अंदर लोकसभा में अविश्‍वास प्रस्‍ताव पर चर्चा होगी और सरकार के पक्ष और विपक्ष में वोट डाला जाएगा। मोदी सरकार के खिलाफ पहली बार लाए गए अविश्‍वास प्रस्‍ताव के बारे में सवाल पूछे जाने पर सोनिया गांधी ने जवाब दिया कि किसने कह दिया कि हमारे पास नंबर्स नहीं हैं? हालांकि, हकीकत यही है कि विपक्ष के पास नंबर नहीं हैं और मोदी सरकार के खिलाफ लाया गया अविश्‍वास प्रस्‍ताव गिरना लगभग तय है। किस पार्टी के पास कितने नंबर्स हैं, ये जानना तो कोई कठिन काम नहीं है और नंबर्स झूठ नहीं बोलते। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विपक्ष को पता है कि अविश्‍वास प्रस्‍ताव का गिरना तय है तो उसने आखिर इसे पेश किया ही क्‍यों? इसके पीछे दो अहम कारण हैं-

तय हार के बावजूद विपक्ष इसलिए लेकर आया मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव

पहला, अविश्‍वास प्रस्‍ताव पर चर्चा के दौरान विपक्षी दलों को सरकार को घेरने का पूरा मौका मिल जाएगा, क्‍योंकि इस दौरान वे सदन के पटल पर उन सभी मुद्दों की चर्चा कर सकते हैं, जिनके बारे में बोलने का उन्‍हें का मौका संसद में मिल नहीं रहा था। अविश्‍वास प्रस्‍ताव लाने के पीछे दूसरा अहम कारण है- 2019 से पहले क्षेत्रीय दलों की नब्‍ज टटोलना। उदाहरण के तौर पर शिवसेना काफी समय से 2019 का चुनाव अकेले लड़ने की बात कर रही है, लेकिन महाराष्‍ट्र में बीजेपी सरकार में अब तक बनी हुई है। उसके बारे में पता ही नहीं कि वह एनडीए में शामिल है या एनडीए से बाहर है। अविश्‍वास प्रस्‍ताव के दौरान शिवसेना के सांसदों का रुख क्‍या रहता है, यह देखने का मिलेगा।

शिवसेना के अलावा एनडीए के कई घटक दल हैं, जिनमें नाराजगी है। उनका स्‍टैंड अब क्‍या रहता है, इस पर कांग्रेस व अन्‍य दलों की बराबर नजरें लगी हुई हैं। हालांकि, शिवसेना अविश्‍वास प्रस्‍ताव के संबंध में मिलने आ रहे टीडीपी सांसद से मिलने के लिए इनकार कर चुकी है। बहरहाल, कांग्रेस की कोशिश है कि कैसे भी इस मौके को एनडीए में टूट के तौर पर पेश किया जाए। तेलुगूू देशम पार्टी पहले ही खुद को अलग कर चुकी है। अब इसी पार्टी ने मोदी सरकार के खिलाफ अविश्‍वास प्रस्‍ताव भी पेश किया है। इससे विपक्ष जनता के बीच स्‍पष्‍ट संकेत देना चाहता है कि एनडीए अब बिखर रहा है।

बीजेपी के पास इस समय कुल 274 लोकसभा सीटें हैं। इनमें एक सीट शत्रुघ्‍न सिन्‍हा और एक सीट कीर्ति आजाद की भी है। इसके अलावा लोकसभा स्‍पीकर सुमित्रा महाजन भी शामिल हैं। ऐसे में अलग तीन सीटें कम कर दी जाएं तो बीजेपी के पास 271 का आंकड़ा बचता है, जबकि उसे बहुमत के लिए सिर्फ 268 वोट चाहिए। मतलब मोदी सरकार को अविश्‍वास प्रस्‍ताव गिराने के लिए सहयोगियों की भी जरूरत नहीं है। दूसरी ओर प्रमुख विपक्षी दलों की बात करें तो 2014 लोकसभा चुनाव में सबसे ज्‍यादा 44 सीटें कांग्रेस ने जीतीं। अविश्‍वास प्रस्‍ताव लाने वाली टीडीपी के पास 16 सीटें हैं। 2014 में जेडीएस- 2, राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी 6, आरजेडी 4, तृणमूल कांग्रेस 34, सीपीआईएम 9 सीटें, समाजवादी पार्टी को 5 मिली थीं। इन सभी दलों को अगर मिला जाए तो 120 सीटें ही बनती हैं। हालांकि, बीजू जनता दल के पास 20 लोकसभा सीटें हैं, लेकिन उसने अभी तक रुख साफ नहीं किया।

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