भारत में 1 करोड़ से ज्यादा बुजुर्गों को dementia की आशंका- AI study
एक नया शोध हुआ है, जिससे पता चलता है कि भारत में 1 करोड़ से ज्यादा बुजुर्ग डिमेंशिया की चपेट में हो सकते हैं। बुजुर्गों में भी ज्यादा उम्र के लोगों और महिलाओं को इसकी चपेट में आने की आशंका ज्यादा है।

भारत में 60 साल या उससे ज्यादा के एक करोड़ से भी अधिक लोगों के डिमेंशिया नाम की बीमारी की चपेट में आने की आशंका है। यह शोध एम्स समेत दुनिया भर की कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की ओर से किया गया है। खास बात ये है कि भारत में पहली बार इस शोध के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया गया है, जिसके आंकड़े हालात की गंभीरता की ओर इशारा करते हैं। शोध में यह भी जानकारी दी गई है कि 60 से अधिक आयु में भी किसे इसकी चपेट में आने की आशंका ज्यादा है। यही नहीं इसमें महिलाओं और पुरुषों, ग्रामीण और शहरी लोगों को लेकर भी संभावनाएं जताई गई हैं।

1 करोड़ से ज्यादा बुजुर्गों को डिमेंशिया!- रिसर्च
भारत में 60 साल या उससे ज्यादा के एक करोड़ से अधिक बुजुर्ग डिमेंशिया (बीमारी) या पागलपन/मनोभ्रम/मनोभ्रंश की चपेट में आ सकते हैं। यह वही दर है, जो अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम में है। यह जानकारी अपनी तरह की पहली रिसर्च के बाद सामने आई है। यह रिसर्च जर्नल न्यूरोएपिडेमियोलॉजी में प्रकाशति हुई है। इस शोध के लिए 31,477 बुजुर्गों के डेटा विश्लेषण के लिए सेमी-सुपरवाइज्ड मशीन लर्निंग टेक्निक का इस्तेमाल हुआ है। जो भी हो यह निष्कर्ष भारत के बुजुर्गों में बढ़ती मानसिक बीमारी को लेकर बहुत बड़े खतरे का संकेत दे रहा है।

अमेरिका और यूरोप के देशों की तरह ही हालात-रिसर्च
रिसर्चरों की अंतरराष्ट्रीय टीम ने अपने अध्ययन में पाया है कि भारत में 60 साल से अधिक आयु के बुजुर्गों में डिमेंशिया की व्यापकता दर 8.44% हो सकती है। यह भारत में इस उम्र के दायरे में आने वाले 1.008 करोड़ बुजुर्गों के बराबर है। अगर अमेरिका या यूरोप के कुछ देशों के आंकड़े को देखें तो यह समस्या उन्हीं देशों के समान भारत में भी नजर आ रही है। जैसे अमेरिका में इस आयु वर्ग के 8.8%, यूनाइटेड किंगडम में 9% और जर्मनी और फ्रांस में यह 8.5 से लेकर 9% बुजुर्ग इस समस्या की चपेट में हैं।

ज्यादा बुजुर्ग और महिलाओं में अधिकत दिक्कत-शोध
शोधकर्ताओं ने पाया है कि डिमेंशिया की समस्या ज्यादा उम्र वालों, महिलाएं, अशिक्षित और ग्रामीण इलाकों में रहने वालों में ज्यादा है। यूके में यूनिवर्सिटी ऑफ सरे में हेल्थ डेटा साइंस के लेक्चरर और स्टडी के को-ऑथर हाओमिआओ जिन ने कहा, 'हमारा रिसर्च पहला और भारत में एकमात्र राष्ट्रीय स्तर का शोध था, जिसमें देश के 30,000 से ज्यादा बुजुर्गों की भागीदारी रही।' जिन ने एक बयान में कहा है, 'एआई के पास इस तरह के विशाल और जटिल डेटा की व्याख्या करने की एक खास शक्ति है और हमारे रिसर्च में पाया गया कि लोकल सैंपलों में डिमेंशिया की मौजूदगी पहले के अनुमानों से ज्यादा हो सकता है।'

AI आधारित रिसर्च का नतीजा
इस शोध के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लर्निंग मॉडल को यूनिवर्सिटी ऑफ सरे के अलावा अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न कैलिफोर्निया, यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन और नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं की टीम ने विकसित किया है। मॉडल को डेटा पर ट्रेंड किया गया था, जिसमें नए ऑनलाइन सामंजस्य से 70 प्रतिशत डिमेंशिया के लेबल वाले डेटासेट शामिल किए गए थे। बाकी 30 फीसदी डेटा एआई की भविष्यसूचक सटीकता का आकलन करने के लिए एक परीक्षण सेट के रूप में रिजर्व रखा गया था।
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भविष्य में बीमारियों की खोज में मिलेगी मदद
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को डिमेंशिया की भविष्यवाणी के लिए खुद में ही तैयार किया गया था। यूनिवर्सिटी ऑफ सरे के इंस्टीट्यूट फॉर पीपुल-सेंटर्ड एआई के प्रोफेसर एडरिअन हिल्टन ने कहा, 'इस रिसर्च से हम देख रहे हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में जटिल डेटा से पैटर्न खोजने की बहुत बड़ी क्षमता है, जिससे जीवन बचाने के लिए सटीक चिकित्सा उपाय के विकास के लिए विभिन्न समुदायों के लोगों पर रोग कैसे प्रभाव डालते हैं, इस बारे में हमारी समझ में सुधार कर सकता है।' (इनपुट पीटीआई) (सभी तस्वीरें- सांकेतिक)












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