'वर्जिनिटी टेस्ट' को दिल्ली हाई कोर्ट ने बताया असंवैधानिक, जानें क्या है Sister Sephy से जुड़ा मामला?
दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को कहा है कि किसी भी महिला का कौमार्य परीक्षण करना गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है, इसलिए असंवैधानिक है। केरल के नन हत्याकांड में यह फैसला सुनाया गया है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने किसी भी महिला के कौमार्य परीक्षण को लेकर बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने केरल के तीन दशक से भी पुराने एक मामले में एक महिला आरोपी के पक्ष में फैसला सुनाया है और साफ किया है कि अगर कोई आरोपी या दोषी हिरासत में भी है तो भी उससे गरिमा का अधिकार नहीं छीना जा सकता। मौलिक अधिकारों के तहत गरिमापूर्ण जीवन जीने का उसका पूरा अधिकार कायम रहता है। यह मामला एक नन से जुड़ी मौत का है, जिसमें एक आरोपी सिस्टर ने जांच एजेंसी पर उसका जबरन कौमार्य परीक्षण करने का आरोप लगाया था और यह कार्य को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की थी।

'वर्जिनिटी टेस्ट' को दिल्ली हाई कोर्ट ने बताया असंवैधानिक
दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को फैसला सुनाया है कि किसी महिला आरोपी का भी ' कौमार्य परीक्षण' करवाना असंवैधानिक और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने कहा है कि कानून के किसी भी प्रावधान में 'वर्जिनिटी टेस्ट या कौमार्य परीक्षण' की कोई व्यवस्था नहीं है और इस तरह का परीक्षण अमानवीय व्यवहार है। दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा ने यह फैसला सिस्टर सेफी की याचिका पर सुनाया है। जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में कहा है, 'यह घोषित किया जाता है कि एक महिला बंदी, जांच के दायरे या हिरासत वाली आरोपी, चाहे न्यायिक हो या पुलिस के द्वारा किया जाए, यह असंवैधानिक है और संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जिसमें गरिमा का अधिकार भी शामिल है।'

'शारीरिक,मनोवैज्ञानिक संपूर्णता में दखल'
दिल्ली हाई कोर्ट ने यह आदेश सिस्टर सेफी की ओर से दायर याचिका पर सुनाया है, जिन्होंने 1992 में केरल में एक नन की मौत से जुड़े आपराधिक केस में खुद की वर्जिनिटी टेस्ट को असंवैधानिक करार देने की मांग की थी। अपने आदेश में जज ने कहा, 'इसलिए, यह अदालत मानती है कि ये टेस्ट सेक्सिस्ट है और एक महिला आरोपी की मानवीय गरिमा का भी उल्लंघन है, अगर हिरासत के दौरान उसपर इस तरह का परीक्षण किया जाता है।' अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि महिला के 'हिरासत में गरिमा' के विचार में पुलिस कस्टडी में रहते हुए भी गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है और उसका कौमार्य परीक्षण करना ना सिर्फ जांच एजेंसी द्वारा उसकी शारीरिक, बल्कि उसके मनोवैज्ञानिक संपूर्णता में भी दखल देना है।

'वर्जिनिटी' शब्द का कोई निश्चित साइंटिफिक या मेडिकल परिभाषा नहीं'
अदालत ने यह भी पाया है कि 'अजीब बात है कि 'वर्जिनिटी' शब्द का भले ही कोई निश्चित साइंटिफिक या मेडिकल परिभाषा न हो, यह महिलाओं की पवित्रता की पहचान बन चुकी है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई फैसलों में कहा है कि इंट्रूसिव टेस्टिंग प्रोसेड्योर कोई चिकित्सकीय स्थिति नहीं है।' अदालत ने कहा है कि संविधान के मौलिक अधिकारों के तहत उसके लिए यह मानना मुश्किल है कि अधिकारियों की हिरासत में पहुंचा व्यक्ति अपनी शारीरिक अखंडता को भी सरेंडर कर देता है, जिससे कि उसके शरीर में भी दखलअंदाजी करके अभियोजन पक्ष सबूत जुटा सके।

'गरिमा का अधिकार निलंबित नहीं किया जा सकता'
अदालत ने यह भी कहा है कि गरिमा का अधिकार तब भी निलंबित नहीं होता है, जब किसी व्यक्ति पर कोई अपराध करने का आरोप लगता है या उस गिरफ्तार किया जाता है। हाई कोर्ट के मुताबिक जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को कानून द्वारा तय की गई सुनिश्चित प्रक्रिया के अनुसार ही निलंबित किया जा सकता है। लेकिन, यह भी न्यायसंगत, निष्पक्ष और उचित होना चाहिए, न कि मनमाना, काल्पनिक और दमनकारी। अदालत ने कहा है, 'एक आरोपी की निजी स्वतंत्रता का अधिकार उसी समय निलंबित हो जाता है, जब उसे गिरफ्तार किया जाता है.... क्योंकि यह राज्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक हो सकता है। जबकि, गरिमा का अधिकार एक आरोपी, विचाराधीन या दोषी का भी निलंबित या छीना नहीं जा सकता।'
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जानें क्या है सिस्टर सेफी से जुड़ा मामला ?
याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सामने आरोप लगाया था कि 2008 में केंद्रीय जांच ब्यूरो की ओर से जांच के नाम पर उसे जबरन 'कौमार्य परीक्षण' से गुजरना पड़ा था। इस परीक्षण का नतीजा भी लीक हो गया था। मामला 1992 में केरल में हुई एक नन की हत्या से जुड़ा है, जिसकी जांच तब सरकार की ओर से सीबीआई के हाथों में दी गई थी। (इनपुट- पीटीआई)












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