धनखड़ के बाद राधाकृष्णन—BJP वाकई नया गेम खेल रही है? अब मोदी टीम के सामने ये हैं बड़ी चुनौतियां?
CP Radhakrishnan: सीपी राधाकृष्णन की उपराष्ट्रपति पद पर जीत न सिर्फ बीजेपी के लिए एक औपचारिक सफलता है, बल्कि यह पार्टी के राजनीतिक संदेश का भी हिस्सा है। छह हफ्ते पहले तक हालात बिल्कुल अलग थे। तब देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अचानक इस्तीफा देकर सियासी हलचल मचा दी थी। वजह उन्होंने खराब सेहत बताई, लेकिन असली कारण आज भी परदे के पीछे है।
अब उनके उत्तराधिकारी के तौर पर राधाकृष्णन की जीत ने बीजेपी को एक बार फिर मजबूत स्थिति में खड़ा कर दिया है। राधाकृष्णन की जीत के साथ ही, बीजेपी ने अपनी चुनावी रणनीति की सटीक पहचान एक बार फिर साबित कर दी है। यह जीत केवल एक पद हासिल करने से कहीं ज्यादा है-यह एक मजबूत राजनीतिक संदेश है।

अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि प्रधानमंत्री मोदी इस "उपराष्ट्रपति लाभ" का उपयोग कैसे करते हैं। उन्हें सरकार और पार्टी संगठन में नई ऊर्जा भरनी है, खासकर जब नए बीजेपी अध्यक्ष का पद अभी भी खाली है। इसके साथ ही, उन्हें अमेरिका के साथ व्यापार तनाव और पड़ोसी देशों में हो रही उथल-पुथल जैसी वैश्विक चुनौतियों से भी निपटना है।
🔵 OBC राजनीति में बीजेपी की चाल
राधाकृष्णन पश्चिमी तमिलनाडु की प्रभावशाली गौंडर (OBC) कम्युनिटी से आते हैं। यह चुनाव सिर्फ एक पद भरने का मामला नहीं था, बल्कि बीजेपी ने जातीय समीकरण का बड़ा संदेश दिया है। आज की तारीख में देश के तीन शीर्ष पदों पर देखें तो तस्वीर साफ है, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (आदिवासी महिला), प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (OBC) और उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन (OBC, दक्षिण भारत से)। यह समीकरण बताता है कि बीजेपी ने किस तरह अलग-अलग राज्यों और समुदायों को अपनी मुख्यधारा की राजनीति से जोड़ा है।
आज पूरे देश में OBC राजनीति एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है और राहुल गांधी जैसे विपक्षी नेता जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं, तब बीजेपी ने एक बार फिर अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया है। बीजेपी ने यह जता दिया है कि वह सामाजिक प्रतिनिधित्व के मामले में विपक्ष से दो कदम आगे खड़ी है, खासकर उस समय जब राहुल गांधी जातीय जनगणना की मांग को तेज कर रहे हैं।
🔵 क्रॉस वोटिंग का डर, लेकिन जीत में बढ़त
उपराष्ट्रपति का चुनाव सामान्य तौर पर ज्यादा सुर्खियां नहीं बटोरता। लेकिन इस बार हालात अलग थे। विपक्षी उम्मीदवार बी सुदर्शन रेड्डी (पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज) के मैदान में उतरने के बाद अटकलें तेज हो गईं कि क्या बीजेपी खेमे में क्रॉस वोटिंग होगी? धनखड़ के इस्तीफे और पार्टी के भीतर असंतोष की चर्चा ने इस सवाल को और हवा दी।
विपक्ष ने यह उम्मीद जताई थी कि धनखड़ के इस्तीफे और संजीव बालियान की हार जैसी घटनाओं के बाद NDA के कुछ सांसद असंतुष्ट होंगे और क्रॉस-वोटिंग करेंगे। लेकिन नतीजे ने उल्टी तस्वीर पेश की। राधाकृष्णन को मिले 452 वोट और रेड्डी को मिले 300 वोट। 15 वोट अमान्य हो गए थे। यानी सत्ता पक्ष का पकड़ अभी भी मजबूत है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पार्टी पर नियंत्रण ढीला नहीं पड़ा है।
🔵 बीजेपी ने क्यों चुना राधाकृष्णन?
बीजेपी का राधाकृष्णन को चुनना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। पिछले अनुभवों ने बीजेपी को सबक दिया। चाहे जगदीप धनखड़ हों या सत्यपाल मलिक, दोनों "आउटसाइडर" माने जाते थे और पार्टी के भीतर घुलने-मिलने में मुश्किलें आईं। इस बार बीजेपी ने एक "इनसाइडर" को चुना। राधाकृष्णन एक ऐसे "इनसाइडर" हैं जो प्रधानमंत्री के साथ व्यक्तिगत संबंध रखते हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से भी गहरा जुड़ाव रखते हैं।
राधाकृष्णन के पास एक मजबूत पृष्ठभूमि है, वह 16 साल की उम्र से RSS स्वयंसेवक रहे, दो बार कोयंबटूर से सांसद रहे, तमिलनाडु बीजेपी के अध्यक्ष रहे, तीन राज्यों के राज्यपाल का अनुभव और सौम्य और सभी दलों से बेहतर रिश्ते रखने वाली छवि। यानी पार्टी ने ऐसा चेहरा चुना जो संगठन, विचारधारा और व्यक्तिगत संबंध-तीनों बॉक्स पर टिक लगाए।
🔵 अब मोदी सरकार के सामने अगली चुनौती क्या है?
राधाकृष्णन की जीत के बाद बीजेपी ने यह संदेश तो दे दिया कि उसकी पकड़ संगठन पर बरकरार है। लेकिन भाजपा और पीएम मोदी के सामने अब कई असली चुनौती है।
🔹 राज्यसभा का संचालन: उपराष्ट्रपति के तौर पर राधाकृष्णन को सदन में सरकार और विपक्ष दोनों को साधना होगा।
🔹 संगठनात्मक मजबूती: बीजेपी अध्यक्ष का चुनाव अभी लंबित है।
🔹 क्षेत्रीय विस्तार: तमिलनाडु और दक्षिण भारत में पैठ बनाने का दबाव बढ़ेगा।
इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय हालात भी सरकार की नीतियों को प्रभावित करेंगे। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार भारत पर व्यापारिक दबाव बना रहे हैं, और नेपाल में ओली सरकार का पतन नया सिरदर्द लेकर आया है।
🔵 क्या बीजेपी "Veep Advantage" भुना पाएगी?
सीपी राधाकृष्णन की जीत से बीजेपी ने यह साबित कर दिया है कि संगठन पर उसकी पकड़ अभी भी मजबूत है और OBC राजनीति की दिशा उसने अपने पक्ष में मोड़ ली है। लेकिन आगे की राह आसान नहीं। सवाल यही है कि क्या नरेंद्र मोदी इस "वीप एडवांटेज" को पार्टी और सरकार में नई ऊर्जा भरने के लिए इस्तेमाल कर पाएंगे या यह जीत केवल एक "प्रतीकात्मक सफलता" बनकर रह जाएगी।
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