ना बेड ना ऑक्सीजन ना दवा, ब्लैक मार्केट में जिंदगी की बोली, टूटती सांसों के लिए कौन है जिम्मेदार ?

कोरोना वायस से भारत की स्थिति विकराल है। ज्यादातर अस्पतालों में बेड्स नहीं है तो ब्लैक मार्केट में ऑक्सीजन की कीमत 50 हजार रुपये प्रति सिलेंडर से ज्यादा है।

नई दिल्ली, अप्रैल 26: हर दिन हजारों सांस हमेशा के लिए शांत हो जा रहे हैं। अस्पतालों के बाहर मरीजों की भीड़ त्रासदी की कहानी कहती है और ये तस्वीरें सवाल करती हैं कि इस चमन को बचाने के लिए माली ने क्या क्या किया है? राजधानी दिल्ली समेत भारत के ज्यादातर शहरों में अस्पतालों के पास ना बेड बचे हैं और ना ही वेंटिलेटर्स। अस्पतालों मे कोरोना संक्रमितों को भर्ती करने से इनकार कर दिया है। जान बचाने की उम्मद लिए अस्पताल की चौखट पर पहुंचने वाले मरीज या तो वहीं दम तोड़ रहे हैं या ऑक्सीजन की कमी से किसी ऑटो पर, किसी रिक्शा पर, या किसी अपने के गोदी में तड़प तड़प कर दम तोड़ रहे हैं। जिन मरीजों की जिंदगी बची रहती है, उनके परिजन पागलों की तरह ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स के लिए बदहवास भागते फिरते हैं ताकि कहीं से एक अदद ऑक्सीजन मिल जाए कि वो किसी अपने की उखड़ती सांस को टूटने से बचा ले। ऑक्सीजन सिलेंडर की कीमत इतनी ज्यादा हो चुकी है कि उसे खरीदने में जेब का कमाई से रिश्ता टूट जाता है।

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    50 हजार रुपये में ऑक्सीजन सिलेंडर

    50 हजार रुपये में ऑक्सीजन सिलेंडर

    बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली की रहने वाली अंशु प्रिया नाम की महिला के ससुर की स्थिति कोरोना वायरस की वजह से काफी खराब हो चुकी थी और वो सांस नहीं ले पा रहे थे। अंशु प्रिया ने दिल्ली और नोएडा में ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए काफी दौड़भाग किया लेकिन उन्हें सिलेंडर नहीं मिला। अंत में उन्हें ब्लैकमार्केट से 50 हजार रुपये में एक ऑक्सीजन सिलेंडर खरीदा, जबकि एक ऑक्सीजन सिलेंडर की कीमत सिर्फ 6 हजार रुपये है। अंशु प्रिया के ससुर की जान तो बच गई है लेकिन उनकी सास अब कोरोना की चपेट में हैं और उन्हें भी सांस लेने में दिक्कत है। अब अंशु प्रिया के पास पैसे नहीं बचे हैं कि फिर से ब्लैक मार्केट सेऑक्सीजन सिलेंडर खरीद सकें।

    बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, ऑक्सीजन सिलेंडर सप्लायर्स को बीबीसी की तरफ से ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए जब फोन किया गया तो कई सप्लायर्स ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए 10 गुना रेट चार्ज कर रहे हैं। ये समस्या सिर्फ अंशु प्रिया की नहीं है, बल्कि दिल्ली, नोएडा, लखनऊ, इलाहाबाद और इंदौर समेत ऐसे कई शहर हैं, जहां अस्पतालों में ना बेड्स बचे हैं और ना ही ऑक्सीजन बचा है। दर्जनों अस्पतालों ने मरीजों को भर्ती करने से साफ इनकार कर दिया है। खासकर राजधानी दिल्ली की स्थिति काफी ज्यादा खराब है जहां अस्पतालों में आईसीयू बेड्स नहीं हैं। जिन लोगों के पास पैसा है वो प्राइवेट नर्स, डॉक्टर हायर कर रहे हैं और महंगे दामों पर भी ऑक्सीजन खरीद रहे हैं।

    कोरोना से हाहाकार

    कोरोना से हाहाकार

    भारत इस वक्त दुनिया का अकेला वो देश है, जहां हर दिन 3 लाख से ज्यादा कोरोना मरीज हर दिन मिल रहे हैं, जबकि पिछले 24 घंटे में भारत में कोरोना संक्रमित साढ़े 3 लाख से ज्यादा मरीज मिले हैं। ऐसे में अस्पतालों की स्थिति भी चरमरा गई है, लिहाजा पीड़ितों के पास अपनी हैसियत के मुताबिक घर में ही मरीजों का इलाज कराना पड़ रहा है, भले ही इसके लिए लाखों रुपये खर्च हो रहे हों। लेकिन, परिजनों को मरीजों का ब्लड टेस्ट, सीटी स्कैन और एक्सरे करवाने में भारी दिक्कतें हो रही है। जांच लैब्स की स्थिति ये है कि टेस्ट रिपोर्ट देने में 3 से चार दिनों का वक्त लग रहा है, लिहाजा मरीजों का इलाज करने में और ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। सीटी स्कैन से सीरियस मरीजों की स्थिति का पता आसानी से लगता है, लेकिन भारत के कई शहरों में इस वक्त सीटी स्कैन रिपोर्ट आने में 2 से 3 दिनों का वक्त लगता है और ये वायरस तीन दिनों में इंसानी जिंदगी खत्म कर देता है। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक रिपोर्ट में देरी को लेकर डॉक्टरों का कहना है कि रिपोर्ट में देरी से कई मरीजों की जिंदगी खतरे में आ जाती है, वहीं आरटी-पीसीआर टेस्ट रिपोर्ट आने में भी 2 से 3 दिन का वक्त लग रहा है।

    बड़े खतरे की आशंका

    बड़े खतरे की आशंका

    बीबीसी से दिल्ली के कई डॉक्टरों ने कहा है कि आगे की स्थिति और भयानक होने की संभावना है। काफी मुश्किल से अस्पतालों में मरीजों का इलाज किया जा रहा है। बीबीसी से बात करते हुए दिल्ली के निवासी अनुज तिवारी बताते हैं कि उनके भाई कोरोना पॉजिटिव हैं, लिहादा उन्होंने काफी पैसे देकर ऑक्सीजन कंसंट्रेटर खरीदा, ताकि उनके भाई की सांस चलती रहे। डॉक्टरों ने उन्हें एंटी वायरल इंजेक्शन रेमडेसिवर भी खरीदने को कहा। इस दवा को भारत सरकार की तरफ से इमरजेंसी इस्तेमाल की इजाजत मिल चुकी है और धड़ल्ले से डॉक्टर लिख भी रहे हैं, लिहाजा इस इंजेक्शन की कालाबाजारी हो रही है। अनुज तिवारी को ब्लैक मार्केट से भी इंजेक्शन नहीं मिल पाया और अब वो क्या करें, उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा है। राजधानी दिल्ली के अस्पतालों का कहना है कि आने वाले वक्त में स्थिति और भयावह होने की आशंका है।

    रेमडेसिवर दवा की कालाबाजारी

    रेमडेसिवर दवा की कालाबाजारी

    रेमडेसिवर इंजेक्शन कोरोना के खिलाफ कितनी कारगर है, इसको लेकर अभी तक कोई रिपोर्ट नहीं आ पाई है लेकिन भारत सरकार से इजाजत मिलने के बाद डॉक्टर इस दवा को लिख रहे है। जिन मरीजों का इलाज घर में चल रहा है, उनके परिजन भी किसी तरह रेमडेसिवर दवा खरीदकर अपने पास रख लेना चाहते हैं, ताकि जरूरत के वक्त भटकना ना पड़े। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक कालाबाजारी करने वालों का कहना है कि मार्केट में रेमडेसिवर दवा काफी कम मात्रा में है, इसीलिए वो ज्यादा पैसे चार्ज कर रहे है। भारत सरकार ने सात दवा कंपनियों को रेमडेसिवर बनाने के लिए कहा है, जिनके ऊपर पूरे भारत की जरूरत को पूरा करने की जिम्मेजाकी है। भारत सरकार ने अस्पतालों को कुछ दिन पहले कहा था कि रेमडेसिवर की कमी नहीं होने दी जाएगी लेकिन सरकार ये इंजेक्शन उपलब्ध कराने में नाकामयाब साबित हो रही है। वहीं, बाजारों में नकली रेमडेसिवर इंजेक्शन भी आ चुका है। जिसे ब्लैक मार्केट में असली बताकर बेचा जा रहा है।

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