खनन को नहीं मिली मंजूरी तो महंगी पड़ेगी स्मार्ट सिटीज़
बेंगलुरु (अजय मोहन)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 100 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की योजना का शुभारंभ किया तो, करोड़ों लोगों की आंखों में एक चमक आ गई। हर किसी के अंदर अपने शहर को एक बेहतरीन शहर के रूप में देखने की ललक जागी। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जब तक सुप्रीम कोर्ट खनन के लिये रजामंदी नहीं दे देता, तब तक स्मार्ट सिटी का बनना बेहद मुश्किल है।

स्मार्ट सिटी से खनन का क्या ताल्लुक? यह प्रश्न आपके जहन में जरूर आया होगा। इसका सीधा उत्तर है, इस्पात। जी हां अगर स्मार्ट सिटी बनेगी, तो इंफ्रास्ट्रक्चर में लोहे का व्यापक इस्तेमाल होगा। वर्तमान स्थिति देखें तो खुद की खान नहीं होने की वजह से देश में सबसे ज्यादा इस्पात उत्पादन करने वाली इस्पात कंपनी का प्रोडक्शन प्रभावित हो रहा है, तो बाकियों का अंदाजा आप लगा सकते हैं।
बेल्लारी जिले में स्थित जिंदल स्टील वर्ल्ड सालाना 1 करोड़ टन इस्पात का उत्पादन करता है। वर्तमान में कंपनी को आयरन ओर खरीदनी पड़ रही है। खुद की ओर इसलिये नहीं, क्योंकि खनन के लिये नये आवंटर की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लगी हुई है।
जिंदल स्टील वर्ल्ड के वाइस प्रेसिडेंट (एडमिन) मंजुनाथ प्रभु ने वनइंडिया से बातचीत में बताया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला अगर जल्दी आ जाये, तो देश को सस्ती दरों पर लोहा मुहैया कराया जा सकता है। सिर्फ जेएसडब्ल्यू ही नहीं बल्कि अन्य कंपनियां भी कम लागत में इस्पात बना सकेंगी। जिस रफ्तार से देश स्मार्ट सिटीज की ओर बढ़ रहा है, उससे देखते हुए भारत को जल्द से जल्द खनन आवंटन की ओर कदम उठाने ही होंगे। नहीं तो स्मार्ट सिटी परियोजना प्रभावित होगी।
स्मार्ट सिटीज का काम तो नहीं रुकेगा, लेकिन लागत बढ़ जायेगी। और अगर देश में स्थित इस्पात फैक्ट्रियों को बाहर से आयरन ओर खरीदनी पड़ी, तो लोहे की कीमतें तेजी से ऊपर जायेंगी। ऐसे में सिर्फ दो विकल्प होंगे। भारतीय कंपनियों को कम कीमत में इस्पात उत्पादन के लिये सुविधाएं मुहैया कराना या फिर इस्पात को आयात करना। अगर आयात हुआ तो सबसे ज्यादा फायदा चीन को होगा।
मंजुनाथ प्रभु ने कहा कि अब यह भारत सरकार के ऊपर है। वो निर्णय करे कि फायदा चीन को हो या स्वदेशी कंपनियों को।












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