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CJI डीवाई चंद्रचूड़ का वह फैसला क्या है? जो 21 साल पहले उन्होंने नाथूराम गोडसे के नाटक पर दिया था, जानिए

CJI जस्टिस धनंजय वाई चंद्रचूड़ ने देश की न्याय प्रक्रिया में आने वाले दिनों में काफी बदलाव के संकेत दिए हैं। उनके पास काफी लंबा कार्यकाल होगा, इसलिए उनके लिए अपने विचारों को अमल में ला पाना ज्यादा आसान भी होगा। उन्हें इसके लिए पूरे दो साल मिलेंगे। जस्टिस चंद्रचूड़ एक न्यायमूर्ति के तौर पर कई ऐसे फैसलों के लिए जाने-जाते हैं, जिसने देश के समाज और राजनीति की दिशा बदलने का काम किया है। लेकिन, वह इस तरह के ऐतिहासिक फैसले सुप्रीम कोर्ट में आने के बाद ही नहीं दे रहे हैं। हाई कोर्ट के जज रहते हुए भी उन्होंने सामान्य आदमी की स्वतंत्रता को काफी अहमियत दी थी। इसी में से एक है- 'मी नाथूराम गोडसे बोलतोय' नाटक पर लगा प्रतिबंध, जिसे उस बेंच ने खारिज कर दिया था, जिसमें यह भी शामिल थे।

'सामान्य नागरिकों के लिए काम करना ही प्राथमिकता'

'सामान्य नागरिकों के लिए काम करना ही प्राथमिकता'

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने देश के 50वें मुख्य न्यायाधीश का कार्यभार संभाल लिया है। उन्होंने शपग्रहण के बाद मीडिया वालों से यही कहा है कि 'सामान्य नागरिकों के लिए काम करना ही उनकी प्राथमिकता है।' उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया में सुधार का भी वादा किया है। उन्होंने एक टीवी चैनल से कहा है, 'मेरे शब्द नहीं, मेरा काम बोलेगा।' वह 10 नवंबर, 2024 तक इस पद पर रहेंगे और इस दौरान देश की न्याय व्यवस्था में बदलाव और सुधार लाने के लिए उन्हें पर्याप्त समय मिलेगा। जस्टिस चंद्रचूड़ 13 मई, 2016 को सुप्रीम कोर्ट के जज बने थे; और जब से वह देश की सर्वोच्च अदालत में आए हैं, उन्होंने अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद और निजता का अधिकार समेत कई ऐतिहासिक फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वह उस बेंच के भी हिस्सा रहे, जिसने आईपीसी की धारा 377 को अपराध-मुक्त घोषित किया और समलैंगिंक संबंधों को कानूनी मान्यता दिलाई। इससे, तकरीबन 21 साल पहले वे अभिव्यक्ति की आजादी पर दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले में भी शामिल थे। तब वे बॉम्बे हाई कोर्ट में जज हुआ करते थे।

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    'मी नाथूराम गोडसे बोलतोय' नाटक पर लगा था प्रतिबंध

    'मी नाथूराम गोडसे बोलतोय' नाटक पर लगा था प्रतिबंध

    दरअसल, 1998 में महाराष्ट्र सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी करके मराठी नाटक 'मी नाथूराम गोडसे बोलतोय' के सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक लगा दी थी। यह प्रतिबंध नाटक की स्क्रिप्ट , स्टेज परफॉर्मेंस, ऑडियो-वीडियो कसेट की बिक्री और सेमीनार तक पर लगा दिया गया था। उस समय की महाराष्ट्र सरकार का तर्क था कि इस नाटक की वजह से महात्मा गांधी के हत्यारे का महिमांडन होगा। यह नाटक 90 के दशक में खूब विवादों में रहा था।

    जस्टिस चंद्रचूड़ वाली बेंच ने बैन हटा दिया था

    जस्टिस चंद्रचूड़ वाली बेंच ने बैन हटा दिया था

    टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक महराष्ट्र सरकार के कदम के खिलाफ मामला बॉम्बे हाई कोर्ट में पहुंचा, जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बरकरार रखते हुए 9 अक्टूबर, 2001 को 'मी नाथूराम गोडसे बोलतोय' नाटक पर लगे बैन को हटा दिया। अदालत ने उस सरकारी नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया , जो 3 दिसंबर, 1998 को लगाया गया था। बॉम्बे हाई कोर्ट की फुल बेंच ने महाराष्ट्र सरकार के कदम को अवैध, अमान्य, अधिकार से परे जाकर किया गया फैसला माना और खारिज कर दिया। बॉम्बे हाई कोर्ट की इस फुल बेंच में तत्कालीन चीफ जस्टिस बीपी सिंह, जस्टिस एस राधाकृष्णन और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ भी थे, जो अब देश के मुख्य न्यायाधीश बने हैं।

    महाराष्ट्र सरकार की दलीलें खारिज की

    महाराष्ट्र सरकार की दलीलें खारिज की

    'मी नाथूराम गोडसे बोलतोय' नाटक पर प्रतिबंध लगाने के लिए तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने सीआरपीसी की धारा 95(1) का हवाला दिया था। सरकारी वकील ने हाईकोर्ट से गुहार लगाई कि वह अपने आदेश पर 8 सप्ताह का स्टे जारी कर दे, ताकि वह सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ अपील दर्ज कर सकें। लेकिन, अदालत ने उसकी मांग ठुकराते हुए कहा कि सरकार ने जिस शक्ति का इस्तेमाल किया है, वह कठोर है। कोर्ट ने कहा कि धारा 95 के तहत सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह सिर्फ इस आधार पर कि एक नाटक के खिलाफ समाज के एक वर्ग के विरोध की आशंका है, 'कानून और व्यवस्था' के नाम पर इसे इस्तेमाल करे।

    'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बरकरार रखा...'

    'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बरकरार रखा...'

    सरकारी नोटिफिकेशन में कहा गया था कि नाटक में 'महात्मा गांधी और कुछ समुदायों के खिलाफ अपमानजनक संदर्भ हैं, जिसके चलते सार्वजनिक शांति भंग होने और असामंजस्य को बढ़ावा मिल सकता है।' अदालत ने कहा कि सरकार यह बताने में नाकाम रही है कि नाटक के किस हिस्से से अशांति फैलेगी। इसपर सरकार ने जवाब दिया कि कई राजनीतिक दलों की ओर से इस नाटक के मंचन के खिलाफ उसे शिकायतें प्राप्त हुई हैं। लेकिन, जब अदालत ने सरकार की दलीलों को खारिज कर दिया तो नाटक के लेखक प्रदीप दलवी खुश होकर कोर्ट से निकले और कहा, 'अदालत ने मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बरकरार रखा है.....'

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