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चश्मदीद का दावा, 'जय भवानी, जय शिवाजी के नारे लगा रहे थे कोरेगांव के हमलावर'

भीमा कोरेगांव
BBC
भीमा कोरेगांव

मुंबई की निहाली उपश्याम का दावा है कि वह सोमवार को पुणे के पास कोरेगांव में हुई हिंसा के वक़्त वहां मौजूद थीं.

निहाली मुंबई में नौकरी करती हैं. वह और उनका परिवार दलित आंदोलन से जुड़ा है.

उन्होंने कोरेगांव में उस कार्यक्रम में कलाकृतियों का एक स्टॉल भी लगाया था.

बीबीसी ने निहाली से पूछा कि उस वक़्त उन्होंने वहां क्या देखा और कैसे अपनी जान बचाकर भागने में क़ामयाब रहीं.

पढ़िए, निहाली की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी.

"हम दो दिन पहले से भीमा कोरेगांव पहुंच चुके थे. मेरे पति वहीं के रहने वाले हैं. हम हर साल यहां आते हैं और साल के इस समय यहां त्योहार जैसा माहौल होता है.

सारी दुकानें खुली होती हैं. जो चाहो ख़रीद लो. लेकिन पिछले साल दिसंबर महीने की आख़िरी रात कुछ अलग थी. उस दिन हमने देखा कि सारी दुकानें बंद थी. यहां तक कि कई जगह पेट्रोल पंप भी बंद थे.

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'सारा आसमान धुएं से भर गया'

हमने एक जनवरी को होने वाले कार्यक्रम के लिए स्टॉल लगाया था.

रात 10:30 बजे के आस-पास हमारे लोग गाड़ी से सामान उतार ही रहे थे कि एक मोटरसाइकिल पर दो हट्टे-कट्टे नौजवान आए और हमें कहने लगे कि आप यहां स्टॉल नहीं लगा सकते.

हमने उनकी बात को नज़रअंदाज़ कर दिया.

थोड़ी ही देर में दूर से धुआं उठता नज़र आया. समझ नहीं आया कि क्या हुआ है?

भीमा कोरेगांव
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भीमा कोरेगांव

कुछ ही वक्त बीता होगा कि पूरा आसमान धुएं से भर गया. हमने सोचा कि बाहर जाकर देखना चाहिए कि आख़िर क्या माजरा है?

रात 10:30 बजे से किसी से संपर्क करना मुश्किल हो रहा था.

मेरे पति माहौल देखने बाहर गए, उन्होंने देखा कि गाड़ियां तोड़ी जा रही थीं. उन्हें आग के हवाले किया जा रहा था. वहां रखी सारी मोटरसाइकिलों को क़तार में खड़ा कर उनमें आग लगा दी गई थी.

जो लोग गाडियों में आग लगा रहे थे उनके हाथ में भगवा रंग के झंडे थे और 'वो जय भवानी, जय शिवाजी' के नारे लगा रहे थे.

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'पत्थर बरसा रही थीं औरतें'

क्या आम तौर पर लोग घरों में बोरे भर कर पत्थर रखते हैं? लेकिन उस दिन हमने देखा घरों में से औरतें पत्थर बरसा रहीं थी और घर के मर्द उन औरतों के पीछे से पत्थर मार रहे थे.

स्थिति नाज़ुक थी और हमने वहां से निकलने का फ़ैसला किया.

हमारे साथ बच्चे और महिलाएं थी. तुरंत वहां से निकलना असंभव सा लग रहा था. हमने सोचा कि क्यों न हम वहां बने एक पंडाल के पास जमा हो जाएं क्योंकि उस वक़्त वही सबसे सुरक्षित जगह नज़र आ रही थी.

स्टेज पर मीरा ताई आंबेडकर का भाषण चल रहा था और ठीक सामने वाले घरों में औरतें पत्थरों से भरा बैग लिए खड़ी थी. बस शायद मारना ही बाक़ी था. तभी वहां मौजूद समता सैनिक दल के सैनिकों की ओर से आवाज़ आई कि हम मर जाएंगे लेकिन मीरा ताई को आंच नहीं आने देंगे.

इसके बाद समता सैनिक दल के कार्यकर्ताओं ने चेन बना कर मीरा ताई को गाड़ी में बैठा कर रवाना कर दिया. मीरा ताई के जाते ही वहां भगदड़ के से हालात बन गए.

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'पुलिस मूकदर्शक बनी रही'

हम किसी तरह वहां से निकलने की कोशिश करने लगे. एक-दो किलोमीटर ही चले होंगे कि सामने से फ़ायरिंग की आवाज़ सुनाई देने लगी.

गौर से देखा तो गैस सिलिंडर फट रहे थे. दिवाली के पटाखों की तरह लगातार 30-40 धमाकों की आवाज़ें आई. जिसके बाद लोग खुलेआम आसमान में गोलियां चलाते नज़र आए.

इन आवाज़ों को सुन लोग उल्टी दिशा में भागने लगे. तभी कुछ लोग हाथों में नंगी तलवारें लिए हमारी ओर बढ़ते दिखाई दिए.

हमारे पीछे पुलिस थी लेकिन बजाए इसके कि वो इन लोगों को कहे कि आप ये सब बंद करें, वो हमें ही लाठी मार रही थी और कह रही थी कि हम वहां से भाग जाएं.

'गांव वालों ने भी शरण नहीं दी'

बिना कुछ सोचे हम पुल के नीचे उतर गए. नीचे एक गांव था. हमें लगा कि शायद यहां थोड़ी देर के लिए हमे छिपने की जगह मिल जाएगी.

लेकिन गांव की औरतों ने हमे कहा कि ''आप यहां से चले जाइए नहीं तो हमारे गांव को जला दिया जाएगा''.

आगे बढ़े तो सामने हमे सीआरपीएफ़ के सात लोग नज़र आए. जबकि जो लोग वहां उत्पात मचा रहे थे उनकी संख्या क़रीब 1500 के आस-पास थी.

'तलवार लेकर हमारी और दौड़े'

वहां आने वाले बौद्ध समाज के लोग सफेद कपड़े पहनते हैं और जो लोग वहां हिंसा पर उतारू थे उन्होंने भी सफेद कपड़े ही पहन रखे थे, शायद ये लोग अपने को इन लोगों के बीच छिपाने की कोशिश कर रहे थे.

लेकिन एक चीज़ जो इन लोगों को बाक़ी लोगों से अलग कर रही थी वो ये कि इनके हाथों में भगवा झंडा था और ये 'जय भवानी, जय शिवाजी' के नारे लगा रहे थे.

हमारी गाड़ी को काफ़ी नुकसान पहुंचाया गया था. हमारी आंखों के सामने एक नई स्विफ़्ट डिज़ायर गाड़ी को आग लगा दी गई.

गाड़ी को आग के हवाले करने के बाद वे लोग तलवार हाथों में लिए हमारी ओर भागने लगे. हम तुरंत अपनी गाड़ी में बैठे और गाड़ी दौड़ा दी.

अगर हम उस समय वहां से नहीं भागते तो शायद मैं अपने पति को खो देती.

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हमारे कुछ दोस्त चाकण रोड से वापिस लौट रहे थे, उनकी गाड़ी पर भी हमला किया गया. ये सब भीमा कोरेगांव में ही नहीं हो रहा था बल्कि एक साथ कई गांवों में हो रहा था .

जो लोग ये सब कर रहे थे उन्हें मैं बच्चे कहूंगी क्योंकि उनकी मूंछें तक नहीं आई थीं. उनकी उम्र 14-15 साल के आस-पास रही होगी.

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