अपने आंसू रोकता-पोंछता चंडीगढ़

नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) आप कभी चंड़ीगढ़ गए हो तो आपको समझ आ ता है कि सिटी ब्यूटिफूल के लोगों को किसी से मतलब नहीं। यानी चंड़ीगढ़ से बाहर से उन्हें कोई लेना-देना नहीं। पर इन दिनों ये शहर उदास है। निराश है। एक कमी का अहसास कर रहा है चंड़ीगढ़।

नहीं रहे नेकचंद

इसके बड़े बुजुर्ग यानी नेक चंद जी नहीं रहे। वे इस शहर की जान रहे हैं। चंडीगढ़ का सबसे खास लैंडमार्क उन्होंने ही बनाया। कैसे बनाया, इसे अब सारा देश जानता है। दैनिक ट्रिब्यून के वरिष्ठ पत्रकार अरुण नैथानी ने कहा कि उनके अचानक से संसार से चले जाने से कुछ इस तरह का भाव मन में आ रहा है कि शहर में अब पहले वाला मजा नहीं रहा। कुछ खोने का फीलिंग आ रहा है।

खुश चंडीगढ़

दरअसल चंडीगढ़ में सब खुश-सब संपन्न। इधर आपको कोई भिखारी नहीं दिखता। बड़ी मुश्किल से कोई फटेहाल शख्स दिखता है। हैंडसम और खूबसूरत चेहरे वाले लोगों का यह है शहर। फ्रेंच आर्किटेक्ट ला कार्बयूजियर के शहर में सब एक दूसरे को जानते हैं। सारा शहर बेजोड़ है हर लिहाज से। शिवालिक की चोटियों को यहां से देखना सच में बहुत सुखद लगता है।

हिल गए चंडीगढ़ वाले

चंडीगढ़ की वरिष्ठ टीवी एंकर और पत्रकार राजेन्द्र कौर कहने लगी कि नेकचंद जी के जाने से हम चंडीगढ़ वाले हिल गए हैं। उनका हमारा बीच में होना बहुत सुखद अहसास देता था। उनसे हम सब लोग बात करने चले जाते थे। वे बीते दौर और वर्तमान के बीच के सेतु थे।

जाना जसपाल भट्टी का

इससे पहले चंडीगढ़ वाले तब उदास हुए थे जब कुछ साल पहले जसपाल भट्टी की एक सड़क हादसे में जान चली गई थी। वे भी खाटी चंडीगढ़ वाले थे। यहां के सवालों को लेकर नुक्कड़ नाटक खेलते थे। तब भी कुछ इस तरह का अहसास हुआ चंडीगढ़ वालों को मानों उन्होंने कोई अपना बहुत करीबी खो दिया हो।

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