अडानी ग्रुप को सोलर टेंडर मामले में मिली बड़ी राहत
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने सोलर पावर टेंडर मामले में अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड और उसकी ग्रुप कंपनियों को बड़ी राहत दी है। आयोग ने बाजार में दबदबे के दुरुपयोग और प्रतिस्पर्धा विरोधी गतिविधियों के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पहली नजर में प्रतिस्पर्धा कानून के उल्लंघन का कोई मामला नहीं बनता है।

दिल्ली के रवि शर्मा नाम के एक व्यक्ति ने अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड, गौतम अडानी, एज़्योर पावर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SECI) समेत कई राज्य बिजली वितरण कंपनियों और सरकारी संस्थाओं के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि SECI द्वारा 2019 में जारी 7 गीगावाट सोलर पावर प्रोजेक्ट्स का टेंडर अडानी ग्रुप और एज़्योर पावर जैसे बड़े खिलाड़ियों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाया गया था। इसमें यह भी दावा किया गया कि बिडिंग प्रक्रिया ने प्रतिस्पर्धा को रोका और प्रोजेक्ट्स को अडानी की कंपनियों के पक्ष में ट्रांसफर करने में मदद की।
शिकायतकर्ता का कहना था कि अडानी ग्रुप ने अपनी बाजार स्थिति का फायदा उठाकर छोटे खिलाड़ियों को बाहर किया और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में अपनी धाक का गलत इस्तेमाल किया। इन आरोपों में अमेरिका की जांच एजेंसियों द्वारा की गई कुछ जांचों का भी हवाला दिया गया था।
हालांकि, SECI और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के जवाबों और सभी दस्तावेजों की जांच के बाद, CCI ने पाया कि कार्टेलाइजेशन, बिड रिगिंग (बोली में हेराफेरी) या दबदबे के दुरुपयोग के दावों का समर्थन करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं हैं।
CCI ने अपने आदेश में कहा कि भारत का बिजली उत्पादन बाजार काफी बड़ा और प्रतिस्पर्धी है, जिसमें NTPC, टाटा पावर, JSW एनर्जी और सुजलॉन एनर्जी जैसे कई सरकारी और निजी खिलाड़ी मौजूद हैं। ऐसे में आयोग का मानना है कि अडानी ग्रुप इस सेक्टर में एकाधिकार या दबदबे वाली स्थिति में नहीं दिखता।
टेंडर की शर्तों पर रेगुलेटर ने स्पष्ट किया कि टेंडर जारी करने वाली एजेंसियों को अपनी जरूरतों के हिसाब से पात्रता मानदंड और तकनीकी शर्तें तय करने का पूरा अधिकार है। सिर्फ इसलिए कि इन शर्तों की वजह से बड़े खिलाड़ी ही हिस्सा ले पा रहे हैं, इसे प्रतिस्पर्धा विरोधी नहीं माना जा सकता।
आयोग ने 'ग्रीन शू ऑप्शन' और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को बिजली उत्पादन से जोड़ने जैसे प्रावधानों पर भी आपत्ति को खारिज कर दिया। CCI ने नोट किया कि ये प्रावधान घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की सरकारी नीति का हिस्सा थे और केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) भी इन्हें सही ठहरा चुका है।
एज़्योर पावर से अडानी की कंपनियों को क्षमता ट्रांसफर करने के आरोपों पर CCI को मिलीभगत का कोई सबूत नहीं मिला। आयोग ने SECI के उस स्पष्टीकरण को स्वीकार कर लिया जिसमें कहा गया था कि रिन्यूएबल एनर्जी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सभी नियमों का पालन करते हुए और स्टेकहोल्डर्स की सलाह से ही यह बदलाव किए गए थे।
रेगुलेटर ने यह भी साफ किया कि रिश्वतखोरी या भ्रष्टाचार के आरोप (अगर मान भी लिए जाएं) तब तक प्रतिस्पर्धा कानून के तहत 'दबदबे का दुरुपयोग' नहीं माने जा सकते, जब तक कि वे सीधे तौर पर बाजार की प्रतिस्पर्धा को प्रभावित न करें।
अंत में, यह निष्कर्ष निकालते हुए कि शिकायतकर्ता प्रतिस्पर्धा विरोधी व्यवहार साबित करने के लिए विश्वसनीय सबूत देने में विफल रहा, CCI ने प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 की धारा 26(2) के तहत मामले को बंद करने का आदेश दिया।
इस फैसले से अडानी ग्रुप और अन्य संबंधित कंपनियों को बड़ी राहत मिली है। साथ ही, आयोग ने यह भी साफ कर दिया है कि किसी भी जांच के लिए केवल आरोप काफी नहीं हैं, बल्कि ठोस सबूत और बाजार को होने वाले नुकसान का स्पष्ट प्रमाण होना जरूरी है।












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