Caste Census: जातिगत जनगणना पर कांग्रेस और सहयोगियों का पाखंड बेनकाब, मोदी सरकार के एक्शन से सकते में विपक्ष
Caste Census: केंद्र की मोदी सरकार ने देश में जातिगत जनगणना करवाने का निर्णय लेकर कांग्रेस समेत अनेक विपक्षी दलों से एक ज्वलंत मुद्दा छीन लिया है। यही कारण है कि वे तमाम पार्टियां तिलमिलायी हुई है। हर मौके पर भाजपा सरकार के हर फैसले पर अकारण सवाल उठाने वालों को भी इस फैसले पर कुछ कहते बन नहीं रहा है तो क्रेडिट-वार शुरु हो गया है।
तमाम पार्टियां श्रेय लेने के लिए मैदान में उतर गई हैं। कांग्रेस और राजद ने तो अपने कार्यालय के बाहर अपने प्रचार में पोस्टर भी लगवा लिया।

कांग्रेस और सामाजिक न्याय की बात करने वाली उसकी सहयोगी पार्टियों का असली चेहरा जातिगत जनगणना के मुद्दे पर बेनकाब हो चुका है। आज़ादी के बाद से कांग्रेस ने बार-बार इस जरूरी जनगणना से मुंह मोड़ा, जिससे ओबीसी, एससी-एसटी और अन्य वर्गों के हक़ की लड़ाई अधूरी रह गई।
'संसोपा (संयुक्ट सोशलिस्ट पार्टी) ने बांधी गांठ...'
"संसोपा (संयुक्ट सोशलिस्ट पार्टी) ने बांधी गांठ, पिछड़ा पावे सौ में साठ" यह नारा कोई भाजपा या आरएसएस का नारा नहीं बल्कि राममनोहर लोहिया के नेतृत्त्व में बनी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का नारा है। दशकों तक सरकार में रहने के बावजूद कांग्रेस ने इस दिशा में कभी कोई कदम नहीं उठाया।
कांग्रेस का रिकॉर्ड: चुप्पी और टालमटोल
1931 में ब्रिटिश सरकार ने अंतिम बार जातिगत जनगणना करवाई थी। 1951 में जब पहली जनगणना स्वतंत्र भारत में हुई, तब कांग्रेस ने जानबूझकर जातिगत आंकड़े जुटाने से इनकार कर दिया। यह कोई तकनीकी समस्या के कारण नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी - पीछड़े वर्गों को हमेशा पीछे रखने की। यह साजिश थी वंचित वर्गों को सत्ता की पहुंच से दूर रखने की।
'अंबेडकर और लोहिया जैसे नेता हाशिए पर धकेल दिए गए'
दलित और पिछड़े वर्गों के हित की बात करने वाले अंबेडकर और लोहिया जैसे नेता हाशिए पर धकेल दिए गए। दशकों तक सत्ता कांग्रेस की जेब में रही लेकिन उन्होने इन वर्गों के उत्थान के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया, उल्टे आरक्षण को ही उपकार की तरह लादकर वोटबैंक की राजनीति करते रहे।
केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने कही खास बात
कांग्रेस और लालू यादव की राजद द्वारा क्रेडिट की लूट पर निशाना साधते हुए केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी ने कहा कि '30 साल पहले जब बिहार में राजद का शासन था तब क्यों नहीं करवा लिया।' भाजपा नेताओं ने भी कांग्रेस को लताड़ लगाते हुए कहा कि 'वे पिछड़े वर्गों के इतने ही हिमायती थे तो दशकों के शासनकाल में कुछ किया क्यों नहीं।'
यूपीए सरकार और 2011 की जनगणना का सच
2010 में तत्कालीन कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने जातिगत आंकड़े शामिल करने की मांग की थी, लेकिन कांग्रेस सरकार ने इस मांग को खारिज कर दिया। मजबूरी में 2011 में एसईसीसी (सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना) करवाई गई, लेकिन वह भी मुख्य जनगणना से अलग और अपूर्ण रही। इसके लिए देश का 5,000 करोड़ रुपये खर्च हुआ फिर भी जातिगत आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया गया।
कर्नाटक का 'फर्जी' सर्वे: जाति जनगणना का ढोंग
कांग्रेस-शासित कर्नाटक में 2015 में एक सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सर्वे किया गया, लेकिन रिपोर्ट को दबाकर रखा गया। जब फरवरी 2024 में इसे जारी किया गया, तो उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार तक ने इसे नकार दिया। वोक्कालिगा और लिंगायत जैसी प्रभावशाली जातियों की नाराजगी के डर से कांग्रेस पीछे हट गई।
राज्य-स्तरीय सर्वे की नौटंकी बंद होनी चाहिए
मोदी सरकार अब पूरे देश के लिए वैज्ञानिक और पारदर्शी जाति जनगणना की पेशकश कर रही है, जिससे हर राज्य में अलग-अलग खर्च होने वाली हजारों करोड़ की बर्बादी रुके। यहाँ एक बात और समझना जरूरी है सर्वे और जनगणना में मूलभूत अंतर होता है। सर्वे के नतीजे प्रतीकात्मक और सैंपल-साइज पर आधारित होते हैं जबकि जनगणना एक व्यापक आधार पर होती है।
कांग्रेस की शर्मनाक विरासत: ओबीसी, एससी और एसटी नेताओं का अपमान
- सीताराम केसरी को सोनिया गांधी के लिए पार्टी से बाहर फेंका गया।
- वीरेंद्र पाटिल को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से बेआबरू करके हटाया गया।
- जगजीवन राम को कांग्रेस में कभी उभरने नहीं दिया गया।
- बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर का कैसा अपमान किया
- डॉ. अंबेडकर को हिंदू कोड बिल पर समर्थन नहीं मिला।
- दलितों के लिए सुरक्षित मुंबई नॉर्थ से बाबा साहब को साम-दाम लगाकर हरवाया।
- ओबीसी समाज से आने वाले प्रधानमंत्री मोदी की गरीबी का मज़ाक उड़ाया।
- रामनाथ कोविंद को एक बार भी सोनिया गांधी ने शुभकामना तक नहीं दी।
- द्रौपदी मुर्मू के लिए भी कांग्रेस का रवैया अपमानजनक रहा।
बीजेपी कर रही है असली काम
मोदी सरकार ने एससी वर्ग में आंतरिक आरक्षण पर राष्ट्रीय समिति बनाई। तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों को भी इस दिशा में कदम उठाने पड़े, लेकिन कांग्रेस इन रिपोर्ट्स पर भी टाल मटोल ही करती रही है। मंडल कमीशन की सिफारिशों को भी कांग्रेस ने वर्षों तक ठंडे बस्ते में दबाए रखा और आखिरकार विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्त्व में जब केंद्र में रामो-वामो की सरकार बनी तब मंडल कमीशन की अनुसंशा को लागू किया गया। मजेदार बात यह है कि कांग्रेस मंडल-आयोग के खिलाफ देश भर में महौल खराब करवा रही थी, उस समय भारतीय जनता पार्टी मंडल लागू करने वाली सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी।
अब वक्त है एक्शन का, बहानेबाज़ी नहीं
जातिगत जनगणना सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है- यह हक़, प्रतिनिधित्व और न्याय की लड़ाई है। कांग्रेस ने इसे दशकों तक नजरअंदाज किया, लेकिन अब मोदी सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति से देश को सही दिशा मिल रही है। देश में हर वर्ग को उसका उचित हक़ मिलना ही चाहिए। हम समय के उस दौर से गुजर रहें हैं जहाँ पहचान शब्दों की नहीं कर्मों की मोहताज होती है। संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए जातिगत जनगणना पहला कदम है। और इस दिशा में पहला कदम बढाकर भाजपा ने समकालीन पार्टियों पर बढत हासिल कर ली है, इसमें कोई दो राय नहीं है।
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