कैप्टन अमरिंदर सिंह बनेंगे उपराष्ट्रपति?, कांग्रेस की कमजोरी बनी भाजपा के लिए वरदान!
नई दिल्ली, 03 जुलाई। कांग्रेस पार्टी पिछले 8 सालों में एक के बाद एक चुनाव हार रही है। कांग्रेस को लगातार दो बार लोकसभा चुनाव में शर्मनाक हार का मुंह देखना पड़ा। यही नहीं एक के बाद एक अहम राज्यों में पार्टी को विधानसभा चुनाव में पराजय मिली। कई राज्यों में तो कांग्रेस पार्टी का सूपड़ा ही साफ हो गया। इसकी एक बड़ी वजह भारतीय जनता पार्टी का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उदय और दूसरी बड़ी वजह रही कांग्रेस के भीतर कुशल नेतृत्व की कमी। दरअसल जिस तरह से नरेंद्र मोदी का 2014 में देश केंद्र की राजनीति में उदय हुआ उसका सामना करने में कांग्रेस का नेतृत्व बुरी तरह से चूक गया।
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अंदरूनी कलह से हाथ से जा रहे एक के बाद एक राज्य
एक तरफ जहां कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ रहा था तो दूसरी तरफ कर्नाटक, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, गोवा, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर के राज्यों में कांग्रेस की हालत समय के साथ खराब ही होती गई। कांग्रेस में शीर्ष नेतृत्व की विफलता के चलते पार्टी के भीतर कई राज्यों में अंदरूनी फूट सामने आई और इस फूट को पार्टी संभालने में बुरी तरह से विफल रही, जिसका फायदा उठाने में भारतीय जनता पार्टी ने कोई कसर नहीं छोड़ी।

नेतृत्व का अभाव कांग्रेस के लिए पड़ रहा भारी
राजनीति में सबसे बड़ी जरुरत होती है नेतृत्व की निर्विवाद स्वीकार्यता। लेकिन कांग्रेस पिछले तकरीबन एक दशक से इसकी कमी से जूझ रही है। सोनिया गांधी के बाद पार्टी राहुल गांधी पर निर्भर है और एक के बाद एक उसे हर जगह असफलता ही देखने को मिली। यही वजह है कि पार्टी के भीतर शीर्ष नेताओं की बगावत देखने को मिली और पार्टी के कई दशकों पुराने नेताओं ने भी अलविदा कह दिया। कुछ नेता दूसरे दल में चले गए तो कुछ ने पार्टी के भीतर रहते हुए शीर्ष कमान को कटघरे में खड़ा कर दिया।

पंजाब का जाना कांग्रेस के लिए सबसे मुश्किल चुनौती
यूं तो कांग्रेस पार्टी ने कई राज्यों को नेतृत्व की कमी के चलते और भाजपा के वर्चस्व के चलते गंवा दिया। गोवा, उत्तराखंड, असम, हरियाणा, मध्य, गुजरात सहित कई अन्य राज्यों में कांग्रेस को भाजपा से सीधी चुनौती मिली और कांग्रेस यहां अस्तित्वकी लड़ाई लड़ती नजर आ रही है। लेकिन पंजाब एक ऐसा राज्य था जिसे कांग्रेस का गढ़ माना जाता था और भाजपा यहां कहीं नजर नहीं आती। लेकिन जिस तरह से नवजोत सिंह सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर सिंह का टकराव सामने आया उससे ना सिर्फ कांग्रेस ने प्रदेश को गंवाया बल्कि पहली बार आम आदमी पार्टी ने यहां पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में भी सफलता हासिल की।

पंजाब में बोरिया-बिस्तर सिमटा
पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता माना जाता था। वह प्रदेश में दो बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन जिस तरह से उनका शीर्ष नेतृत्व के साथ टकराव सामने आया और फिर स्थानीय नेताओं के साथ आपसी विवाद हुआ उसके चलते पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री पद से ही हटा दिया। जिसके बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ अलग पार्टी बना ली और भाजपा के साथ मिलकर पिछला विधानसभा चुनाव लड़ा। कांग्रेस पंजाब की सत्ता में थी, लेकिन इस विवाद के चलते उसे ना सिर्फ चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा बल्कि 117 विधानसभा सीट वाले प्रदेश में 18 सीटों पर सिमट गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री चरणजीतसिंह चन्नी दोनों सीटों से चुनाव हार गए और नवजोत सिंह सिद्धू जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर गड़ाए थे उन्हें भी चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।

2024 भी कांग्रेस के लिए मुश्किल!
अमरिंदर सिंह जैसे कद्दावर और वरिष्ठ नेता के साथ जिस तरह का बर्ताव कांग्रेस ने किया उसका खामियाजा पार्टी को ना सिर्फ विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ा बल्कि अब आने वाले लोकसभा चुनाव में भी ये नतीजे उसके लिए सिर दर्द बन सकते हैं। दरअसल सूत्रों का कहना है कि एनडीए कैप्टन अमरिंदर सिंह को उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार बना सकती है। ऐसे में अगर अमरिंदर सिंह उपराष्ट्रपति बनते हैं तो इससे ना सिर्फ कांग्रेस की साख को बट्टा लगेगा बल्कि पंजाब के भीतर एक बड़ा संदेश यह भी जाएगा कि जिस नेता को यथोचित सम्मान कांग्रेस ना दे सकी उसे भाजपा ने देश के दूसरे सर्वोच्च पद पर पहुंचा दिया।












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