जानिए, इस बार महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के लिए 2014 जैसा प्रदर्शन दोहराना मुश्किल क्यों है?

नई दिल्ली- 2014 में नरेंद्र मोदी और बीजेपी-शिवसेना (BJP-SS) के गठबंधन का जादू महाराष्ट्र के मतदाताओं के सिर चढ़कर बोला था। राज्य की 48 में से 42 सीटों पर इनको जीत मिली थी। कांग्रेस और एनसीपी (NCP) सिर्फ 6 सीटों में सिमट कर रह गई थी। लेकिन, 2019 की परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं। एनडीए (NDA) को इसबार किसानों की समस्या, बदले जातीय समीकरण एवं आरक्षण जैसे मुद्दों से दो-चार होना पड़ रहा है। कुल मिलाकर ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद असंतोष से निपटना उसके लिए सबसे कठिन चुनौती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बीजेपी-शिवसेना (BJP-SS) पिछले लोकसभा चुनाव जैसा प्रदर्शन इस बार भी दोहरा पाएगी?

विदर्भ में क्या होगा?

विदर्भ में क्या होगा?

विदर्भ के इलाके में इस बार रोजी-रोटी, राष्ट्रवाद और बालाकोट से जुड़े मुद्दे छाए रहने वाले हैं। एनसीपी-कांग्रेस (NCP-Congress) में गठबंधन की वजह से बीजेपी (BJP) को एंटी इंकम्बेंसी (Anti Incumbency) के असर को कम करना उतना आसान नहीं रहेगा। इस इलाके में 10 सीटें हैं। इकोनॉमिक टाइम के मुताबिक यहां किसानों की आत्महत्या (Farmers Distress), आदिवासियों की समस्या और दलितों की नाराजगी एनडीए (NDA) को परेशान कर सकता है। नितिन गडकरी, देवेंद्र फडणवीस, नाना पटोले, किशोर तिवारी जैसे नेताओं का इस इलाके में दबदबा माना जाता है। पिछले दफे यहां की सभी 10 सीटें एनडीए (NDA) के खातें में गई थीं। एनडीए को भरोसा है कि वह राष्ट्रवाद (Nationalism) और मोदी फैक्टर (Modi Factor) की बदलौत इस बार भी वहां अपना प्रभुत्व कायम रख पाएगी।

पश्चिम महाराष्ट्र की लड़ाई

पश्चिम महाराष्ट्र की लड़ाई

यह इलाका एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के दबदबे वाला इलाका माना जाता है। यहां गन्ना किसानों की समस्या एक बड़ा चुनावी मुद्दा माना जा रहा है। चर्चा ये भी है कि इलाके के किसान इस बार पवार पावर (Pawar Power) के साथ रहेंगे। यानी गन्ना का समर्थन मूल्य (Support Price) का मुद्दा चुनाव को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा स्वाभिमान शेतकारी संगठन (SSS) भी इस क्षेत्र के चुनाव में असर डालने की स्थिति में है। इसके नेता राजू शेट्टी की कांग्रेस-एनसीपी के साथ तालमेल की चर्चा चल रही है। अगर यह तालमेल हो गया तो शिवसेना-बीजेपी के लिए यहां की राह आसान नहीं रहेगी। पिछले चुनाव में एनडीए (NDA) में इसी क्षेत्र से एक स्वाभिमान शेतकारी पक्ष (SSP) शामिल हुई थी, जिसके चलते उसे यहां काफी फायदा मिला था। इस क्षेत्र में केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले का भी जनाधार है, जिनकी पार्टी आरपीआई (RPI) एनडीए का हिस्सा है। इस क्षेत्र की 11 में से 7 सीटें पिछली बार एनडीए ने जीती थी और एनसपी ने राज्य में जो कुल 4 सीटें जीती थीं, वह सारी इसी क्षेत्र से थी। किसानों के प्रभाव वाला इलाका होने के कारण पहले इसे एनसीपी का गढ़ माना जाता है। ऐसे में अबकी बार एनडीए पिछली बार जैसा प्रदर्शन कर पाएगा या नहीं, यह बड़ा सवाल है।

मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र की मुश्किल

मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र की मुश्किल

2014 में मराठवाड़ा की 8 सीटों में से 6 एनडीए और 2 कांग्रेस के खाते में गई थी। तब कांग्रेस का महाराष्ट्र में सिर्फ मराठवाड़ा में ही खाता खुल पाया था। इसबार यहां पानी की किल्लत, कपास के किसानों की समस्या और मराठा आरक्षण जैसे मुद्दे हावी रहने वाले हैं। इस क्षेत्र में दलित और मुस्लिम समुदाय की भी अच्छी-खासी आबादी है। इस इलाके में अभी भी जीएसटी (GST)और नोटबंदी (Demonetisation)जैसे मुद्दे बरकरार हैं, जो एनडीए को परेशान कर सकते हैं। लेकिन, यहां पर एआईएमआईएम (AIMIM)और प्रकाश अंबेडकर के भारिपा बहुजन महासंघ (BBF) के बीच तालमेल होने से एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन की मुसीबत भी बढ़ती दिख रही है।

मराठवाड़ा की तरह ही उत्तर महाराष्ट्र भी भयंकर सूखे का संकट झेल रहा है। 2014 में एनडीए ने यहां की सभी 7 सीटों पर कब्जा कर लिया था। लेकिन, किसानों की दिक्कत इसबार उसकी राह में रोड़े अटकाती दिख रही है।

कोंकण की कश्मकश

कोंकण की कश्मकश

कोंकण में लोकसभा की सिर्फ 2 सीटें हैं और 2014 में दोनों पर ही शिवसेना विजयी रही थी। इसबार रोजगार जैसे मुद्दों के चलते उसके लिए यहां का रास्ता आसान नहीं है। रत्नागिरि और रायगढ़ का इलाका अपनी खूबसूरती के अलावा चावल, काजू और आम की फसल के जाना जाता है। सिंधुदूर्ग लोकसभा सीट पर इसबार नारायण राणे के बेटे निलेश राणे अपने पिता की नई-नवेली पार्टी महाराष्ट्र स्वाभिमान पक्ष (MSP) से लड़ रहे हैं और उनका मुकाबला शिवसेना के विनायक राउत से हो रहा है। पिछली बार राणे कांग्रेस से लड़कर हार गए थे। इसी तरह रायगढ़ में शिवसेना की राह भी मुश्किल में है, क्योंकि पिछली बार वो मात्र 2,110 वोट से जीती थी, जबकि एनसीपी ने इसबार यहां पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी (PWP)के साथ समझौता किया लिया है। हालांकि, शिवसेना को लगता है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री ए आर अंतुले के बेटे नावीद को टिकट देकर उसने एनसीपी को घेर लिया है, क्योंकि अब उसे मुस्लिम वोट मिलने की भी उम्मीद है।

मुंबई-ठाणे का किंग कौन?

मुंबई-ठाणे का किंग कौन?

ये वो इलाका है, जिन पर पूरे देश की नजर रहती है। मुंबई-ठाणे और पालघर में लोकसभा की कुल 10 सीटें और सारी की सारी सीटें पिछली बार बीजेपी-शिवसेना जीत गई थी। ये सभी सीटें मुंबई महानगर और उसके उपनगरीय इलाकों में आती हैं। ठाणे में छोटे और मध्यम कारोबारी और भिवंडी में पावर लूम फैक्ट्री का मुद्दा इसबार बड़ा रोल निभा सकता है। कहा जा रहा है कि नोटबंदी ने यहां के कारोबार को काफी चौपट किया था। इसके साथ ही यहां रोजगार भी बहुत बड़ा मुद्दा है। एनसीपी-कांग्रेस के लिए अच्छी बात ये है कि राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना उन्हें समर्थन कर रही है। लेकिन, प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी उसकी उम्मीदों पर पानी भी फेर रही है। वहीं बीजेपी-शिवसेना को इन सीटों पर राष्ट्रवाद, बालाकोट और मोदी फैक्टर (Modi Factor) के भरोसा चुनावी नैया पार कर लेने का भरोसा है। एनडीए के लिए अच्छी स्थिति फिलहाल ये है कि शिवसेना ने अपना पाला फिलहाल पूरी तरह से बदला हुआ है और वो एकबार फिर से मोदी के नाम पर ही चुनावी वैतरणी पार करने के मूड में है। शायद इसलिए उद्धव ठाकरे ने ऐन चुनाव के वक्त में ये कहना शुरू कर दिया है कि बीजेपी और शिवसेना हिंदुत्व के बंधन से जुड़े हुए दल हैं।

वैसे पूरे राज्य का एक साथ विश्लेषण करें तो एनडीए के लिए राहत की बात ये है कि एनसीपी के कई दिग्गजों के बीजेपी में शामिल होने के चलते वह पूरी तरह से बैकफुट पर है। शरद पवार खुद दोबारा चुनावी राजनीति में उतरने की घोषणा करके अपनी बात से पीछे हट चुके हैं। पार्टी में दबदबे को लेकर उनके परिवार का झंझट भी किसी न किसी रूप में बाहर आना शुरू हो गयाहै। वहीं कांग्रेस अबतक प्रदेश में उस स्थिति में नहीं दिख रही है, जो अपने गंवाए हुए वोट बैंक को वापस अपने साथ जोड़ सके। एनडीए और कांग्रेस-एनसीपी दोनों गठबंधन के लिए सबसे बड़ा संकट प्रकाश अंबडेकर की वंचित बहुजन आघाड़ी पैदा कर रही है, जो मुख्य तौर पर दलित वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाने की हैसियत में हैं। इसके असर को कम करने के लिए दोनों ही ओर से राजनीतिक गोटियां बिठाई जा रही हैं। अब इसका परिणाम क्या होगा इसके लिए 23 मई को आने वाले चुनाव परिणामों का इंतजार करना पड़ेगा।

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