CAA: किन इलाकों में लागू नहीं हो सकता नया कानून, किस आधार पर होता है विरोध, कहां यह पहले से ही था लागू?
Citizenship Amendment Act Rules: लोकसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा से ठीक पहले नागरिकता संशोधन कानून, 2019 (CAA) पूरे देश में लागू कर दिया है। हालांकि, 9 राज्यों के चुनिंदा जिलों में यह एक तरह से पहले ही अमल में आ चुका था।
सीएए के नियम लागू होने के बाद तीन मुस्लिम राष्ट्रों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धर्म के आधार पर प्रताड़ित किए गए 6 गैर-मुस्लिम धर्मों के शरणार्थियों को तेजी से भारतीय नागरिकता दिए जाने का रास्ता साफ हो गया है।

9 राज्यों के 31 जिलों में पहले से लागू था प्रावधान
2022 से सरकार ने संशोधित नागरिकता कानून, 1955 के तहत देश के 31 जिलों के जिलाधिकारियों और संबंधित 9 राज्यों के गृह सचिवों को पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक आधार पर उत्पीड़न के शिकार हुए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने की अनुमिति दी हुई थी।
ये 9 राज्य हैं- राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और महाराष्ट्र। गृह मंत्रालय के 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए कम से कम 1,414 गैर-मुस्लिम प्रवासियों को संशोधित नागरिकता कानून, 1955 के तहत रजिस्ट्रेशन या नैचुरलाइजेशन के आधार पर भारतीय नागरिकता दी गई।
देश के जिन इलाकों में नहीं लागू हो सकता सीएए
संविधान की 6ठी अनुसूची में शामिल इलाकों पर नागरिकता संशोधन कानून, 2019 नहीं लागू हो सकता। ये असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के स्वायत्त आदिवासी बहुल क्षेत्र हैं।
मतलब, इन इलाकों में रहने वाले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए शरणार्थियों को धार्मिक आधार पर भारतीय नागरिकता नहीं दी जा सकती।
क्या है इनर-लाइन परमिट?
इसी तरह से जिन राज्यों में इनर-लाइन परमिट (ILP) की व्यवस्था है, वहां भी नया कानून नहीं लागू होता। ये मुख्य तौर पर पूर्वोत्तर भारत के इलाके हैं। इन सुरक्षित इलाकों के गैर-निवासियों भारतीय नागरिकों को यात्रा के लिए सीमित समय के लिए इनर-लाइन परमिट लेनी पड़ती है।
यह व्यवस्था मुख्य तौर पर पूर्वोत्तर भारत के सीमावर्ती राज्यों अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैंड, मणिपुर में लागू है। यह व्यवस्था असल में ब्रिटिश काल में उनके व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए शुरू की गई थी। लेकिन, आजादी के बाद भी यह जारी रही है।
सीएए का किस आधार पर होता है विरोध
सीएए का विरोध मुख्य तौर पर दो आधार पर किया जाता है। विरोधियों की ओर से पहला दावा तो ये किया जाता है कि यह मुस्लिम-विरोधी कानून है।
दूसरा, इसकी वजह से नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (NPR), 2020 को अपडेट करने पर प्रभाव पड़ने की आशंका और प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर पर नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (NRC) के प्रस्ताव को लेकर आशंकाओं से जुड़े हैं। एनपीआर में तो पहले ही काफी देरी हो चुकी है।
सीएए के विरोधियों का दावा है कि इसके माध्यम से मोदी सरकार अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। इसकी वजह ये है कि यह ऐसे समय में आया था, जब असम में जून 2018 में एनआरसी के तहत ड्राफ्ट लिस्ट में करीब 20 लाख लोगों को नागरिकता से अलग कर दिया गया।
क्योंकि, ऐसे लोग राज्य के मूल निवासी होने का कोई दस्तावेजी सबूत देने में नाकाम रहे। इन्हीं आशंकाओं की वजह से उस समय जो सीएए का विरोध शुरू हुआ, उसकी वजह से उस समय की कम से कम 6 गैर-बीजेपी शासित राज्यों ने विधानसभाओं से सीएए लागू करने के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर दिया।
ये राज्य हैं- पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश।
असम में सीएए के विरोध की अलग है वजह
असम में सीएए के विरोध की मुख्य वजह इससे 1985 के असम समझौते पर पड़ने वाला संभावित प्रभाव और एनआरसी की प्रक्रिया है। सीएए-विरोधियों की दलील है कि यह असम समझौते की भावना का उल्लंघन है। इस समझौते के तहत 24 मार्च,1971 के बाद बांग्लादेश से आए गैर-कानूनी प्रवासियों का पता लगाने और उनके निर्वासन का प्रावधान है।
सीएए क्यों जरूरी था?
सरकार का कहना है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में जिन अल्पसंख्यकों को धार्मिक आधार पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, उनकी सुरक्षा जरूरी है। इसके पक्ष में तीन जिम्मेदारियां बताई जाती हैं- ऐतिहासिक दायित्व, मानवीय आधार और धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा।
सीएए के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि इन तीनों देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा भारत की ऐतिहासिक और नैतिक जिम्मेदारी है, उससे देश मुंह नहीं मोड़ सकता। अगर उन्हें भारत शरण नहीं देगा तो वे कहां जाएंगे?
ऐसे शरणार्थी अपने ही देश में धर्म के आधार पर जिन मुश्किलों का सामना करने को मजबूर हैं, उनके लिए मानवीय आधार पर विशेष सहायता देना आवश्यक है।
अगर अपने देशों के ऐसे गैर-मुस्लिम धार्मिक शरणार्थी ज्यादा समय तक भारत में रह गए हैं और उन्हें अपने मुल्क में वापस लौटने में खतरा है तो उनकी सुरक्षा और हिफाजत हमारी जिम्मेदारी है।












Click it and Unblock the Notifications