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Budget 2025: आम आदमी की 5 चिंताएं जिसपर वित्त मंत्री को ध्यान देने की जरूरत, बजट से क्या हैं जनता की उम्मीदें?

Budget 2025: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अपना आठवां बजट पेश करने जा रही हैं, तब आम जनता बड़ी उम्मीदों के साथ सरकार की ओर देख रही है। बढ़ती महंगाई, खासकर सब्जियों, खाने के तेल, दूध और अन्य रोजमर्रा की चीजों की कीमतों ने लोगों के घर का बजट बिगाड़ दिया है।

खाने-पीने की चीजों के बढ़ते दामों ने सीमित आय वाले परिवारों पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है। महंगाई के साथ-साथ वेतन और मजदूरी में धीमी बढ़ोतरी ने भी आम लोगों के जीवन को और मुश्किल बना दिया है। जबकि कंपनियां महामारी के बाद मांग में वृद्धि और टैक्स में राहत का फायदा उठा रही हैं, लेकिन इसका लाभ मजदूरों और मध्यम वर्ग तक नहीं पहुंच रहा।

Budget 2025

ऐसे में आम जनता को उम्मीद है कि इस बजट में सरकार कुछ ऐसी घोषणाएं करेगी, जो उनकी समस्याओं को हल कर सके और बढ़ती महंगाई से राहत दिला सके। आइए जानते हैं वो पांच बड़ी समस्याएं, जिनका समाधान आम जनता इस बजट से चाहती है।
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महंगाई पर काबू

पिछले कुछ महीनों में रसोई के खर्चे बढ़ गए हैं। सब्जियों की कीमतें मौसम की मार के कारण बढ़ीं, तो वहीं खाने के तेल पर टैक्स बढ़ने और दूध उत्पादन की लागत बढ़ने से दामों में उछाल आया। अमूल जैसे सहकारी संगठनों द्वारा दूध की कीमत में 1 रुपये की कमी ने थोड़ी राहत दी है। इसके अलावा, पाम ऑयल के बढ़ते दामों के कारण पैकेज्ड फूड और जरूरी चीजों के दाम भी बढ़े। खाद्य तेल पर आयात शुल्क घटाने से कीमतें कम हो सकती हैं और FMCG कंपनियों की लागत भी घटेगी।

वेतन में थोड़ी बढ़ोतरी

मजदूरों और मिड-लेवल कर्मचारियों की तनख्वाह में धीमी वृद्धि, खपत में कमी का बड़ा कारण बनी। एक रिपोर्ट के मुताबिक, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की तनख्वाह बीते 12 महीनों में केवल 3.4% बढ़ी, जबकि संगठित क्षेत्र में यह 6.5% रही। कुछ उद्योगों में तो 2019 से 2023 के बीच वेतन वृद्धि की औसत दर 1% से भी कम रही। जबकि कोविड के बाद कंपनियों ने टैक्स में छूट और बढ़ती मांग का फायदा उठाकर मुनाफा कमाया।

आर्थिक मंदी

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के अनुमान के मुताबिक, 2024-25 में भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 6.4% रहेगी, जो महामारी के बाद की सबसे धीमी दर है। इसकी बड़ी वजह सरकारी पूंजीगत खर्च (इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च) में कमी है। यह खर्च सीमेंट, स्टील और मशीनरी जैसे उद्योगों में मांग बढ़ाता है, जिससे नौकरियां और निवेश दोनों बढ़ते हैं। सरकार को इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ाने की जरूरत है, ताकि अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ सके।

नौकरियों की कमी

कोविड के दौरान लाखों लोग शहरों से गांवों में लौट गए। यह रिवर्स माइग्रेशन अब तक पूरी तरह उल्टा नहीं हुआ है। हालांकि, सरकारी आंकड़े संगठित क्षेत्र में रोजगार वृद्धि दिखाते हैं, लेकिन अभी भी देश को नई नौकरियों की सख्त जरूरत है। इसके लिए सरकार को मध्यम, सूक्ष्म और लघु उद्योगों (MSME) को समर्थन देना होगा और श्रम-प्रधान क्षेत्रों में निजी निवेश को बढ़ावा देना होगा।

टैक्स का बोझ

निम्न और मध्यम आय वर्ग पर टैक्स का दबाव हमेशा चिंता का कारण रहा है। GST जैसे अप्रत्यक्ष करों में तो सरकार ज्यादा बदलाव नहीं कर सकती, क्योंकि इसे GST परिषद तय करती है। हालांकि, खाद्य तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स में कमी लाकर राहत दी जा सकती है। इसके अलावा, निम्न और मध्यम आय वर्ग के लिए आयकर की दरें घटाना लंबे समय से मांग में शामिल है। अब देखना यह होगा कि क्या इस बजट में सरकार इस दिशा में कोई बड़ा कदम उठाती है।
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