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शहीदों को सलाम: नाम 'आजाद', पिता 'स्वतंत्रता', पता 'जेल'...15 साल के क्रांतिकारी को देख कांप उठा ब्रिटिश शासन

Saheedo Ko Salam: 'अगर मां भारती की बेड़ियां देखकर आपका खून नहीं खौलता, तो वो पानी है। जो देश के काम ना आ सके, वो किस काम की जवानी है।' यहां नारा ब्रिटिश शासन के होश फाख्ता करने वाले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 'चंद्रशेखर आजाद' का है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रमुख और निडर क्रांतिकारियों में से एक थे। भारत की आजादी के लिए चंद्रशेखर ने अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी।

आजाद कहते थे 'दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, हम आजाद हैं और आजाद ही रहेंगे।' उन्होंने अपनी अद्वितीय देशभक्ति से ब्रिटिश शासन को मुंह तोड जवाब दिया। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के सदस्य के रूप में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ कई सफल अभियानों का नेतृत्व किया। उनकी साहसिकता और निडरता ने उन्हें एक आदर्श क्रांतिकारी बना दिया। वनइंडिया आपको अपनी 'शहीदों को सलाम' सीरीज के जरिए 'चंद्रशेखर आजाद' के योगदान से रूबरू करा रहा है...

Chandrashekhar Azad

चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भाबरा गांव (अब अलीराजपुर जिला) में हुआ था। उनका वास्तविक नाम चंद्रशेखर सीताराम तिवारी था। उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी और माता जगरानी देवी थीं। प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में रुचि लेनी शुरू कर दी थी। जलियांवाला बाग कांड के समय चंद्रशेखर बनारस (अब वाराणसी) में पढ़ाई कर रहे थे।

15 साल की उम्र में असहयोग आंदोलन से जुड़े, मिली 15 कोड़ों की सजा
चंद्रशेखर आजाद को 'बहरूपिया' भी कहा जाता था, क्योंकि वे अपना रूप बदलने में माहिर थे। चंद्रशेखर सिर्फ 15 साल की उम्र में 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गए थे और पढ़ाई छोड़कर सड़क पर उतर आए। तभी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जज के सामने पेश किया गया। जज ने नाम पूछा तो 'आजाद' बताया। पिता का नाम 'स्वतंत्रता' और घर का पता 'जेल' लिखवाया। चंद्रशेखर के जवाब सुनने के बाद ब्रिटिश शासन के पसीने छुड़ा दिए। जज ने गुस्साते हुए उन्हें, 15 कोड़ों की सजा सुनाई।

कैसे पड़ा चंद्रशेखर तिवारी का 'आजाद' नाम?
जज को अपना नाम 'आजाद' बताने की घटना ने उन्हें 'आजाद' का उपनाम मिला। आजादी पाने के लिए हद तक जाना और बेखौफ अंदाज दिखाना, इन दोनों ही बातों से चंद्रशेखर आजाद आज अमर हैं। आजाद कहते थे 'दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, हम आजाद हैं और आजाद ही रहेंगे।'

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA)
चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे महान क्रांतिकारियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) की स्थापना की। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन को समाप्त करना और भारत को एक समाजवादी गणराज्य बनाना था।

भारत की आजादी में रोल
चंद्रशेखर आजाद की गतिविधियों ने भारतीय युवाओं में स्वतंत्रता के प्रति जोश और क्रांति की भावना जगाई। उनके बलिदान ने स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा दी और भारतीय जनता को अंग्रेजों के खिलाफ संगठित होकर संघर्ष करने की प्रेरणा दी। भगत सिंह के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ अनेक साहसिक अभियानों में भाग लिया। चंद्रशेखर आजाद ने ब्रिटिश अधिकारियों को कई बार चुनौती दी।

काकोरी कांड में उनका महत्वपूर्ण योगदान था, जिसमें सरकारी खजाना लूटने का साहसिक कार्य किया गया था। इसके अलावा, उन्होंने सांडर्स हत्या कांड में भी भाग लिया, जो लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए अंजाम दिया गया था। चंद्रशेखर आजाद का नारा था 'हम आजाद हैं और आजाद ही रहेंगे'। इस नारे ने उनकी निडरता और स्वतंत्रता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित किया।

Chandrashekhar

आजाद की देशभक्ति का गुणगान करती हैं ये घटनाएं
काकोरी कांड (1925):
चंद्रशेखर आजाद ने अपने साथियों के साथ मिलकर काकोरी ट्रेन डकैती का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश सरकार का खजाना लूट लिया। इस घटना ने ब्रिटिश शासन को हिला कर रख दिया और भारतीय क्रांतिकारियों की शक्ति और संगठन क्षमता का प्रदर्शन किया।

सांडर्स हत्या कांड (1928):
लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए, आजाद, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जे.पी. सांडर्स की हत्या की। यह कांड ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय क्रांतिकारियों के आक्रोश का प्रतीक बना।

अल्फ्रेड पार्क (1931):
27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आजाद ने ब्रिटिश पुलिस के साथ मुठभेड़ में अपनी अंतिम सांस ली। जब उनके पास गोलियां खत्म हो गईं, तो उन्होंने अपनी आखिरी गोली खुद को मार ली, ताकि वे कभी भी ब्रिटिश पुलिस के हाथ न आएं। उनका अंतिम बलिदान उनके नाम के अनुरूप था - 'आजाद'।

अंग्रेजों के किए दांत खट्टे, फिर यूं हुए शहीद
27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (अब आजाद पार्क) में चंद्रशेखर आजाद को पुलिस ने घेर लिया। उन्होंने वीरता से मुकाबला किया, लेकिन अंत में जब उनके पास एक गोली बची, तो उन्होंने खुद को गोली मार ली और अंग्रेजों के हाथों पकड़े जाने के बजाय शहीद हो गए।

परिवार की जानकारी
चंद्रशेखर आजाद के परिवार के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। उनके परिवार के सदस्य सामान्य जीवन जीते थे और उनके बलिदान के बाद परिवार ने उन्हें एक वीर योद्धा के रूप में स्मरण किया।


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