राज्यसभा में 'आंध्र प्रदेश मॉडल' से बहुमत तक पहुंचना चाहती है बीजेपी? समझिए कैसे?

नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब 2014 में केंद्रीय राजनीति में दखल देने की कोशिश कर रहे थे, तब उनपर देश में 'गुजरात मॉडल' थोपने की कोशिश के आरोप लगते थे। मोदी को कामयाबी मिली और उन्होंने तीन दशक बाद पूर्ण बहुमत वाली पहली सरकार (पूर्ण बहुमत वाली पहली गैर-कांग्रेसी सरकार भी ) बनाई। पांच वर्ष बाद उन्होंने लोकसभा में दोबारा पहले से भी ज्यादा बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है, तो उनपर आरोप लग रहे हैं कि वह राज्यसभा में जादुई आंकड़ा छूने के लिए 'आंध्र प्रदेश मॉडल' का सहारा ले रहे हैं। दरअसल, गुरुवार को ही चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी के 6 में से 4 राज्यसभा सांसदों ने बीजेपी में शामिल होने की घोषणा की है। आरोप है कि राज्यसभा में बहुमत हासिल करने कि लिए बीजेपी का ये नया हथकंडा है। इसलिए, इसे 'आंध्र प्रदेश मॉडल' कहा जा रहा है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि सिर्फ 4 सांसदों के बीजेपी के पक्ष में पाला बदलने से पार्टी कैसे उच्च सदन में बहुमत के करीब पहुंच गई है और मोदी सरकार के लिए यह क्यों जरूरी है?

मोदी सरकार को राज्यसभा में बहुमत क्यों चाहिए?

मोदी सरकार को राज्यसभा में बहुमत क्यों चाहिए?

पिछले कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी कई योजनाओं को इसलिए धरातल पर उतार पाने में असफल रहे, क्योंकि राज्यसभा में उनके पास बहुमत नहीं था। कई विधेयक लोकसभा से तो आसानी से पास हो जाता था, लेकिन राज्यसभा में विपक्ष के पास बहुमत होने से वह औंधे मुंह गिर जाता था। अगर ट्रिपल तलाक बिल को राज्यसभा से भी पारित कर दिया गया होता, तो सरकार को इस कुप्रथा पर लगाम लगाने के लिए बार-बार ऑर्डिनेंस का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता। इसी तरह मोटर व्हीकल एक्ट, नागरिकता संशोधन विधेयक और भूमि अधिग्रहण विधेयक राज्यसभा में ही लटका दिया गया था। 2016 में तो सरकार को राष्ट्रपति के अभिभाषण तक में संशोधन के लिए विपक्षी दबाव में झुकने को मजबूर होना पड़ गया था। ऐसे में अगर राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत होगा, तो वह उन फैसलों पर अमल कर पाएगी, जो वह जनता से वादे करके सत्ता में आई है।

राज्यसभा में बहुमत का बीजेपी का गुणा-गणित

राज्यसभा में बहुमत का बीजेपी का गुणा-गणित

मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक राज्यसभा में अधिकतम 250 सांसद हो सकते हैं। फिलहाल इनकी कुल संख्या 245 है, जिसमें 12 सदस्यों को सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति मनोनीत करते हैं। बाकी राज्यों के विधायकों के माध्यम से चुनकर आते हैं। कुल 245 सदस्यों के हिसाब से अभी ऊपरी सदन में बहुमत का जादुई आंकड़ा 123 होता है। जिसमें बीजेपी के पास सबसे ज्यादा यानी 71 सांसद तो हैं, लेकिन वह बहुमत के आंकड़े से बहुत दूर है। इसमें टीडीपी छोड़कर बीजेपी में शामिल होने वाले 4 सांसदों को भी जोड़ दें तो भी यह आंकड़ा 75 तक ही पहुंचता है। इनके अलावा 4 मनोनीत सांसदों का भी उसे समर्थन मिल सकता है, जो मोदी सरकार के दौरान ही मनोनीत किए गए हैं। इस तरह से बीजेपी और उसके समर्थक सांसदों की कुल संख्या 79 तक पहुंचती है। इसके बाद बीजेपी की सहयोगी यानी एनडीए के घटक दलों के सांसदों की बारी आती है। इनमें अभी जेडीयू के 6, अकाली दल के 3, शिवसेना के भी 3, आरपीआई, असम गण परिषद, बीपीएफ और एसडीएफ के पास 1-1 सांसद हैं। इन सबको जोड़ने के बाद एनडीए और समर्थित सांसदों का आंकड़ा 95 तक पहुंचता है। इनके बाद एआईएडीएमके के 13 सांसदों की बारी आती है। जो पिछली लोकसभा में सरकार को समर्थन देते रहे हैं। अलबत्ता 2019 के लोकसभा चुनाव में तो तमिलनाडु में इस पार्टी का बीजेपी के साथ तालमेल भी हो चुका है। यानी एआईएडीएमके सांसदों की बदौलत एनडीए और समर्थित सांसदों का आंकड़ा 108 तक पहुंच जाता है। सरकार को 3 निर्दलीय सांसदों का भी समर्थन मिल सकता है, यानी इस तरह से यह आंकड़ा 111 तक पहुंच सकता है। अब उन दलों की बारी है, जो मुद्दों के आधार पर या मोलभाव के बदले मोदी सरकार के पाले में जाते रहे हैं या जा सकते हैं। इनमें टीआरएस के 6, वाईएसआर कांग्रेस के 2 और बीजू जनता दल के 5 सांसद हैं। इस तरह से सरकार आज की तारीख में भी 124 सांसदों के समर्थन का भरोसा पाल सकती है, जो कि जादुई आंकड़े से 1 ज्यादा है।

उपचुनाव ने और बढ़ाई उम्मीद

उपचुनाव ने और बढ़ाई उम्मीद

सबसे बड़ी बात है कि आने वाले 5 जुलाई को ही राज्यसभा की 6 सीटों के लिए उपचुनाव भी होने हैं। जाहिर है कि इसमें बीजेपी और एनडीए का आंकड़ा और बढ़ने की संभावना है। दिलचस्प बात ये है कि 6 में से तीन सीटें बीजेपी के राज्यसभा सांसदों के ही लोकसभा के लिए चुने जाने की वजह से खाली हुई हैं। इनमें गुजरात में अमित शाह और स्मृति ईरानी और बिहार में केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की सीट शामिल है। बाकी 3 सीटें भी ओडिशा की हैं, जिनमें से एक बीजेडी के अच्युतानंद सामंत के लोकसभा के लिए चुने जाने से खाली हुई है और केशरी देब के विधानसभा में चुने जाने के कारण खाली हुई है। तीसरी सीट सौम्य रंजन पटनायक की है, जिन्होंने अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। मतलब कि यह सभी 6 सीटें भी मोदी सरकार की हक वाली सीटें ही दिखाई पड़ती हैं।

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