भाजपा की मजबूरी हैं-नीतीश कुमार जरूरी हैं, जानिए अमित शाह के बयान के पीछे की सियासत

नई दिल्ली- बिहार में इसी साल अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। अभी वहां नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए की सरकार है। हाल के कुछ समय से बिहार को लेकर ऐसी अटकबाजियां चल रही थीं कि हो सकता है कि इस बार जेडीयू और बीजेपी साथ मिलकर चुनाव न लड़ें। कभी विपक्षी आरजेडी की ओर से कोई शिगूफा छोड़ा जाता था तो कभी गठबंधन के नेता ही आपस में ऐसे बयान देते थे जिससे लगता था कि इस बार बात नहीं बन पाएगी। कभी नीतीश के करीबी माने जाने वाले प्रशांत किशोर अपने सियासी दायरे से आगे उछलकर की कोशिश करते थे तो कभी केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह जैसे नेता सार्वजनिक तौर पर कड़वाहट जाहिर कर देते थे। लेकिन, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने गुरुवार को एक झटके में सारी अटकलबाजियों पर बयान लगा दिया। उन्होंने साफ कर दिया कि अगल चुनाव उनकी पार्टी भी नीतीश कुमार की अगुवाई में ही लड़ेगी। आइए जानते हैं कि नीतीश कुमार को चुनाव से महीनों पहले सारी कयासबाजियों को खत्म करना पड़ा है।

अमित शाह ने बिहार में गठबंधन को लेकर कहा क्या है?

अमित शाह ने बिहार में गठबंधन को लेकर कहा क्या है?

भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने गुरुवार को बिहार के वैशाली की एक सभा में बिहार में गठबंधन को लेकर जारी सभी अटकलों पर विराम लगा दिया है। शाह ने कहा है, "कुछ लोग अफवाह फैलाना चाहते हैं कि बिहार के अंदर अगला चुनाव कैसे होगा। मैं आज सारी अफवाहों का खंडन करने आया हूं। बिहार के अंदर अगला चुनाव नीतीश जी के नेतृत्व में एनडीए लड़ेगा। बीजेपी-जेडीयू एक साथ रहेंगें।" इल दौरान शाह ने नीतीश शासन को लेकर भी तारीफों के खूब पुल बांधने की कोशिश की। उन्होंने कहा, "लालू जी जो सपना जेल में देख रहे हैं उनको बता दें आप सेंधमारी नहीं कर पाओगे। ये गठबंधन अटूट है। आप लालटेन युग छोड़कर गए थे। हम एलईडी युग लाए हैं। जंगलराज से जनताराज की यात्रा अनवरत चलेगी। आपने 'लूट एंड ऑर्डर' का राज लाया हम 'लॉ एंड ऑर्डर' का राज लेकर आए।'' शाह ने मुख्यमंत्री की तारीफ करते हुए कहा कि नीतीश कुमार ने जंगलराज से बिहार को मुक्त किया। उन्होंने कहा कि अब बिहार में कोई हमारे गठबंधन में सेंधमारी नहीं कर पाएगा।

कई राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे

कई राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे

पिछले साल अक्टूबर से दिसंबर के बीच तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए और उन तीनों ही जगह चुनाव से पहले बीजेपी की अगुवाई वाली सरकारें थीं। इसमें हरियाणा में तो उसने पहले के मुकाबले सीटें घटने के बावजूद भी नया साथी तलाश कर फिर से सरकार बनाने में कामयाब रही, लेकिन महाराष्ट्र और झारखंड की सत्ता उसके हाथों से निकल गई। बीजेपी का सबसे बुरा हाल झारखंड में हुआ, जहां झामुमो, कांग्रेस और राजद गठबंधन ने पार्टी को ऐसे घेरा कि वह कुर्सी से खिसकर दूसरे नंबर की पार्टी बन गई। यहां पार्टी को इसलिए खामियाजा उठाना पड़ा कि पांच साल तक सरकार में साथ रहे आजसू के साथ उसका सीटों पर तालमेल नहीं हो पाया। नतीजों के बाद पार्टी को अपनी गलती का अहसास हो रहा होगा कि अगर किसी तरह आजसू के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ती तो नतीजे को बदला जा सकता था।

लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वोटरों के नजरिए में अंतर

लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वोटरों के नजरिए में अंतर

अगर हम गौर करें तो करीब दो साल से भारतीय राजनीति में एक ट्रेंड देखने को मिल रहा है कि मतदाताओं की प्राथमिकता लोकसभा और विधानसभा में मतदान करते वक्त पूरी तरह से बदल जाती है। मसलन, लोकसभा चुनाव में तो राष्ट्रीय नेतृत्व (मोदी फैक्टर) और राष्ट्रीय मुद्दे, राष्ट्रवाद का बहुत ज्यादा प्रभाव दिखता है, लेकिन विधानसभा चुनावों में संबंधित प्रदेशों के स्थानीय मुद्दों पर लोग ज्यादा ध्यान देते हैं। दिसंबर, 2017 में गुजरात चुनाव में भी बीजेपी को मुश्किलों का सामना करना पड़ा था और एक साल बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी उसकी सरकारें चली गईं। उन सब चुनाव में मोदी फैक्टर का असर रहा, लेकिन आखिरकार स्थानीय और जनता से जुड़े मुद्दे ही ज्यादा प्रभावी साबित हुए। 2019 के लोकसभा चुनाव में फिर से मतदाताओं का फैसला बदल गया। लेकिन, बाद के विधानसभा चुनावों में महाराष्ट्र, हरियाणा से लेकर झारखंड तक फिर फिजा बदलती हुई दिखाई पड़ी। झारखंड में तो 5 साल तक सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा ने महज 6 महीने में ही 17% वोट गंवा दिए। ऐसे में बीजेपी बिहार में अब कोई जोखिम लेने को तैयार नहीं है और अमित शाह का बयान उसी से जोड़कर देखा जा सकता है।

भाजपा की मजबूरी हैं-नीतीश कुमार जरूरी हैं

भाजपा की मजबूरी हैं-नीतीश कुमार जरूरी हैं

बीजेपी में गिरिराज सिंह जैसे नेता कई मौकों पर नीतीश कुमार और उनकी सरकार से नाराजगी जता चुके हैं। उनको लेकर वे अपने पार्टी के प्रदेश नेतृत्व पर भी सवाल उठाते रहे हैं। उधर जेडीयू में प्रशांत किशोर जैसे नेता हैं, जिन्होंने सीएए के मसले पर पार्टी लाइन से अलग जाकर गठबंधन का संतुलन बिगाड़ने की कोशिश की है। नागरिकता संशोधन कानून का नीतीश कुमार की पार्टी ने जरूर समर्थन किया है, लेकिन बिहार में एनआरसी लागू नहीं होने देने की जेडीयू के नेता घूम-घूम कर मुनादी कर रहे हैं। यहां तक की दोनों पार्टियों ने गठबंधन में चुनाव लड़कर लोकसभा चुनावों में महागठबंधन की बुरी तरह हवा खराब कर दी थी, बावजूद मोदी सरकार में कम मंत्री बनाए जाने से नाखुश होकर जेडीयू ने एंट्री नहीं ली। इसके बाद बीजेपी पर आरोप लगे कि वह गठबंधन के साथियों को फलने-फूलने का मौका नहीं देना चाहती। सबसे ज्यादा सवाल शिवसेना ने उठाए और आखिरकार महाराष्ट्र चुनाव में एनडीए की जीत के बाद भी वह अलग ही हो गई। ऐसे में झारखंड के चुनाव परिणाम ने भाजपा के लिए कोई मौका नहीं छोड़ा। बीजेपी ने बिहार में नीतीश की जूनियर रहकर ही चुनाव लड़ने में भलाई समझी है। अब देखना दिलचस्प होगा कि लोकसभा चुनावों की तरह सीटों का फॉर्मूला 50-50 का निकलता है या उसे वापस 2010 के फॉर्मूले कि ओर खिसकना पड़ता है।

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