BJP MP Nishikant Dubey की टिप्पणी पर विवाद गहराया, अवमानना याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अगले हफ्ते सुनवाई
Nishikant Dubey Controversy: भारत के सर्वोच्च न्यायालय और देश के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना के खिलाफ भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की कथित विवादास्पद टिप्पणियों पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसको लेकर कोर्ट की अवमानना का आरोप लग रहा है और अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक पहुँच चुका है।
अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा द्वारा दायर एक पत्र याचिका में बीजेपी सांसद दुबे के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही की मांग की गई है। मंगलवार, 22 अप्रैल को इस याचिका का जिक्र जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस ए. जी. मसीह की पीठ के समक्ष किया गया, जिन्होंने इस पर अगले सप्ताह सुनवाई करने की सहमति जताई।

Nishikant Dubey Controversy: क्या है पूरा मामला?
दरअसल, भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच पर भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को लेकर टिप्पणी की थी कि "देश में हो रहे गृहयुद्धों के लिए सीजेआई जिम्मेदार हैं"। यह बयान तब सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 समेत कई याचिकाओं को सुनवाई के लिए स्वीकार किया। दुबे ने सर्वोच्च न्यायालय पर यह आरोप भी लगाया कि वह "धार्मिक युद्ध भड़का रहा है" और "देश को अराजकता की ओर ले जा रहा है।"
इस बयान के वायरल होते ही सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट के प्रति आपत्तिजनक और अपमानजनक भाषा का प्रयोग पर विरोध शुरू हो गया। अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा ने दावा किया कि यह न केवल सुप्रीम कोर्ट की गरिमा पर सीधा हमला है, बल्कि देश की न्यायिक व्यवस्था को कमजोर करने की सोची-समझी रणनीति भी है।
Nishikant Dubey Controversy: क्या है कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट? क्या कहता है कानून?
कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट या न्यायालय की अवमानना एक ऐसा कानूनी प्रावधान है, जिसका मकसद न्यायपालिका की गरिमा, सम्मान और अधिकारों की रक्षा करना होता है, ताकि अदालतें बिना किसी डर या दबाव के न्याय कर सकें।
न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत किसी भी निजी व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट में अवमानना की याचिका दायर करने के लिए पहले भारत के अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की अनुमति प्राप्त करनी होती है। अधिवक्ता मिश्रा का कहना है कि उन्होंने संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजे थे, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
उनकी याचिका में कहा गया है कि सांसद की टिप्पणी "झूठी, लापरवाह और दुर्भावनापूर्ण" है, जो सीधे तौर पर आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आती है। मिश्रा ने अदालत से यह भी आग्रह किया है कि सोशल मीडिया पर फैले ऐसे अपमानजनक वीडियो और पोस्ट को हटाने का निर्देश दिया जाए जो न्यायपालिका की छवि को धूमिल करते हैं।
अधिवक्ता अनस तनवीर, शिव कुमार त्रिपाठी और सुभाष थेक्कदान जैसे कई कानूनी विशेषज्ञों ने भी दुबे के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही की मांग की है। अधिवक्ता थेक्कदान ने यहाँ तक कहा कि इस तरह की टिप्पणी "सुप्रीम कोर्ट के अधिकार और गरिमा पर सीधा हमला" है।
Nishikant Dubey Controversy पर संवैधानिक टकराव या राजनीतिक दबाव?
भाजपा सांसद की टिप्पणी केवल एक व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है। यह भारत के संवैधानिक ढांचे और सत्ता के तीन स्तंभों कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन पर भी सवाल खड़ा करता है। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के हालिया बयान, जिसमें उन्होंने न्यायपालिका पर "सुपर संसद" बनने का आरोप लगाया था, इसी बहस को और गहरा करते हैं।
धनखड़ ने न्यायपालिका पर यह भी आरोप लगाया कि वह राज्यपालों और राष्ट्रपति की भूमिका में हस्तक्षेप कर रही है, जब उसने विधेयकों पर निर्णय के लिए समयसीमा तय करने का निर्देश दिया। उनके अनुसार, यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध है।












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