कर्नाटक में हार से इतनी कंफ्यूज्ड हो चुकी है बीजेपी, प्रदेश अध्यक्ष और नेता विपक्ष पद पर नहीं कर पा रही फैसला

कर्नाटक में बीजेपी इतनी बुरी तरह हारी है कि वह आगे कोई भी फैसला लेने से पहले बार-बार सोच रही है। इसका परिणाम ये हुआ है कि अबतक न तो विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता पद पर ही फैसला कर पाई है और न ही नए नेता को प्रदेश अध्यक्ष को ही जिम्मा सौंप सकी। है। इन दोनों पदों के लिए पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व तक में मंथन चल रहा है।

पार्टी की दिक्कत ये है कि विधानसभा चुनावों में करारी हार देखने के बाद वह 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए कोई जोखिम नहीं लेना चाहती है। पार्टी को मालूम पड़ गया है कि आखिरकार सही जातीय समीकरण ही चुनावों में जीत की गारंटी बनती है।

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प्रदेश अध्यक्ष और नेता विपक्ष पद पर फैसला नहीं कर पा रही है भाजपा
सूत्रों के मुताबिक दोनों अहम पदों के लिए नाम तय करने से पहले बीजेपी नेतृत्व सही जातीय समीकरण तय करने पर काम कर रहा है। प्राथमिक तौर पर लिंगायत-वोक्कालिगा समीकरण को ही प्राथमिकता दी जा रही है, क्योंकि यह दोनों मिलकर एक बहुत बड़ी आबादी को कवर कर लेते हैं। इन दोनों पदों पर नियुक्तियों को लेकर पार्टी के अंदर कुछ नाम पर चर्चाएं चल रही हैं, लेकिन पार्टी कोई भी फैसला लेने से पहले हजार बार सोचने को मजबूर हो गई है।

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बसवराज बोम्मई
मसलन, पूर्व सीएम बसवराज बोम्मई विपक्ष के नेता के स्वाभाविक दावेदार हो सकते हैं। सीएम सिद्दारमैया को काउंटर करने में भी सक्षम हैं। लेकिन, 19 महीने मुख्यमंत्री रहने के बाद भी वह पार्टी को जीत दिलाने में नाकाम रहे हैं। इससे उनकी मास अपील और नेतृत्व क्षमता सवालों के घेरे में है। इसके अलावा वह पार्टी के दिग्गज बीएस येदियुरप्पा की परछाई से पूरी तरह उबर नहीं सके हैं।

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शोभा करंदलाजे
इसी तरह से प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर शोभा करंदलाजे के नाम की भी चर्चा चल रही है। वह मोदी सरकार में कृषि राज्यमंत्री हैं। एक समय वह भी येदियुरप्पा की बड़ी समर्थक थीं। प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर वह बेहतर हो सकती हैं, क्योंकि संगठन में वह पार्टी कार्यकर्ताओं को एकजुट कर सकती हैं। लेकिन, वह वोक्कालिगा समाज से होने के बावजूद अपने समाज में उतनी प्रभावशाली नहीं लगतीं। उन्हें भी पार्टी ने हालिया चुनाव में चुनाव प्रबंध समिति का अध्यक्ष बनाया था, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई।

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बसनगौड़ा पाटिल यत्नाल
कर्नाटक में येदियुरप्पा के बाद बसनगौड़ा पाटिल यत्नाल को ही सबसे ज्यादा मास अपील वाला नेता माना जाता है। वे प्रभावशाली पंचमसाली लिंगायत समुदाय से भी जुड़े हैं। लेकिन, इनके साथ दिक्कत ये है कि कई बार अपने बड़बोले बयानों से पार्टी और नेताओं को सकते में डालते रहे हैं। चेतावनी देने के बावजूद कई बार यह अपनी आदत से मजबूर नजर आए हैं। अगर विपक्ष का नेता बनाया जाता है तो उस दौरान उस पद के मुताबिक बहस की क्षमता को लेकर भी इनपर सवालिया निशान लगाया जाता है।

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सीएन अश्वथ नारायण
एक और नाम है सीएन अश्वथ नारायण का। वह वोक्कालिगा समाज से हैं और सज्जन राजनेता माने जाते हैं। एक बार रामनगर में डीके शिवकुमार और उनके भाई डीके सुरेश को भी अपने सामर्थ्य से परिचय करवा चुके हैं। येदियुरप्पा सरकार में उन्हें डिप्टी सीएम भी बनाया गया था। लेकिन, दक्षिण कर्नाटक में ऐसा रिजल्ट नहीं रहा, जिससे लगे कि वह पार्टी के लिए कुछ खास प्रभाव डाल पाए हैं।

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सीटी रवि
बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव सीटी रवि संघ परिवार से लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच काफी लोकप्रिय रहे हैं। संगठनात्मक क्षमता में भी वह काफी दमदार माने जाते हैं। हार्डकोर हिंदुत्व की लाइन उनकी लोकप्रियता का कारण है। लेकिन, विधानसभा चुनाव में उनकी हार से उनका खुद का मनोबल टूटा है। वह विवादों से भी जुड़े रहे हैं।

वी सोमन्ना
एक और नाम है, जिसकी चर्चा हो रही है। यह हैं वी सोमन्ना। लिंगायत समाज से आने वाले सोमन्ना का वोक्कालिगा समाज में भी अच्छी प्रतिष्ठा है। बीजेपी के लिए ये इस मायने में फायदेमंद साबित हो सकते हैं कि उनका नाम आगे करने से पार्टी दोनों समाज की दूरी को कम कर सकती है। लिंगायत मठों में भी इनकी अपनी खास पहुंच है। लेकिन, 72 साल की उम्र और दो-दो सीटों से चुनाव में हार की वजह से इनकी अपनी छवि कमजोर हुई है। ऊपर से पार्टी को लोकसभा चुनावों के लिए जुझारू नेतृत्व चाहिए, लेकिन जयादा उम्र की वजह से इन पर दांव खेलना आसान नहीं है।

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