Shahnaz Ganai: कश्मीर में बीजेपी को मिला 'पहाड़ी' आदिवासी चेहरा, क्या लोकसभा चुनावों में होगा फायदा?
Lok Sabha elections 2024 in Jammu and Kashmir: लोकसभा चुनावों से ठीक पहले एक प्रमुख पहाड़ी चेहरा शहनाज गनई बीजेपी में शामिल हुई हैं। संसद से जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी नस्ली आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने वाला बिल पास होने के बाद इसे भाजपा के लिए बड़ी सफलता के तौर पर देखा जा रहा है।
पुंछ जिले की रहने वाली डॉ शहनाज गनई पूर्ववर्ती जम्मू और कश्मीर राज्य में नेशनल कांफ्रेंस की एमएलसी रह चुकी हैं। कश्मीर की पहाड़ी नस्ली जनजाति मुख्य रूप से पीर पंजाल क्षेत्र में रहती है, जो राजौरी और पुंछ जिलों का इलाका है।

'पहाड़ी' आदिवासी को एसटी का दर्जा मिलने की वजह से फैसला
भाजपा का कमल पकड़ने से पहले शहनाज गनई जम्मू और कश्मीर जनजातीय संशोधन कानून बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शुक्रिया कह चुकी हैं। उनके मुताबिक इससे 'उत्पीड़ित पहाड़ियों को उत्पीड़कों के चंगुल से मुक्ति' मिलेगी।
चुनाव से 'पहाड़ी' नेताओं का बीजेपी की ओर पलायन
शहनाज पहाड़ी समुदाय की चर्चित चेहरा हैं। लेकिन, उनसे पहले हाल के दिनों में और भी कई पहाड़ी नेता बीजेपी में शामिल हो चुके हैं, जिनमें अब्दुल कयूम मीर और इकबाल मलिक जैसे नेता शामिल हैं। सूत्रों का कहना है कि आने वाले दिनों में कई और पहाड़ी नेता बीजेपी में शिफ्ट हो सकते हैं।
पहाड़ी समुदाय की तेज-तर्रार नेता हैं शहनाज गनई
गनई दिवंगत नेशनल कांफ्रेंस नेता और पूर्व मंत्री गुलाम अहमद गनई की बेटी हैं और तेज-तर्रार होने के साथ-साथ महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली नेता मानी जाती हैं।
उन्होंने 2019 में नेशनल कांफ्रेंस छोड़ दी थी। उनके अलावा एक और प्रमुख पहाड़ी नेता और पूर्व मंत्री मुस्ताक बुखारी के भी बीजेपी में आने की संभावना है, जो पहले कह चुके हैं कि अगर पहाड़ी को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल जाता है तो वे उसमें शामिल हो सकते हैं।
केंद्रीय गृहमंत्री ने पहले ही पहाड़ियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की बात कही थी और उसपर अमल होने से इस समुदाय में काफी खुशी है।
जम्मू-कश्मीर में आदिवासियों के लिए विधानसभा सीटें भी आरक्षित हुई हैं
इससे पहले केंद्र सरकार इस केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित करने का भी कदम उठा चुकी है। परिसीमन के बाद इसका सबसे ज्यादा असर अनंतनाग लोकसभा सीट पर पड़ने वाला है।
क्योंकि, परिसीमन के बाद राजौरी और पुंछ जिले की सात विधानसभाओं में से 6 इसका हिस्सा बनने वाले हैं। इन 6 विधानसभा सीटों में से 5 अब अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हो चुके हैं।
गुज्जर और बकरवाल समुदाय के मतदाताओं पर भी बीजेपी की नजर
बीजेपी इससे पहले गुज्जर और बकरवाल जनजातियों को अपने पक्ष में करने की कोशिशें करती रही है। राजनीतिक आरक्षण दिए जाने से इन दोनों समुदायओं के नेताओं ने भी भाजपा की ओर रुख किया है। इसी महीने में दो बार के पूर्व नेशनल कांफ्रेंस एमएलसी और प्रमुख गुज्जर नेता हाजी मोहम्मद हुसैन भी भाजपा के साथ आ चुके हैं।
अनंतनाग लोकसभा सीट पर बीजेपी को मिल सकता है फायदा
अगर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण और पहाड़ी आदिवासी को अनूसूचित जनजाति का दर्जा देने से बीजेपी को अनंतनाग लोकसभा सीट जीतने में सफलता मिलती है तो यह कश्मीर में उसकी पहली और बहुत बड़ी जीत होगी। क्योंकि, जम्मू को तो उसने दो चुनावों से अपने किले में तब्दील कर ही लिया है।
अगर 2011 की जनगणना के आंकड़े देखें तो पुंछ जिले में गुज्जर और बकरवाल जनजाति की आबादी 43% और राजौरी में 41% थी और इनमें से अधिकांश मुसलमान हैं। इन दोनों जिलों में इनके अलावा जो भी आबादी है, वह खुद को पहाड़ी (हिंदू और मुसलमान दोनों) कहते हैं।
अगर 2019 के लोकसभा चुनावों के आंकड़ों को देखें तो तब बीजेपी अनंतनाग सीट पर चौथे नंबर पर रही थी और उसे महज 8.15% वोट मिले थे।
आर्टिकल 370 के बाद जमीन पर आदिवासियों के हक में हुए बदलाव
लेकिन, आर्टिकल 370 हटने के बाद इस केंद्र शासित प्रदेश के आदिवासियों को भी देश के अन्य भागों के अनुसूचित जनजातियों की तरह ही लाभ और सुरक्षा मिलने की शुरूआत हो चुकी है, जिससे पहले इन नस्ली आदिवासियों को वंचित रखा गया था।
इसी की वजह से पहली बार गुज्जर और बकरवाल समुदाय को पहली बार जम्मू कश्मीर में आरक्षण का लाभ मिलना शुरू हुआ। कश्मीर में राजौरी और पुंछ जिले की 5 विधानसभा सीटों के अलावा रियासी में 1 और कश्मीर में 3 सीटें भी अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हो गई हैं।
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इन 9 विधानसभा सीटों के अलावा भी गुज्जर और बकरवाल प्रदेश के एक दर्जन से ज्यादा सीटों पर मतदान को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
केंद्र सरकार और जम्मू और कश्मीर प्रशासन ने गुज्जर और बकरवाल समुदाय से वादा किया है कि उन्हें इस केंद्र शासित प्रदेश में जो सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 10% का कोटा मिल रहा है वह प्रभावित नहीं होगा और पहाड़ियों को अलग से कोटा उपलब्ध करवाया जाएगा।
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