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Lok Sabha Chunav 2024: भागलपुर में 1984 दोहरा पाएगी कांग्रेस? नीतीश के लिए बनी मूंछ की लड़ाई!

Bhagalpur Lok Sabha Chunav 2024: बिहार का भागलपुर जिला अपने कतरनी चावल, जर्दालु आम और भागलपुरी सिल्क के लिए दुनिया भर में मशहूर है। इस शहर के साथ दंगों का दाग भी जुड़ा हुआ है, तो यहां अति प्राचीन विक्रमशिला विश्वविद्यालय के अवशेष आज भी मौजूद हैं। इस बहुरंगी भागलपुर का चुनाव भी इस बार सतरंगी नजर होता नजर आ रहा है।

कांग्रेस पार्टी आखिरी बार यहां से 1984 में इंदिरा लहर में जीती थी। लेकिन, उसकी सरकार पर 1989 के भागलपुर दंगे का ऐसा दाग लगा, जो आज तक धुल नहीं पाया है। 40 साल बाद कांग्रेस पार्टी लालू यादव के सहारे यहां से अपने उम्मीदवार को गंगा पार करवाकर दिल्ली पहुंचाना चाहती है।

bhagalpur election

बीजेपी कार्यकर्ताओं की नाराजगी से जेडीयू की बढ़ी है चुनौती
2019 में इस सीट से जेडीयू के अजय मंडल 2,70,000 से ज्यादा वोटों से जीते थे। नीतीश कुमार की पार्टी इस बार भी बीजेपी के साथ गठबंधन में यहां से वही जीत दोहराने की उम्मीद लगाए बैठी है। लेकिन, उसके सामने इस बार बड़ी चुनौती पहले तो भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी ही नजर आ रही है।

भागलपुर में बीजेपी कार्यकर्ताओं को लगता है कि लगातार दो बार से एनडीए में सीट बंटवारे में उनके साथ अन्याय हो रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी भागलपुर की 6 में से 3 सीटें बीजेपी जीती थी और एक-एक पर जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस सफल रही थी। बीजेपी कार्यकर्ता यह नहीं भुला पा रहे हैं कि लगातार 10 साल तक यहां से उसकी पार्टी के सांसद रहे हैं।

भागलपुर सीट जेडीयू सुप्रीमो के लिए बनी प्रतिष्ठा की लड़ाई
2004 में सुशील मोदी भागलपुर से जीते थे और 2009 में शाहनवाज हुसैन ने पार्टी का परचम लहराया था। 2014 में वे आरजेडी के शैलेष कुमार उर्फ बुलो मंडल से क्या हारे, यह सीट 2019 में जेडीयू के खाते में चली गई। भाजपा कार्यकर्ताओं की यह शिकायत इस बार बिहार जेडीयू सुप्रीमो और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गई है।

1984 में भागलपुर से आखिरी बार जीती थी कांग्रेस
बिहार में इंडिया ब्लॉक के टूटने का सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को मिला है और यह सीट आरजेडी के खाते से छिटकर उसके पास चली आई है। कांग्रेस ने भागलपुर के अपने सीटिंग विधायक अजीत शर्मा को यहां से उतारा है। उसे उम्मीद है कि यादव और मुस्लिम मतदाताओं के दम पर वह भूमिहार जाति के अपने प्रत्याशी को 1984 के बाद यहां से जिताने में सफल होगी।

भाजपा-जदयू कार्यकर्ताओं में मतभेद दूर करने की कोशिश
कांग्रेस के पक्ष में यहां राहुल गांधी और आरजेडी के तेजस्वी यादव साझा रैली करके गए हैं। नीतीश की पार्टी को मालूम है कि इस बार संघर्ष ज्यादा है, इसलिए राज्य के मंत्री सुनील कुमार को खास तौर पर यहां की जिम्मेदारी दी गई है। उन्होंने ईटी से कहा है कि '15 दिनों से मैं यहां हूं और इस दौरान काफी कुछ किया गया है। बीजेपी-जेडीयू कैडर में जो शुरुआती मतभेद थे और समन्वय के मुद्दे थे, उसे सुलझाया गया है।'

एनडीए भागलपुर में लगा रहा है पूरा जोर
उनके मुताबिक वे लोग सोशल मीडिया पर हवा बनाने की जगह सीधे जन-संपर्क पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के व्यक्तित्व पर यकीन है। नीतीश कुमार पहले भी यहां आ चुके हैं और सोमवार को भी रहेंगे। मंगलवार को भागलपुर शहर में उनका रोडशो भी आयोजित किया गया है।

भाजपा की ओर से भी एनडीए के उम्मीदवार के समर्थन में बड़े नेताओं को उतारा जा रहा है। मंगलवार यानी 23 अप्रैल को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और पार्टी सांसद मनोज तिवारी की जनसभा आयोजित की गई है।

भागलपुर का जातीय समीकरण
भागलपुर में करीब 20 लाख वोटर हैं। सबसे ज्यादा करीब 4 लाख मुसलमान और 3 लाख यादवों की आबादी है। यहां अति-पिछड़ी गंगोता जाति की जनसंख्या करीब 2 लाख वोट है। जेडीयू उम्मीदवार अजय मंडल इसी बिरादरी के हैं। 2014 में यहां से चुने गए राजद सांसद और 2019 में राजद उम्मीदवार बुलो मंडल भी गंगोता हैं, जो अब जेडीयू में आ चुके हैं। इससे नीतीश को लगता है कि गंगोता वोट पर उनकी पकड़ और मजबूत हुई है।

भागलपुर में सवर्ण और वैश्य वोटर करीब 5 लाख हैं। 2 लाख महादलित और 3 लाख गैर-यादव ओबीसी वोटर हैं। दोनों ही गठबंधन अपने इसी जातीय समीकरण के भरोसे मैदान में हैं। लेकिन, एनडीए के पक्ष में इसके अलावा एक और उम्मीद की किरण है। 2019 का चुनाव परिणाम।

2019 का चुनाव परिणाम
पिछली बार जदयू को यहां 59.27% वोट मिले थे। जबकि, राजद को 32.65% वोट मिल पाए थे। तब राष्ट्रीय जनता दल उम्मीदवार बुलो मंडल को कांग्रेस का समर्थन हासिल था।

फिर भी विजय होने वाले प्रत्याशी और दूसरे नंबर पर रहने वाले उम्मीदवार के बीच मतों को फासला बहुत ही ज्यादा था। अन्य उम्मीदवारों में सबसे ज्यादा 3% वोट नोटा पर डले थे। तथ्य यह भी है कि बीते पांच वर्षों में बिहार का राजनीतिक समीकरण फिर से उसी मोड़ पर आ चुका है।

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